नई दिल्ली। कांग्रेस सांसद के.सी. वेणुगोपाल ने गुरुवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक 2026 की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC की कार्यप्रणाली को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि यदि प्रभावित पक्षों और अन्य हितधारकों के साथ पर्याप्त तथा सार्थक बातचीत किए बिना समिति अपनी रिपोर्ट तैयार करती है तो विधेयक को संसदीय समिति के पास भेजने का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाएगा।

वेणुगोपाल ने अपने पत्र में कहा कि इस विधेयक का असर गैर सरकारी संगठनों, धार्मिक संस्थाओं, स्वैच्छिक संगठनों और विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाली दूसरी संस्थाओं पर पड़ सकता है। इसलिए इसे लेकर व्यापक स्तर पर विचार-विमर्श जरूरी है। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष से हस्तक्षेप करने और यह सुनिश्चित करने की मांग की कि समिति सभी प्रभावित पक्षों से राय ले।

वेणुगोपाल ने लिखा कि अगर पर्याप्त परामर्श के बिना ही समिति अपनी प्रक्रिया पूरी कर लेती है तो उस उद्देश्य पर असर पड़ेगा जिसके लिए सदन ने विधेयक को विस्तृत जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा था। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में एक महत्वपूर्ण संसदीय प्रक्रिया केवल औपचारिकता बनकर रह सकती है।

उन्होंने मांग की कि JPC सार्वजनिक सूचना जारी कर लिखित सुझाव आमंत्रित करे। इसके साथ ही गैर सरकारी संगठनों, धार्मिक संस्थाओं, सामाजिक संगठनों, कानूनी विशेषज्ञों और राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों को समिति के सामने अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर दिया जाए। वेणुगोपाल का कहना है कि अलग-अलग पक्षों की बात सुने बिना विधेयक के प्रभाव का व्यापक आकलन करना मुश्किल होगा।

वेणुगोपाल ने समिति की रिपोर्ट तैयार करने के लिए पर्याप्त समय देने की मांग भी की है। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर JPC की रिपोर्ट जमा करने की समय सीमा बढ़ाई जानी चाहिए ताकि हर प्रावधान पर विस्तार से चर्चा हो सके। उन्होंने विधेयक की धारा-दर-धारा समीक्षा के लिए भी पर्याप्त समय देने पर जोर दिया।

फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन अमेंडमेंट बिल 2026 को 25 मार्च को लोकसभा में पेश किया गया था। इसके बाद 12 अगस्त को इसे विस्तृत जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया गया। समिति में लोकसभा के 21 और राज्यसभा के 10 सदस्य शामिल हैं। भाजपा सांसद संजय जायसवाल समिति के अध्यक्ष हैं।

विधेयक में विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले संगठनों से जुड़े नियमों में कई बदलाव प्रस्तावित हैं। इसमें ऐसी संस्थाओं की विदेशी अंशदान और संपत्तियों के प्रबंधन के लिए व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव है जिनका FCRA प्रमाणपत्र रद्द हो जाए, वे उसे वापस कर दें या उसका नवीनीकरण न हो। इसके लिए एक नामित प्राधिकरण की व्यवस्था प्रस्तावित की गई है।

प्रस्तावित कानून में यह भी प्रावधान है कि यदि किसी संगठन की संपत्ति पूजा स्थल से संबंधित है तो उसके धार्मिक स्वरूप को बनाए रखा जाए। इसके अलावा कुछ उल्लंघनों के लिए अधिकतम सजा पांच वर्ष से घटाकर एक वर्ष करने का प्रस्ताव भी विधेयक में शामिल है।

इस विधेयक को लेकर विपक्षी दलों और कुछ सामाजिक व धार्मिक संगठनों ने पहले भी सवाल उठाए हैं। विपक्ष का कहना है कि इसमें ऐसे प्रावधान हैं जिनका असर अल्पसंख्यक संस्थाओं और गैर सरकारी संगठनों पर पड़ सकता है। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि प्रस्तावित बदलाव विदेशी अंशदान के प्रबंधन में पारदर्शिता, जवाबदेही और कानूनी स्पष्टता बढ़ाने के उद्देश्य से किए गए हैं।

JPC में शामिल कई सांसद भी समिति को अधिक समय देने की मांग कर चुके हैं। नौ सदस्यों ने समिति के अध्यक्ष को पत्र लिखकर 12 अक्टूबर की प्रस्तावित बैठक को कम से कम चार सप्ताह के लिए टालने और सार्वजनिक परामर्श की अवधि बढ़ाने का आग्रह किया है। उनका कहना है कि विधेयक के व्यापक प्रभाव को देखते हुए विशेषज्ञों और अन्य पक्षों को अपनी राय देने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए।

समिति की बैठकों में गृह मंत्रालय और कानून मंत्रालय के अधिकारियों द्वारा विधेयक के विभिन्न प्रावधानों की जानकारी दी गई है। उपलब्ध संसदीय रिकॉर्ड के अनुसार 18 सितंबर को गृह मंत्रालय के प्रतिनिधियों ने समिति को विधेयक पर ब्रीफिंग दी थी।

वेणुगोपाल ने अपने पत्र में यह भी आग्रह किया है कि जब तक समिति विधेयक का व्यापक और वास्तविक परीक्षण पूरा नहीं कर लेती तब तक इसे दोबारा संसद में विचार के लिए न लाया जाए। उनका कहना है कि संसदीय समिति केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य विधेयक के प्रभाव, संभावित समस्याओं और हितधारकों की चिंताओं का विस्तार से अध्ययन करना है।

फिलहाल JPC की समीक्षा प्रक्रिया जारी है। समिति के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि कितने हितधारकों को बुलाया जाएगा, लिखित सुझावों के लिए कितना समय दिया जाएगा और रिपोर्ट किस समय सीमा के भीतर तैयार की जाएगी।

वेणुगोपाल के पत्र के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस और तेज हो सकती है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी सदस्य अधिक व्यापक परामर्श की मांग कर रहे हैं, जबकि सरकार विधेयक को मौजूदा व्यवस्था में सुधार और विदेशी अंशदान के बेहतर नियमन से जोड़कर देख रही है।

अब लोकसभा अध्यक्ष और JPC की ओर से आगे की प्रक्रिया पर नजर रहेगी। यदि समिति अतिरिक्त समय और व्यापक सार्वजनिक परामर्श का फैसला करती है तो रिपोर्ट की समय सीमा आगे बढ़ सकती है। वहीं यदि मौजूदा कार्यक्रम के अनुसार प्रक्रिया जारी रहती है तो विपक्ष समिति की कार्यप्रणाली पर अपनी आपत्तियां और तेज कर सकता है।

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