मुंबई। इस महीने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह दिल्ली के बजाय गुजरात में आयोजित किए जाने के फैसले को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। विपक्षी नेताओं और फिल्म जगत से जुड़े कुछ लोगों की ओर से कार्यक्रम का स्थान बदलने पर सवाल उठाए जाने के बीच अभिनेता परेश रावल ने इस फैसले का खुलकर बचाव किया है। उन्होंने कहा कि गुजरात भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा है और वहां राष्ट्रीय स्तर का समारोह आयोजित करने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए परेश रावल ने सवाल किया, “क्या गुजरात पाकिस्तान में है? या बांग्लादेश में? गुजरात हमारे देश का अहम हिस्सा है। यह समारोह निश्चित रूप से वहीं होना चाहिए।” अभिनेता के इस बयान ने समारोह के आयोजन स्थल को लेकर चल रही राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है। उनके मुताबिक किसी राष्ट्रीय आयोजन को देश के किसी दूसरे राज्य में आयोजित करने को लेकर अनावश्यक सवाल नहीं उठाए जाने चाहिए।

जब परेश रावल से पूछा गया कि विपक्षी दल और कुछ अन्य लोग समारोह को दिल्ली से बाहर ले जाने के फैसले पर सवाल उठा रहे हैं तो उन्होंने कहा कि सवाल उठाना राजनेताओं का काम है। उन्होंने गणतंत्र दिवस परेड का उदाहरण देते हुए पूछा, “क्या 26 जनवरी की परेड दिल्ली में नहीं होती? तो क्या हर कार्यक्रम सभी राज्यों में होना चाहिए?” उनके इस जवाब का आशय था कि किसी कार्यक्रम के आयोजन स्थल को राजनीतिक विवाद का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए।

जुलाई में घोषित 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का वितरण समारोह इस महीने आयोजित किया जाना है। सामान्य रूप से राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह का आयोजन नई दिल्ली में होता रहा है। इसी परंपरा के कारण इस बार गुजरात को आयोजन स्थल बनाए जाने पर बहस शुरू हुई है। आलोचकों का सवाल है कि लंबे समय से स्थापित व्यवस्था में बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी और इसके लिए गुजरात को ही क्यों चुना गया।

हालांकि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह का दिल्ली से बाहर आयोजित होना पूरी तरह अभूतपूर्व नहीं है। पहले भी कुछ अवसरों पर यह कार्यक्रम राष्ट्रीय राजधानी के बाहर आयोजित किया जा चुका है। इसके बावजूद दिल्ली से गुजरात स्थानांतरण को कुछ राजनीतिक दल केंद्र सरकार की राजनीतिक प्राथमिकताओं से जोड़कर देख रहे हैं। वहीं फैसले के समर्थकों का कहना है कि राष्ट्रीय आयोजन केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहने चाहिए और देश के अलग-अलग राज्यों को भी उनकी मेजबानी करने का अवसर मिलना चाहिए।

परेश रावल का संबंध अभिनय के साथ राजनीति से भी रहा है। वे गुजरात की अहमदाबाद पूर्व लोकसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के सांसद रह चुके हैं। ऐसे में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह को गुजरात में आयोजित करने के समर्थन में दिया गया उनका बयान राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है। आलोचक उनके बयान को उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि से जोड़ सकते हैं, जबकि समर्थक इसे देश के विभिन्न हिस्सों में राष्ट्रीय आयोजनों के विकेंद्रीकरण के पक्ष में एक स्पष्ट राय बता रहे हैं।

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में गिने जाते हैं। इनके माध्यम से अलग-अलग भारतीय भाषाओं में बनी फिल्मों, कलाकारों, निर्देशकों, तकनीशियनों और अन्य सिनेमा पेशेवरों को सम्मानित किया जाता है। इस समारोह का उद्देश्य केवल लोकप्रिय फिल्मों को पुरस्कृत करना नहीं, बल्कि कलात्मक गुणवत्ता, सामाजिक सरोकार, तकनीकी दक्षता और क्षेत्रीय भाषाओं में किए जा रहे महत्वपूर्ण काम को राष्ट्रीय पहचान दिलाना भी है।

यही कारण है कि इस समारोह के आयोजन स्थल में बदलाव को सामान्य प्रशासनिक निर्णय से अधिक महत्व दिया जा रहा है। आयोजन गुजरात में होने से राज्य को देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले फिल्म कलाकारों, निर्माताओं, निर्देशकों और तकनीशियनों की मेजबानी करने का अवसर मिलेगा। इससे वहां की स्थानीय फिल्म संस्कृति, पर्यटन और आयोजन क्षमताओं को भी राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित किया जा सकता है।

समारोह को गुजरात में आयोजित किए जाने के समर्थकों का तर्क है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में बड़े राष्ट्रीय कार्यक्रमों का आयोजन अलग-अलग राज्यों में किया जाना चाहिए। इससे राष्ट्रीय संस्थाओं और आयोजनों की पहुंच व्यापक होती है। लोगों को यह संदेश भी मिलता है कि महत्वपूर्ण कार्यक्रमों की मेजबानी पर केवल राष्ट्रीय राजधानी का अधिकार नहीं है। ऐसे आयोजनों से संबंधित राज्य में सांस्कृतिक गतिविधियों और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिल सकता है।

दूसरी ओर, सवाल उठाने वाले पक्ष का कहना है कि यदि किसी लंबे समय से चली आ रही परंपरा में बदलाव किया जाता है तो उसके कारणों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। आयोजन स्थल तय करने की प्रक्रिया, उपलब्ध सुविधाओं, सुरक्षा, अतिथियों की यात्रा और प्रशासनिक खर्च जैसे पहलुओं की स्पष्ट जानकारी से अनावश्यक विवाद को रोका जा सकता है। विपक्ष फैसले की पारदर्शिता और चयन के आधार को लेकर सरकार से जवाब मांग सकता है।

परेश रावल के बयान की भाषा भी चर्चा में है। उन्होंने पाकिस्तान और बांग्लादेश का उल्लेख करते हुए इस बात पर जोर दिया कि गुजरात भारत का अभिन्न हिस्सा है। अभिनेता का तर्क है कि किसी भारतीय राज्य में राष्ट्रीय समारोह आयोजित किए जाने को लेकर ऐसा माहौल नहीं बनाया जाना चाहिए, मानो कार्यक्रम देश से बाहर ले जाया जा रहा हो। उनके अनुसार आयोजन स्थल को लेकर राजनीति करने के बजाय राष्ट्रीय सिनेमा और पुरस्कार विजेताओं की उपलब्धियों पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों की नजर अब समारोह की आधिकारिक तैयारियों और उसके स्वरूप पर टिकी है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दिल्ली से बाहर आयोजन होने के कारण कार्यक्रम में कौन से बदलाव किए जाते हैं और फिल्म जगत की भागीदारी कैसी रहती है। पुरस्कार विजेताओं के साथ विभिन्न भाषाओं के कलाकारों तथा तकनीशियनों की मौजूदगी समारोह को राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान करेगी।

फिलहाल समारोह के आयोजन स्थल को लेकर शुरू हुआ विवाद थमता दिखाई नहीं दे रहा है। परेश रावल के तीखे जवाब के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और बढ़ सकती हैं। एक ओर इसे राष्ट्रीय आयोजनों को विभिन्न राज्यों तक ले जाने की पहल बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर फैसले के पीछे राजनीतिक उद्देश्य होने के आरोप लगाए जा रहे हैं। विवाद के बीच परेश रावल ने साफ कर दिया है कि उनके अनुसार गुजरात में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह आयोजित किया जाना पूरी तरह उचित है।

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