Anand Bakshi : फौजी से गीतकार बनने की कहानी

Update: 2025-03-30 05:55 GMT

मुंबई | आनंद बख्शी भारतीय सिनेमा के सबसे लोकप्रिय और सफल गीतकारों में से एक थे। उनका सफर आसान नहीं था। वे भारतीय सेना में नौकरी करते थे, लेकिन उनका मन कविताओं और गीतों में रमता था। फौज की वर्दी छोड़कर उन्होंने मुंबई का रुख किया और हिंदी सिनेमा को चार हजार से ज्यादा यादगार गाने दिए।

फौज से फिल्मों तक का सफर

आनंद बख्शी का जन्म 21 जुलाई 1930 को रावलपिंडी (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। विभाजन के बाद उनका परिवार भारत आ गया। वे भारतीय सेना में भर्ती हुए, लेकिन उनके सपनों की मंजिल फिल्म इंडस्ट्री थी। 1950 के दशक में वे मुंबई आए, मगर शुरुआत में उन्हें संघर्ष करना पड़ा।

पहला ब्रेक और सफलता की सीढ़ियां

आनंद बख्शी को पहला मौका 1958 में फिल्म 'भला आदमी' में मिला, लेकिन पहचान 1965 में आई फिल्म 'जब जब फूल खिले' से मिली। इस फिल्म के गाने 'एक था गुल और एक थी बुलबुल' और 'परदेसियों से न अंखियां मिलाना' सुपरहिट हुए।

इसके बाद राजेश खन्ना, किशोर कुमार और आर. डी. बर्मन के साथ उनकी जोड़ी ने 70 के दशक में बॉलीवुड पर राज किया।

4000 से ज्यादा हिट गाने

आनंद बख्शी ने चार दशकों तक बॉलीवुड के लिए लिखा और 4000 से भी ज्यादा गाने दिए। कुछ अमर गीत हैं:

'रोटी कपड़ा और मकान' – मेरे देश की धरती

'अराधना' – मेरे सपनों की रानी

'शोले' – ये दोस्ती

'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' – तुझे देखा तो ये जाना सनम

आखिरी दौर और विरासत

2002 में उनका निधन हो गया, लेकिन उनके गाने आज भी लोगों के दिलों में बसे हैं। आनंद बख्शी का नाम भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित गीतकारों में हमेशा याद किया जाएगा।

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