इस बीच नए मुख्यमंत्री के रूप में सुक्खू के लौटने की प्रतीक्षा, कोविड के प्रभाव से मुक्त होने की परीक्षा तथा सरकार को राजधानी में स्थापित करने की उम्मीदें कदमताल कर रही हैं। सरकार एक तरफ पिछली सरकार के अंतिम फैसलों को जमीं सुंघाने के लिए तो अति सक्रिय है, लेकिन मंत्रिमंडल का घूंघट उठाने में हो रही देरी से चुनावी जीत के तोरणद्वार उदास हैं। अब तक न तो कांग्रेस के विधायक अपने विधानसभा क्षेत्रों में अपना विजय जुलूस निकाल पाए और न ही संभावित मंत्री अभी तक संशय से बाहर निकल पाए। इसका यह संकेत भी है कि अब प्रदेश की हवाएं दिल्ली से पूछ कर बहेंगी या अभी फूंक-फूंक कर कदम उठाने की अग्रिपरीक्षा जारी रहेगी। यह दीगर है कि सरकार के मंत्री पद अभी पक रहे हैं या अगले साल की सीढ़ी पर सारे कयास चढ़ रहे हैं। दो अहम फैसलों का प्रदेश के जनादेश को लगातार इंतजार है। एक परंपरागत शीतकालीन सत्र और दूसरा मंत्रिमंडल का गठन। सरकार की परंपराओं में राजधानी शिमला की नई कसौटियां और राज्य सचिवालय की रौनक पर फिदा होने की तैयारियों में प्रदेश के कई हलके और नागरिक समाज की अर्जियां। स्वागत समारोह, जश्र और जनसभाओं में घटते-बढ़ते रुतबों की तासीर अभी सामने आनी है, तो संवेदनाओं के समुद्र की गतिशीलता का नया सफर देखने को आतुर निगाहें बेचैन हैं। सरकार की अपनी दीवारों का रंग रोगन, नए संकल्पों की इबारत और समय के चक्र में आगे बढऩे का अभिप्राय कदमताल कर रहा है। जिस चुनाव ने कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाया उसके दो द्वार असीम विश्लेषणों की मांग करते हैं। कांग्रेस को प्लस करतीं कांगड़ा की दस सीटें और इसका रास्ता रोकती मंडी की नौ सीटों के बीच तमाम तर्क, अध्ययन, राजनीतिक शास्त्र और भविष्य के सबक नत्थी हैं। इसी विश£ेषण से सरकार के नीतिगत फैसले, क्षेत्रीय संतुलन, मंत्रिमंडल की अभिलाषा और भविष्य का रेखांकन होगा। यहां सवाल यह भी कि पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने मंडी का दिल जीता, तो कांगड़ा का क्यों टूटा। स्व. वीरभद्र सिंह को क्यों कांगड़ा की परिक्रमा में अपनी सरकार के ऊर्जा स्रोत खोजते रहे।
ऐसे में वर्तमान सरकार को मंडी को अपने करीब लाने की चुनौती है, तो कांगड़ा की महत्त्वाकांक्षा को आजमाने की जरूरत भी है। इसी के साथ शुरू होती हैं शीतकालीन सत्र और शीतकालीन प्रवास की परंपराएं। ये परंपराएं वीरभद्र की सियासी प्रयोगशाला के अभिनव प्रयोग रहीं, लेकिन अब निचले हिमाचल के आत्मसम्मान की गवाही में दर्ज हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में सुक्खू सरकार द्वारा चिन्हित 574 दफ्तरों का बंद होना भी एक नए प्रयोग का आगाज है। हम चुनाव पूर्व खुले 574 कार्यालयों को बंद करने की सूचना को पढ़ें तो एक तरफ सियासी शक्तियां, प्रभाव व पूर्व मुख्यमंत्री की जिद्द का खाका नजर आएगा, लेकिन दूसरी तरफ कई क्षेत्रवाद, फिजूलखर्ची व सरकार के अपवाद नजर आएंगे। जाहिर है सरकार इन कार्यालयों का युक्तिकरण करते हुए अपनी इच्छा और जरूरत के मुताबिक देर सवेर इनकी जंजीरें खोलेगी, लेकिन देखना यही है कि सरकार के फैसले अगले चुनाव में फिर कांगड़ा-मंडी के एकतरफा यकीन के दुर्ग न बन जाएं। सरकार को पूरे मंत्रिमंडल के साथ प्रदेश के वित्तीय ढांचे, केंद्र से समन्वय, सुशासन की डगर और अपनी गारंटियों की रसीद तैयार करने के लिए मोर्चे पर खड़ा होना है, तो आरंभिक तौर पर सारे किंतु परंतु हटाने होंगे।