नई दिल्ली : तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हुई राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने पहली बार खुलकर कांग्रेस, टीएमसी और भाजपा में अपने राजनीतिक अनुभवों पर विस्तार से बात की है। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक कांग्रेस और फिर तृणमूल कांग्रेस में रहने के बाद उन्हें यह महसूस हुआ कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और संघ परिवार, गांधी परिवार की तुलना में अधिक लोकतांत्रिक व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा की वैचारिक स्पष्टता और संगठनात्मक ढांचा ही उनके पार्टी में शामिल होने का सबसे बड़ा कारण बना।
एक साक्षात्कार में सुष्मिता देव ने बताया कि उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई से की थी। कई वर्षों तक कांग्रेस में सक्रिय रहने के बाद वर्ष 2021 में उन्होंने पार्टी छोड़कर तृणमूल कांग्रेस का दामन थामा। उन्होंने कहा कि उस समय कांग्रेस से टीएमसी में जाना किसी वैचारिक परिवर्तन का परिणाम नहीं था, क्योंकि ममता बनर्जी स्वयं कांग्रेस की पृष्ठभूमि से आई थीं। हालांकि, कुछ समय बाद उन्हें महसूस हुआ कि तृणमूल कांग्रेस का जनाधार मुख्य रूप से नेतृत्व-केंद्रित है और पार्टी की पहचान किसी स्पष्ट वैचारिक आधार पर नहीं टिकी है।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस और भाजपा दोनों की अपनी-अपनी वैचारिक पहचान है। उनके अनुसार, कांग्रेस का समर्थन करने वाले मतदाता भाजपा के विकल्प के रूप में उसे चुनते हैं, जबकि भाजपा का वोट बैंक विचारधारा से प्रेरित होता है। उन्होंने कहा कि भाजपा ने विपक्ष में रहते हुए भी अपनी विचारधारा से समझौता नहीं किया और सत्ता में आने के बाद भी उसी दिशा में काम किया है।
सुष्मिता देव ने तीनों दलों की आंतरिक कार्यप्रणाली की तुलना करते हुए कहा कि कांग्रेस में चुनाव के बाद समीक्षा बैठकें तो होती हैं, लेकिन निर्णयों को लागू करने में अक्सर एकरूपता और स्पष्टता की कमी दिखाई देती है। वहीं तृणमूल कांग्रेस में निर्णय लेने की प्रक्रिया पूरी तरह शीर्ष नेतृत्व पर निर्भर रहती है और चर्चा के लिए पर्याप्त मंच नहीं होता। इसके विपरीत उन्होंने भाजपा की संगठनात्मक संरचना की सराहना करते हुए कहा कि वहां सांसदों के लिए संवाद की स्पष्ट व्यवस्था है।
उन्होंने बताया कि भाजपा में प्रत्येक सांसद के लिए एक "गार्डियन मंत्री" होता है, जिसके माध्यम से वह अपने राज्य या क्षेत्र से जुड़े मुद्दे सीधे उठा सकता है। इसके अलावा संगठनात्मक स्तर पर भी संवाद के कई माध्यम उपलब्ध हैं। उन्होंने कहा कि यदि किसी मुद्दे का समाधान अन्य स्तरों पर नहीं होता तो प्रधानमंत्री, गृह मंत्री या संगठन के वरिष्ठ नेताओं तक भी अपनी बात पहुंचाई जा सकती है। उनके अनुसार, संघ परिवार की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उसका संपर्क जमीनी स्तर तक बना रहता है और वह लगातार समाज की नब्ज पर नजर रखता है।
आरएसएस की भूमिका पर बोलते हुए सुष्मिता देव ने कहा कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से संघ के किसी वरिष्ठ पदाधिकारी से मुलाकात नहीं की है, लेकिन उनका मानना है कि संघ परिवार एक व्यापक संगठन है, जिसमें अनेक अनुभवी लोग विभिन्न स्तरों पर कार्य करते हैं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस में यदि शीर्ष नेतृत्व किसी नेता से नाराज हो जाए तो उसके राजनीतिक भविष्य पर असर पड़ सकता है, जबकि भाजपा में योग्य और सक्रिय कार्यकर्ताओं के लिए आगे बढ़ने के अवसर बने रहते हैं।
उन्होंने कांग्रेस की उस आलोचना का भी जवाब दिया, जिसमें भाजपा पर संघ परिवार के प्रभाव का आरोप लगाया जाता है। सुष्मिता देव ने कहा कि कांग्रेस स्वयं गांधी परिवार के नेतृत्व में संचालित होती है, जबकि भाजपा के लिए संघ परिवार एक वैचारिक मार्गदर्शक संस्था है। उनके अनुसार, संघ परिवार एक व्यक्ति या परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि एक बड़ा संगठन है, जहां अलग-अलग विचारों और अनुभवों को स्थान मिलता है। इसी कारण उन्होंने संघ परिवार को गांधी परिवार की तुलना में अधिक लोकतांत्रिक बताया।
कांग्रेस की वर्तमान राजनीतिक दिशा पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि समय के साथ पार्टी ने अपनी मूल विचारधारा को कमजोर किया है। उन्होंने महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ गठबंधन, तमिलनाडु और असम की राजनीतिक रणनीतियों का उदाहरण देते हुए कहा कि कांग्रेस ने कई बार अपने पुराने राजनीतिक सिद्धांतों से समझौता किया। उनके अनुसार, आज की कांग्रेस वैसी नहीं रही जैसी उनके पिता और वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिवंगत संतोष मोहन देव के समय हुआ करती थी।
तृणमूल कांग्रेस छोड़ने के अपने फैसले पर सुष्मिता देव ने कहा कि उन्हें महसूस हुआ कि बंगाल के बाहर पार्टी का विस्तार सीमित है और राष्ट्रीय स्तर पर उसके लिए आगे बढ़ना आसान नहीं होगा। उन्होंने बताया कि उत्तर-पूर्व में भाजपा की बढ़ती स्वीकार्यता, संगठनात्मक मजबूती और विकास की राजनीति को देखते हुए उन्होंने भाजपा का दामन थामने का निर्णय लिया। उन्होंने कहा कि असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से चर्चा के बाद उन्हें विश्वास हो गया कि आने वाले वर्षों में अपने क्षेत्र और लोगों के लिए प्रभावी ढंग से काम करने का सबसे बेहतर मंच भाजपा ही है।