श्रीनगर : दिल्ली के जंतर-मंतर पर NEET-UG 2026 प्रश्नपत्र लीक विवाद को लेकर चला छात्र आंदोलन भले ही कश्मीर घाटी में किसी बड़े विरोध प्रदर्शन का कारण नहीं बना, लेकिन इसने वहां के युवाओं के बीच एक नई चर्चा जरूर शुरू कर दी है। घाटी के कई युवा इस आंदोलन को शांतिपूर्ण और मुद्दा आधारित लामबंदी की एक मिसाल के तौर पर देख रहे हैं।
कई लोगों का मानना है कि जंतर-मंतर पर हुआ आंदोलन यह दिखाता है कि स्पष्ट मांगों और शांतिपूर्ण तरीके से उठाए गए मुद्दों के आधार पर बड़े स्तर पर लोगों को जोड़ा जा सकता है। उनके अनुसार, यह तरीका उन परिस्थितियों से अलग है जहां टकराव और राजनीतिक तनाव अक्सर विरोध प्रदर्शनों को प्रभावित करते रहे हैं।
जंतर-मंतर आंदोलन बना चर्चा का विषय
दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में चला आंदोलन करीब एक महीने तक जारी रहा। यह प्रदर्शन NEET-UG 2026 प्रश्नपत्र लीक के आरोपों और प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता को लेकर किया गया था।
आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों ने परीक्षा प्रणाली में सुधार, पारदर्शिता बढ़ाने और छात्रों के हितों की सुरक्षा की मांग उठाई। आंदोलन के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और प्रतियोगी परीक्षाओं को अधिक भरोसेमंद बनाने के लिए सरकार की ओर से कई सुधारों की घोषणा के बाद प्रदर्शन समाप्त हुआ।
हालांकि मुख्य प्रदर्शन स्थल जंतर-मंतर ही रहा, लेकिन देश के कई हिस्सों में इसके समर्थन में आवाजें उठीं। रिपोर्टों के अनुसार, 30 से अधिक शहरों में आंदोलन के समर्थन में प्रदर्शन और कार्यक्रम आयोजित किए गए।
कश्मीर में नहीं हुआ प्रदर्शन, लेकिन चर्चा तेज
जहां देश के कई हिस्सों में इस आंदोलन को समर्थन मिला, वहीं कश्मीर घाटी में कोई बड़ा विरोध प्रदर्शन देखने को नहीं मिला। हालांकि, आंदोलन से जुड़े वीडियो, भाषण और सोशल मीडिया अपडेट्स घाटी में तेजी से साझा किए गए।
कश्मीर के कई युवाओं ने इस आंदोलन को ध्यान से देखा और इसे वहां होने वाले पारंपरिक विरोध प्रदर्शनों से अलग बताया। उनके अनुसार, दिल्ली का यह आंदोलन मुख्य रूप से शिक्षा, परीक्षा व्यवस्था और छात्रों के अधिकारों जैसे मुद्दों पर केंद्रित था।
कुछ युवाओं का कहना है कि घाटी में विरोध प्रदर्शनों का इतिहास अक्सर राजनीतिक और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों के आसपास रहा है, जबकि जंतर-मंतर का आंदोलन एक विशिष्ट सार्वजनिक मुद्दे को लेकर था।
शांतिपूर्ण आंदोलन की रणनीति पर बहस
कश्मीर में कई युवाओं के बीच यह सवाल चर्चा का विषय बना है कि क्या शिक्षा, रोजगार और अन्य नागरिक मुद्दों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से संगठित अभियान अधिक प्रभावी हो सकते हैं।
युवाओं का एक वर्ग मानता है कि जब मांगें स्पष्ट हों और आंदोलन का स्वरूप शांतिपूर्ण हो, तो समाज के अधिक लोगों को इससे जोड़ा जा सकता है। उनका कहना है कि ऐसे आंदोलनों में छात्रों और आम नागरिकों की भागीदारी बढ़ने की संभावना रहती है।
वहीं, कुछ लोगों का मानना है कि हर क्षेत्र की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियां अलग होती हैं, इसलिए किसी एक आंदोलन के मॉडल को सीधे दूसरे स्थानों पर लागू नहीं किया जा सकता।
सोशल मीडिया ने बढ़ाई पहुंच
जंतर-मंतर आंदोलन की पहुंच बढ़ाने में सोशल मीडिया की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। प्रदर्शन के वीडियो और छात्रों के संदेश तेजी से ऑनलाइन फैलते रहे।
कश्मीर के युवाओं तक भी यह सामग्री पहुंची, जिससे आंदोलन के तरीकों और परिणामों को लेकर बातचीत शुरू हुई। कई युवाओं ने सोशल मीडिया के माध्यम से इस मुद्दे पर अपनी राय रखी।
छात्रों के मुद्दों पर बढ़ा ध्यान
NEET-UG 2026 विवाद ने एक बार फिर प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता और छात्रों के भविष्य से जुड़े सवालों को सामने ला दिया है। देशभर में लाखों छात्र ऐसी परीक्षाओं पर निर्भर रहते हैं, इसलिए परीक्षा प्रक्रिया में भरोसा बनाए रखना एक महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है।
कश्मीर के युवाओं के बीच जंतर-मंतर आंदोलन को लेकर हो रही चर्चा यह संकेत देती है कि शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दे भी अब सार्वजनिक बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा बन रहे हैं।
घाटी में नई तरह की नागरिक भागीदारी पर विचार
हालांकि कश्मीर में इस आंदोलन को लेकर कोई प्रत्यक्ष प्रदर्शन नहीं हुआ, लेकिन इसके प्रभाव के रूप में युवाओं के बीच शांतिपूर्ण और मुद्दा आधारित भागीदारी को लेकर चर्चा जरूर शुरू हुई है।
जंतर-मंतर आंदोलन ने घाटी के कई युवाओं को यह सोचने का अवसर दिया है कि सामाजिक और नागरिक मुद्दों को उठाने के लिए किस तरह के रास्ते अपनाए जा सकते हैं। आने वाले समय में यह चर्चा किस दिशा में आगे बढ़ती है, इस पर नजर रहेगी।