आयुर्वेद की अहमियत

कोरोना संक्रमण के इलाज के लिए सरकार ने देश की प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद को मान्यता देकर इस महामारी से निपटने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम उठाया है।

Update: 2020-10-08 08:11 GMT

जनता से रिश्ता वेबडेस्क |  कोरोना संक्रमण के इलाज के लिए सरकार ने देश की प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद को मान्यता देकर इस महामारी से निपटने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम उठाया है।स्वास्थ्य मंत्रालय ने इसके लिए तौर-तरीकों संबंधी जो दिशा-निर्देश जारी किए हैं, उनसे अब पूरे देश में आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति से भी कोरोना का इलाज संभव हो सकेगा। पिछले छह महीने के दौरान कोरोना संक्रमितों के इलाज के लिए सिर्फ एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति पर ही निर्भरता बनी हुई थी। चाहे संक्रमण हल्का हो या ज्यादा, हर मरीज को तय नियमों के मुताबिक सरकारी, निजी अस्पतालों और एकांतवास में भेजा जा रहा था। इससे लोगों के मन में खौफ ज्यादा बनता गया और लोग बीमारी को छिपाने लगे। हालांकि सरकार होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति को भी इस तरह की मान्यता दे चुकी है। देश में अभी जिस तरह से लाखों लोग संक्रमण का सामना कर रहे हैं, उसमें सिर्फ एक चिकित्सा पद्धति के बूते हालात से निपट पाना संभव नहीं है। दरअसल, महामारी घोषित होने के बाद भारत सहित दुनिया के तमाम देशों के समक्ष विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के दिशा-निर्देशों के अनुरूप चलने की बाध्यता रही। इसलिए भारत में देसी चिकित्सा पद्धतियों को कोई तवज्जो नहीं मिली। हालांकि लोग शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए देसी नुस्खों का प्रयोग करते रहे और इसमें कोई संदेह नहीं कि ये नुस्खे एक हद तक तो कारगर साबित हुए।

आयुर्वेद भारत की ही नहीं, दुनिया की प्राचीनतम और जांची-परखी चिकित्सा पद्धति है। धन्वंतरि से लेकर चरक और सुश्रुत जैसे आयुर्वेद के ऋषियों ने मानव जाति के लिए इसे हर तरह से समृद्ध बनाया। रोगों के निदान से लेकर दवाओं के निर्माण तक में यह परंपरा आज तक जारी है। इसका बड़ा प्रमाण यह है कि भारत आज आयुर्वेद चिकित्सा के बड़े केंद्र के रूप में पुनर्स्थापित हो चुका है। सबसे बड़ी बात तो यह कि अन्य चिकित्सा पद्धतियों की तुलना में आयुर्वेद, होम्योपैथ, सिद्ध, योग जैसी चिकित्सा पद्धतियां काफी सस्ती होने के कारण आम लोगों की पहुंच में हैं। भारतीय घरों में आमतौर पर रसोई में इतनी चीजें उपलब्ध रहती हैं जिन्हें ज्यादातर बीमारियों में अचूक औषधि के रूप में उपयोग में लाया जाता है। इसीलिए कोरोना से बचाव के लिए आयुर्वेद चिकित्सक पहले ही से मास्क और सुरक्षित दूरी के उपाय के अलावा हल्दी, लौंग, काली मिर्च, सौंठ, दालचीनी, गिलोय जैसे मिश्रण का काढ़ा पीने की सलाह देते रहे, ताकि लोगों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो और वे संक्रमण से बचे रहें। यह आयुर्वेद में विश्वास का ही परिणाम रहा कि देश के करोड़ों ने लोगों ने इस तरह के उपायों को अपनाया और अपनी रक्षा की।

भारत की बड़ी आबादी ऐसी है जो अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति का खर्च नहीं उठा सकती। सबने देखा कि जिन कोरोना मरीजों को सरकारी अस्पतालों में जगह नहीं मिली और निजी अस्पतालों की ओर भागने को मजबूर होना पड़ा, उन्हें जान बचाने के लिए लाखों रुपए फूंकने पड़े। इनमें ज्यादातर मामले तो ऐसे मिल जाएंगे जिनमें संक्रमण बहुत ही मामूली रहा, लेकिन फिर भी अस्पतालों ने जेब खाली करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसे में जब कानूनन सिर्फ एक ही चिकित्सा पद्धति से इलाज करवाने की मजबूरी हो, तो किया भी क्या जा सकता था! लेकिन अब कोरोना से जंग में आयुर्वेद की अहमियत को मान्यता मिल जाने से लोग बहुत ही सस्ते में अपना इलाज करवा सकेंगे। हालांकि आयुर्वेद का इलाज फिलहाल सिर्फ हल्के और मध्यम श्रेणी के संक्रमितों के लिए ही है, गंभीर मामलों में इलाज एलोपैथिक चिकित्सी पद्धति से कोविड अस्पतालों में ही होगा। कोरोना का टीका आएगा, तब आएगा, लेकिन तब तक और उसके बाद भी कोरोना से जंग में आयुर्वेद ही बड़ा हथियार साबित होगा।

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