चुनौतियों की कसौटी पर

हर दौर की जरूरत अलग होती है। सालाना बजट को परखने की कसौटी यही होती है कि

Update: 2022-02-01 16:54 GMT
हर दौर की जरूरत अलग होती है। सालाना बजट को परखने की कसौटी यही होती है कि वह अपने समय की जरूरतों और आने वाली चुनौतियों से किस तरह दो-चार होता है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वर्ष 2022-23 का जो बजट संसद में पेश किया है, उसकी समीक्षा भी इसी कसौटी पर हो सकती है। महामारी के दौर ने जो परेशानियां खड़ी की हैं, सीमित संसाधनों के जरिये उनसे निपटना किसी भी वित्त मंत्री के लिए टेढ़ी खीर हो सकता था। खासकर इसलिए कि अब यह मामला सिर्फ जन-स्वास्थ्य का नहीं है। महामारी ने सबसे ज्यादा अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया है। इस दौरान कई सारे उद्योग बंद हुए हैं, उत्पादन कम हुआ है, लोग बेरोजगार हुए हैं, आर्थिक असमानता और गरीबी, दोनों में इजाफा हुआ है। इन हालात में वित्त मंत्री ने एक ऐसा बजट देने की कोशिश की है, जो लोगों को अपने पैरों पर खड़े होने में मदद करे।
पिछले कुछ समय से अर्थशास्त्री दो जरूरतों की ओर ध्यान खींच रहे थे। एक तो रोजगार के अवसर बढ़ाने पर, और दूसरी, ऐसे तरीके अपनाने पर, जिनसे लोगों और खासकर मध्यवर्ग की जेब में ज्यादा पैसा जाए और इस पैसे से जब वे बाजार में कुछ खरीदने निकलें, तो मांग बढे़। वित्त मंत्री ने पहली जरूरत पर ही सबसे ज्यादा ध्यान दिया। रोजगार का मामला मध्यवर्ग की आमदनी बढ़ने से कहीं बड़ा है। खासकर देश के कुछ हिस्सों में जिस तरह से रोजगार को लेकर युवाओं में असंतोष बढ़ रहा है, उसे देखते हुए इसे ही प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी। इसके लिए बजट में सबसे ज्यादा जिसकी बात की गई है, वह है पूंजीगत खर्च। सरकार अगर बड़े पैमाने पर इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं का निर्माण करती है, तो इनमें अकुशल से कुशल तक कई श्रेणियों में लोगों को रोजगार मिलने के अवसर खुलेंगे। देश में सबसे ज्यादा रोजगार के अवसर लघु और मध्यम उद्योगों में पैदा होते हैं। महामारी के दौरान ये उद्योग ही सबसे ज्यादा बंद हुए। बजट में ऐसे उद्योगों के लिए आपातकालिक कर्ज की व्यवस्था को भी बढ़ाया गया है, जो उन्हें संकट से उबार सकती है। मुमकिन है, आयकर दरों में कोई बदलाव न होने की वजह से मध्यवर्ग इस बजट से कुछ निराश हो, लेकिन संभव है कि कर व्यवस्था में स्थायित्व के लिए शायद सरकार को यह जरूरी लगा हो।
एक आशंका यह थी कि देश के कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव के चलते बजट पर चुनावी असर दिख सकता है। वित्त मंत्री बजट को इस प्रभाव से मुक्त रखने में सफल रहीं और उन्होंने लोक-लुभावन घोषणाओं का ढेर नहीं लगाया। इस बजट की सबसे खास बात यह है कि इसमें तात्कालिकता के बजाय दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाया गया है। यही वजह है कि इसमें कई जगह हरित अर्थव्यवस्था, हरित ऊर्जा, प्राकृतिक खेती जैसे शब्द सुनाई देते हैं। बजट 5जी तकनीक के जल्द आगमन को लेकर भी आश्वस्त करता है और पूरी तरह डिजिटल विश्वविद्यालय बनाने को लेकर भी। इस बजट का सबसे चिंताजनक पहलू है महंगाई की आशंका। चालू वित्त-वर्ष में वित्तीय घाटा 6.9 फीसदी तक पहंुच गया है, अगले वित्त-वर्ष के लिए 6.4 प्रतिशत का अनुमान है। अगले पूरे साल में सरकार को एक तो यह प्रयास करना होगा कि यह घाटा इस अनुमान से ज्यादा न बढ़े और दूसरे मुद्रास्फीति के रूप में इस घाटे की मार समाज के गरीब तबके पर न पड़े।
लाइव हिंदुस्तान 
Tags:    

Similar News