दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में स्पेशल टास्क फोर्स (STF) के लिए बनाए गए विशेष थानों और उनसे जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए निर्धारित विशेष अदालतों के अधिकार क्षेत्र को लेकर कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट के इस कदम के बाद पश्चिम बंगाल सरकार को बड़ी राहत मिली है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने पश्चिम बंगाल सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के आदेश को फिलहाल स्थगित कर दिया। पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे। अदालत ने मामले में नोटिस जारी करते हुए आगे की सुनवाई जारी रखने का फैसला किया।
क्या था कलकत्ता हाईकोर्ट का फैसला?
कलकत्ता हाईकोर्ट ने इससे पहले पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से जारी उन अधिसूचनाओं को रद्द कर दिया था, जिनके तहत STF के लिए अलग पुलिस थाने बनाए गए थे और उनके मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों का निर्धारण किया गया था।
हाईकोर्ट का कहना था कि राज्य सरकार केवल प्रशासनिक आदेश के जरिए आपराधिक न्याय व्यवस्था में बड़ा बदलाव नहीं कर सकती। अदालत ने कहा था कि STF का गठन वैध है, लेकिन उसके लिए अलग थाने और अलग अदालतों की व्यवस्था बनाने का अधिकार सरकार के पास सीमित है।
STF थानों और अदालतों का मामला क्या है?
पश्चिम बंगाल सरकार ने STF के कामकाज को प्रभावी बनाने के लिए साल 2025 में दो महत्वपूर्ण अधिसूचनाएं जारी की थीं। इनमें साल्ट लेक STF मुख्यालय पुलिस स्टेशन और सिलीगुड़ी STF मुख्यालय पुलिस स्टेशन के गठन का प्रावधान किया गया था।
इसके बाद इन थानों में दर्ज मामलों की सुनवाई के लिए कुछ विशेष अदालतों को अधिकार क्षेत्र दिया गया था। साल्ट लेक STF थाने से जुड़े मामलों के लिए बिधाननगर की अदालतों और सिलीगुड़ी STF थाने के मामलों के लिए सिलीगुड़ी की अदालतों को जिम्मेदारी दी गई थी।
STF का गठन क्यों किया गया था?
पश्चिम बंगाल STF का गठन संगठित अपराध, आतंकवाद, अवैध हथियारों की तस्करी, मादक पदार्थों के कारोबार और अन्य गंभीर अपराधों से निपटने के उद्देश्य से किया गया था।
बदलते समय में साइबर अपराध, संगठित गिरोह और अंतरराज्यीय अपराधों के बढ़ने के कारण विशेष जांच एजेंसियों की जरूरत महसूस की गई। STF को इसी उद्देश्य से मजबूत बनाया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि साइबर अपराध जैसे नए अपराधों के दौर में अधिक अदालतों और बेहतर व्यवस्था की जरूरत है। उन्होंने सवाल किया कि अगर अपराधों की प्रकृति बदल रही है तो नई व्यवस्थाओं को लेकर आपत्ति क्यों होनी चाहिए।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम फैसला नहीं दिया है। फिलहाल हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाई गई है और मामले की आगे सुनवाई होगी।
पश्चिम बंगाल सरकार को राहत
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पश्चिम बंगाल सरकार को बड़ी राहत मिली है क्योंकि हाईकोर्ट के आदेश के बाद STF थानों और विशेष अदालतों की व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए थे।
राज्य सरकार का तर्क रहा है कि STF जैसे विशेष बलों के लिए अलग व्यवस्था जरूरी है ताकि गंभीर अपराधों की जांच और सुनवाई तेजी से हो सके।
याचिका किसने दायर की थी?
कलकत्ता हाईकोर्ट में यह मामला जलपाईगुड़ी बार एसोसिएशन से जुड़े सदस्यों की ओर से उठाया गया था। याचिकाकर्ताओं ने सरकार की अधिसूचनाओं को चुनौती देते हुए कहा था कि आपराधिक न्याय प्रणाली में इस तरह बदलाव करने के लिए उचित कानूनी प्रक्रिया जरूरी है।
कानूनी विशेषज्ञों की नजर
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला केवल STF तक सीमित नहीं है बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि राज्य सरकारें आपराधिक न्याय व्यवस्था में किस सीमा तक प्रशासनिक आदेशों के जरिए बदलाव कर सकती हैं।
एक तरफ सरकारें अपराधों की बदलती प्रकृति को देखते हुए नई व्यवस्थाएं बनाना चाहती हैं, वहीं दूसरी तरफ न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि ऐसी व्यवस्थाएं कानून के दायरे में रहें।
आगे क्या होगा?
अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की अंतिम सुनवाई महत्वपूर्ण होगी। अदालत यह तय करेगी कि पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा बनाई गई STF थानों और विशेष अदालतों की व्यवस्था कानूनी रूप से सही है या नहीं।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद STF की मौजूदा व्यवस्था जारी रहेगी। आने वाले समय में इस मामले का फैसला देश में विशेष जांच एजेंसियों और अदालतों के अधिकार क्षेत्र को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।
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