मशहूर गायिका रेखा भारद्वाज ने फिल्मकार और अपने पति विशाल भारद्वाज के जीवन से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा साझा किया है। उन्होंने बताया कि विशाल भारद्वाज का शेक्सपियर से जुड़ाव किसी योजना का हिस्सा नहीं था, बल्कि एक सफर के दौरान अचानक शुरू हुआ था। ट्रेन में हुई एक छोटी सी घटना ने आगे चलकर भारतीय सिनेमा को यादगार फिल्में दीं।
रेखा भारद्वाज के मुताबिक, ट्रेन यात्रा के दौरान विशाल भारद्वाज को शेक्सपियर की कहानियों से परिचय मिला। यही पढ़ने का अनुभव आगे चलकर उनकी रचनात्मक सोच का हिस्सा बना और उन्होंने शेक्सपियर की महान कृतियों को भारतीय परिवेश में ढालकर कई चर्चित फिल्में बनाईं।
ट्रेन के सफर में मिली ‘मैकबेथ’ की कहानी
विशाल भारद्वाज ने एक इंटरव्यू में बताया था कि एक ट्रेन यात्रा के दौरान बोरियत दूर करने के लिए उन्होंने किताब पढ़ना शुरू किया। इसी दौरान उन्हें विलियम शेक्सपियर की प्रसिद्ध रचना ‘मैकबेथ’ पढ़ने का मौका मिला। कहानी ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने इसे भारतीय संदर्भ में फिल्म बनाने का विचार किया।
इसी प्रेरणा से उन्होंने फिल्म ‘मकबूल’ बनाई, जो शेक्सपियर की ‘मैकबेथ’ का भारतीय रूपांतरण थी। फिल्म को दर्शकों और आलोचकों दोनों से काफी सराहना मिली।
शेक्सपियर से बनी अलग पहचान
विशाल भारद्वाज ने शेक्सपियर की कई प्रसिद्ध रचनाओं को भारतीय संस्कृति और समाज के हिसाब से पर्दे पर उतारा। ‘मकबूल’ के बाद उन्होंने ‘ओमकारा’ और ‘हैदर’ जैसी फिल्में बनाईं, जो क्रमशः ‘ओथेलो’ और ‘हैमलेट’ से प्रेरित थीं।
उनकी फिल्मों में साहित्य, संगीत और मानवीय भावनाओं का अनोखा मेल देखने को मिलता है। यही वजह है कि विशाल भारद्वाज को भारतीय सिनेमा में अलग तरह की कहानियां कहने वाले फिल्मकारों में गिना जाता है।
रेखा और विशाल की रचनात्मक साझेदारी
रेखा भारद्वाज और विशाल भारद्वाज की जोड़ी संगीत और कला के क्षेत्र में भी खास पहचान रखती है। रेखा ने अपनी आवाज से विशाल की कई फिल्मों के गीतों को खास बनाया है।
दोनों की रचनात्मक साझेदारी ने हिंदी सिनेमा को कई यादगार गीत और फिल्में दी हैं।
एक संयोग जिसने बदल दी सिनेमा की दिशा
एक साधारण ट्रेन यात्रा से शुरू हुई शेक्सपियर से मुलाकात ने विशाल भारद्वाज के फिल्मी सफर को नई दिशा दी। आज उनकी पहचान ऐसे निर्देशक के रूप में है, जिन्होंने विश्व साहित्य को भारतीय कहानियों और भावनाओं से जोड़कर दर्शकों तक पहुंचाया।
रेखा भारद्वाज का यह किस्सा बताता है कि कई बार जीवन के छोटे-छोटे अनुभव ही बड़े रचनात्मक बदलाव की वजह बन जाते हैं।
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