पिछले वर्ष के लॉकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा के मामलों में 10 साल का रिकॉर्ड टूट गया था। 25 मार्च से 31 मई के बीच पीड़ित महिलाओं ने अपने साथ हिंसा की 1,477 शिकायतें दर्ज कराई थीं, जो उस कालखंड की एक भयावह तस्वीर पेश कर रही थी। यह स्थिति तब थी, जब सामाजिक रूढ़ियों के कारण अनगिनत घटनाएं किसी तहरीर का हिस्सा नहीं बन पातीं। दरअसल, संक्रमण का डर, कमाई की चिंता, महानगरों के दड़बेनुमा घर में सिमट आई जिंदगी ने अनगिनत लोगों के सामने एक ऐसी स्थिति रख दी थी, जो उनकी कल्पना में भी नहीं थी। ऐसे में, हालात से उत्पन्न तनाव एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आए थे। पर दूसरी लहर के दौरान न तो लॉकडाउन उतने सख्त या लंबी अवधि के लगे और न ही यह परिस्थिति अचानक पैदा हुई थी, इसके बावजूद बुजुर्गों के साथ हो रहा बर्ताव बताता है कि हमारे पारिवारिक मूल्य तेजी से दरक रहे हैं और उनको संजीदगी से सहेजने की जरूरत है।
पारंपरिक भारतीय परिवारों यानी संयुक्त परिवारों में बुजुर्गों की देखभाल कोई समस्या इसलिए नहीं हुआ करती थी, क्योंकि तब उन्हें एकाकीपन से नहीं जूझना पड़ता था। भावनाओं की साझेदारी के साथ उनकी बहुत सारी शिकायतें यूं ही तिरोहित हो जातीं और वे उपेक्षित नहीं महसूस करते थे। फिर परिवारों व संततियों पर लोकलाज का अंकुश हमेशा बना रहता था। लेकिन व्यापक सामाजिक-आर्थिक बदलावों के कारण एकल परिवारों का चलन अब मजबूरी है और महामारी ने ऐसे परिवारों के सदस्यों के तनाव को ज्यादा गहरा किया है। एजवेल फाउंडेशन जैसे संगठनों के अध्ययन हमारे नीति-नियंताओं के लिए आंख खोलने वाले होने चाहिए। तब तो और, जब देश अभी दूसरी लहर से पूरी तरह उबरा नहीं है, तीसरी लहर की आशंका को टालने का इसे उपक्रम करना है और अर्थव्यवस्था को पटरी पर वापस लाना है। विगत वर्षों में बुजुर्गों के अधिकारों को संरक्षित करने वाले कई अच्छे कानून बने, बावजूद इसके यदि 73 प्रतिशत बुजुर्ग दुव्र्यवहार के शिकार बनते हैं और 35 फीसदी को पीड़ादायक स्थितियों से गुजरना पड़ता है, तो यह उन कानूनों के क्रियान्वयन, उन्हें लेकर सामाजिक जागरूकता को कठघरे में खड़ा करता है। वैसे भी, बच्चों व बुजुर्गों के अधिकारों की रक्षा किए बिना कोई समाज सभ्य नहीं कहला सकता।
क्रेडिट बाय लाइव हिंदुस्तान