Emergency Review : कंगना रनौत Kangana Ranautकी फिल्म 'इमरजेंसी' सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। इस फिल्म की कहानी कंगना रनौत ने लिखी है और उन्होंने ही इस फिल्म का निर्देशन भी किया है। जब फिल्म का फर्स्ट लुक रिलीज हुआ था तो इंदिरा गांधी के लुक में कंगना Kangana को देखने के बाद ये तो तय था कि फिल्म देखनी ही पड़ेगी। साथ ही ये भी उत्सुकता थी कि क्या कंगना रनौत Kangana Ranaut इंदिरा गांधी को खलनायिका के तौर पर दिखाएंगी या फिर हीरो के तौर पर। अब फिल्म देखने के बाद मैं पूरे भरोसे के साथ कह सकता हूं कि कंगना रनौत ने इस फिल्म के जरिए दर्शकों को दोगुनी उम्मीदें दी हैं, कुछ चीजें काल्पनिक भी लगती हैं। लेकिन कुल मिलाकर कंगना इस बार एक अच्छी फिल्म लेकर आई हैं। इंदिरा गांधी की कहानी बताते हुए कंगना ने सिनेमैटिक लिबर्टी का भी फायदा उठाया है।
अब कोई भी इंसान परफेक्ट नहीं होता, चाहे वो हमारे देश का पूर्व प्रधानमंत्री ही क्यों न हो। फिल्म 'इमरजेंसी' में कंगना रनौत ने इंदिरा गांधी के बचपन से लेकर उनकी मौत तक के सफर को बयां किया है। लेकिन फिल्म के ज्यादातर हिस्से में इंदिरा गांधी को हीरो दिखाने वाली कंगना ने उनकी मौसी और देश की स्वतंत्रता सेनानी विजया लक्ष्मी पंडित को खलनायिका के तौर पर दिखाया है। इस फिल्म की शुरुआत में एक सीन में दिखाया गया है कि कैसे विजया लक्ष्मी इंदिरा की मां को कमरे में भेजती हैं और नौकर से कमरे का दरवाजा बंद करने को कहती हैं। 'जैसी भद्दी शक्ल वैसी ही अकाल' कहते हुए वह इंदिरा को बदसूरत तक कह देती हैं।
एक तरफ फिल्म में इंदिरा और उनके पिता यानी देश के पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू के बीच विचारों का टकराव दिखाया गया है, वहीं दूसरी तरफ इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी को इस पूरी फिल्म में विलेन की तरह पेश किया गया है। यानी एक तरफ कंगना Kangana इस कहानी में इंदिरा गांधी को स्टार बता रही हैं, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने उनके करीबियों को विलेन की तरह पेश किया है और यही वजह है कि हम इस फिल्म को 'एक काल्पनिक कहानी' कह सकते हैं।
कंगना रनौत इस फिल्म में न सिर्फ इंदिरा गांधी की तरह दिखी हैं, बल्कि उन्होंने इस किरदार के हर पहलू पर काम किया है, उनकी बॉडी लैंग्वेज से लेकर उनके हाव-भाव तक। चाहे इंदिरा जी का हाथी पर बैठकर एक छोटे से गांव में जाना हो या देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के अंतिम संस्कार का समय, उस समय से जुड़ी उपलब्ध तस्वीरों और वीडियो के संदर्भों का सही इस्तेमाल करके उसी तरह के माहौल को फिल्म में दिखाया गया है। इंदिरा गांधी के कपड़े और हेयर स्टाइल (4 हेयर कट) भी बिल्कुल वैसे ही रखे गए हैं जैसे असलियत में थे। इसके अलावा कंगना का प्रोस्थेटिक करने वाले को पूरे नंबर।
फिल्म में इंदिरा गांधी को 'गुड़िया' कहने वाले जयप्रकाश नारायण का किरदार अनुपम खेर ने निभाया है। अब हमारी उम्र से भी ज्यादा समय से अभिनय कर रहे इस कलाकार के एक्सप्रेशन और अभिनय के बारे में क्या कहें? लेकिन हमेशा की तरह उन्होंने अपने किरदार में जान डाल दी है। अटल बिहारी वाजपेयी के किरदार में श्रेयस तलपड़े भी अच्छे लगे हैं। जगजीवन राम के किरदार में सतीश कौशिक को देखना काफी सुखद रहा। लेकिन 'सैम' के किरदार में विक्की कौशल को देखने के बाद मिलिंद सोमन के सैम मानेकशॉ से कनेक्ट करना मुश्किल था। महिमा चौधरी (पुपुल जयकर) का किरदार काफी दिलचस्प लगा।
जिस विषय पर हम बचपन से कहानियां सुनते आ रहे हैं, जिस पर कई शॉर्ट फिल्में और डॉक्यूमेंट्री बनी हैं, उस पर ढाई घंटे की फिल्म बनाना आसान नहीं है, जो दर्शकों को अंत तक जोड़े रखती है। लेकिन कंगना इसमें सफल रही हैं। फिल्म की कहानी लिखते समय उन्होंने इस बात का पूरा ख्याल रखा है कि लोग पूरी फिल्म में उनके साथ बने रहें। लेकिन अचानक एक अच्छे सीन के बीच में प्रधानमंत्री, विपक्षी पार्टी के नेता और भारतीय सेना के प्रमुख का गाना गाना ओवर ड्रामेटिक लगता है, जिसे टाला जा सकता था। फिल्म की अच्छी कास्टिंग ने भी कंगना रनौत का काम आसान कर दिया है।
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