नई दिल्ली। गर्मी के मौसम में ठंडी कोल्ड ड्रिंक पीना लोगों की आदत बन चुकी है। बाजार में मौजूद बड़े-बड़े ब्रांड दुनिया के कई देशों में अपने उत्पाद बेचते हैं, लेकिन अक्सर सवाल उठता है कि एक ही कंपनी की कोल्ड ड्रिंक भारत और विदेशों में अलग-अलग क्यों दिखती है? क्या कंपनियां अलग-अलग देशों के नियमों के हिसाब से अपने प्रोडक्ट में बदलाव करती हैं? यही सवाल अब स्वास्थ्य विशेषज्ञों और उपभोक्ताओं के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
कई रिपोर्ट्स में यह बात सामने आती रही है कि अलग-अलग देशों में खाद्य और पेय पदार्थों के लिए नियम अलग होते हैं। जिन देशों में शुगर, सामग्री और लेबलिंग को लेकर सख्त नियम हैं, वहां कंपनियों को उसी के अनुसार उत्पाद तैयार करने पड़ते हैं। वहीं भारत जैसे बड़े बाजारों में भी नियम मौजूद हैं, लेकिन उनके पालन और निगरानी को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।
एक ही ब्रांड, अलग-अलग फॉर्मूला क्यों?
दुनिया की बड़ी पेय कंपनियां कई देशों में अपना कारोबार करती हैं। लेकिन हर देश की सरकार खाद्य सुरक्षा, शुगर की मात्रा, पैकेजिंग और लेबलिंग के लिए अलग नियम तय करती है।
कंपनियां अक्सर स्थानीय नियमों और ग्राहकों की पसंद के अनुसार अपने उत्पाद में बदलाव करती हैं। कहीं कम शुगर वाली ड्रिंक ज्यादा लोकप्रिय होती है तो कहीं सामान्य स्वाद वाली ड्रिंक की मांग अधिक रहती है।
इसका मतलब यह नहीं है कि हर जगह उत्पाद की गुणवत्ता खराब होती है, लेकिन नियमों का अंतर कंपनियों की रणनीति को प्रभावित जरूर करता है।
शुगर को लेकर सबसे ज्यादा बहस
कोल्ड ड्रिंक को लेकर सबसे बड़ी चर्चा उसमें मौजूद चीनी की मात्रा को लेकर होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि ज्यादा मात्रा में मीठे पेय पदार्थों का सेवन मोटापा, डायबिटीज और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ा सकता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन भी लंबे समय से अतिरिक्त चीनी के सेवन को सीमित रखने की सलाह देता रहा है। इसी कारण कई देशों ने ज्यादा शुगर वाले पेय पदार्थों पर अतिरिक्त नियम और चेतावनी लेबल लागू किए हैं।
भारत में भी फूड सेफ्टी अथॉरिटी (FSSAI) की ओर से खाद्य और पेय पदार्थों के लिए मानक तय किए गए हैं, लेकिन उपभोक्ता संगठन लगातार बेहतर निगरानी की मांग करते रहे हैं।
कंपनियां कैसे बनाती हैं अलग रणनीति?
बड़ी कंपनियां किसी भी देश में कारोबार शुरू करने से पहले वहां के बाजार को समझती हैं। लोगों की पसंद, कीमत, टैक्स और सरकारी नियमों के आधार पर प्रोडक्ट की रणनीति तैयार की जाती है।
उदाहरण के तौर पर कुछ देशों में उपभोक्ता कम चीनी वाली ड्रिंक पसंद करते हैं, तो कंपनियां वहां डाइट या जीरो शुगर विकल्पों को ज्यादा बढ़ावा देती हैं।
वहीं कुछ बाजारों में पारंपरिक स्वाद और कम कीमत वाले उत्पाद ज्यादा बिकते हैं।
लेबलिंग पर भी उठते हैं सवाल
किसी भी खाद्य उत्पाद में लेबल सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। ग्राहक इसी के आधार पर तय करता है कि वह क्या खरीद रहा है।
लेबल पर चीनी, कैलोरी, सामग्री और अन्य जानकारी स्पष्ट होना जरूरी माना जाता है। अगर जानकारी साफ नहीं होगी तो उपभोक्ता सही फैसला नहीं ले पाएगा।
इसी वजह से दुनिया के कई देशों में कंपनियों को पैकेट और बोतल पर स्पष्ट जानकारी देने के लिए सख्त नियमों का पालन करना पड़ता है।
भारत में बढ़ती जागरूकता
भारत में भी अब लोग अपने खाने-पीने की चीजों को लेकर ज्यादा जागरूक हो रहे हैं। युवा और स्वास्थ्य को लेकर सतर्क रहने वाले लोग अब प्रोडक्ट खरीदने से पहले लेबल पढ़ने लगे हैं।
सोशल मीडिया के दौर में किसी भी उत्पाद को लेकर सवाल तेजी से उठते हैं। यही कारण है कि बड़ी कंपनियों पर भी उपभोक्ताओं की अपेक्षाएं बढ़ रही हैं।
सिर्फ कंपनियां नहीं, जिम्मेदारी उपभोक्ताओं की भी
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी चीज का असर उसके सेवन की मात्रा पर निर्भर करता है। कभी-कभार कोल्ड ड्रिंक पीना और रोजाना बड़ी मात्रा में इसका सेवन करना अलग-अलग बातें हैं।
लोगों को अपनी डाइट और स्वास्थ्य जरूरतों के अनुसार पेय पदार्थों का चुनाव करना चाहिए।
सरकार और कंपनियों की भूमिका
उपभोक्ताओं को सुरक्षित और सही जानकारी वाला उत्पाद मिले, इसके लिए सरकार की निगरानी व्यवस्था मजबूत होना जरूरी है।
वहीं कंपनियों की जिम्मेदारी है कि वे सभी देशों में गुणवत्ता और सुरक्षा के मानकों का पालन करें। केवल कानून का पालन करना ही नहीं, बल्कि ग्राहकों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखना भी जरूरी है।
क्या सच में भारत में अलग खेल हो रहा है?
यह कहना सही नहीं होगा कि सभी कंपनियां भारत में जानबूझकर खराब गुणवत्ता वाले उत्पाद बेचती हैं। लेकिन यह जरूर है कि अलग-अलग देशों के नियमों के कारण उत्पादों में अंतर आ सकता है।
जहां नियम ज्यादा सख्त होते हैं, वहां कंपनियों को ज्यादा सावधानी बरतनी पड़ती है। वहीं जहां निगरानी कमजोर होती है, वहां सुधार की गुंजाइश बनी रहती है।
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