नई दिल्ली। बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनाव आयोग के कामकाज को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सुनवाई स्थगित कर दी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने याचिकाकर्ताओं को चुनाव आयोग के हलफनामे का जवाब देने के लिए 10 दिन का समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को निर्धारित की गई है। इस दौरान अदालत ने मतदाता पंजीकरण के फॉर्म-6 में कथित बदलाव को लेकर दाखिल नई याचिका पर भी निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी किया।
इस मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यशैली और आयोग के कुछ महत्वपूर्ण फैसलों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि चुनाव आयोग से जुड़े कई निर्णय निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना एकतरफा तरीके से लिए गए। हालांकि, चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए अपने फैसलों को कानून के अनुरूप बताया है।
सुप्रीम कोर्ट ने 17 नवंबर तक टाली सुनवाई
मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई।
याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने अदालत को बताया कि चुनाव आयोग का जवाबी हलफनामा सुनवाई से एक रात पहले ही उपलब्ध कराया गया है।
उन्होंने कहा कि हलफनामे में आयोग ने कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपना पक्ष रखा है। ऐसे में उसका अध्ययन करने और जवाब तैयार करने के लिए अतिरिक्त समय की आवश्यकता है।
अदालत ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ताओं को 10 दिन का समय प्रदान किया। साथ ही चुनाव आयोग को भी अतिरिक्त हलफनामा दाखिल करने के लिए 10 दिन दिए गए।
इसके बाद मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को तय की गई।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर क्या हैं आरोप?
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिकाओं में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कुछ फैसलों और चुनाव आयोग के संचालन के तरीके पर सवाल उठाए गए हैं।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि आयोग में महत्वपूर्ण फैसले लेते समय अन्य निर्वाचन आयुक्तों की सहमति और निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया।
विशेष रूप से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े निर्णयों को लेकर आपत्ति जताई गई है।
एक याचिका में दावा किया गया है कि आयोग के 14 महत्वपूर्ण निर्णय कथित तौर पर एकतरफा तरीके से लिए गए। याचिकाकर्ताओं ने इन फैसलों की वैधता की जांच करने और कानून के खिलाफ पाए जाने पर उन्हें निरस्त करने की मांग की है।
हालांकि, इन आरोपों की न्यायिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
चुनाव आयोग ने आरोपों को किया खारिज
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जवाबी हलफनामे में मुख्य चुनाव आयुक्त पर लगाए गए आरोपों से इनकार किया है।
आयोग का कहना है कि एसआईआर से संबंधित तीन महत्वपूर्ण आदेश सर्वसम्मति से पारित किए गए थे।
इनमें 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 से संबंधित आदेश शामिल हैं।
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि महत्वपूर्ण मामलों पर निर्णय निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुसार लिए जाते हैं और किसी एक अधिकारी ने मनमाने तरीके से फैसले नहीं किए।
आयोग ने याचिका की स्वीकार्यता पर भी सवाल उठाया है। उसका तर्क है कि कुछ आरोप समाचार रिपोर्टों पर आधारित हैं और संबंधित तथ्यों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है।
आयोग ने अदालत से संबंधित याचिकाओं को खारिज करने का अनुरोध किया है।
फॉर्म-6 में बदलाव को लेकर नया विवाद
सुप्रीम कोर्ट में मतदाता पंजीकरण के लिए उपयोग किए जाने वाले फॉर्म-6 से संबंधित विवाद भी उठाया गया है।
तृणमूल कांग्रेस की सांसद डोला सेन ने याचिका दाखिल कर आरोप लगाया है कि बिहार में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान फॉर्म-6 से संबंधित व्यवस्था में बदलाव किए गए।
उनका कहना है कि मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया में किए गए कथित बदलावों की कानूनी वैधता की जांच जरूरी है।
इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
दूसरी तरफ चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि फॉर्म-6 में कोई विधिक संशोधन नहीं किया गया। आयोग के अनुसार, एसआईआर प्रक्रिया के लिए अतिरिक्त घोषणा-पत्र की व्यवस्था को फॉर्म में बदलाव नहीं माना जा सकता।
आयोग ने यह भी कहा कि निर्धारित पंजीकरण फॉर्म में बदलाव का अधिकार केंद्र सरकार के पास है।
अदालत ने पहले भी फॉर्म-6 पर की थी टिप्पणी
इससे पहले 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म-6 से जुड़े विवाद पर महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया था।
अदालत ने कहा था कि बिहार में एसआईआर से संबंधित पूर्व सुनवाई के दौरान नए फॉर्म-6 की वैधता पर अंतिम निर्णय नहीं किया गया था।
पीठ ने स्पष्ट किया कि उसकी पिछली टिप्पणियों को फॉर्म-6 में कथित बदलाव की स्वीकृति या अस्वीकृति नहीं माना जाना चाहिए।
अदालत ने संकेत दिया था कि संबंधित दस्तावेजों और कानूनी प्रावधानों का परीक्षण किया जाएगा।
इस स्पष्टीकरण के बाद फॉर्म-6 में बदलाव को लेकर चल रही कानूनी बहस और महत्वपूर्ण हो गई है।
क्या है बिहार की एसआईआर प्रक्रिया?
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन चुनाव आयोग की वह प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से मतदाता सूची की विस्तृत जांच और अद्यतन किया जाता है।
इस प्रक्रिया का घोषित उद्देश्य पात्र मतदाताओं के नाम सूची में सुनिश्चित करना और नियमों के अनुसार अपात्र या गलत प्रविष्टियों की पहचान करना है।
हालांकि, बिहार में एसआईआर के दौरान मतदाताओं से मांगे गए दस्तावेजों, नाम हटाने की प्रक्रिया और पंजीकरण संबंधी व्यवस्थाओं पर विवाद सामने आया।
विपक्षी दलों और विभिन्न याचिकाकर्ताओं ने आशंका जताई कि प्रक्रिया में खामियां होने से पात्र मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना उसका संवैधानिक दायित्व है।
ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग पर क्या हुआ?
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद पर काम करने से रोकने की मांग भी एक याचिका में उठाई गई थी।
इससे पहले 5 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ एकतरफा अंतरिम आदेश पारित करने से इनकार कर दिया था।
अदालत ने कहा था कि पहले संबंधित तथ्यों और दस्तावेजों की जांच करना आवश्यक है।
चुनाव आयोग ने अपने जवाब में संविधान के अनुच्छेद 324(5) का हवाला दिया है। आयोग का कहना है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया विशेष रूप से निर्धारित है।
इसलिए केवल आरोपों के आधार पर उन्हें पद पर कार्य करने से रोकने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।
अब 17 नवंबर की सुनवाई पर टिकी निगाहें
सुप्रीम कोर्ट में लंबित इन याचिकाओं का महत्व केवल बिहार की मतदाता सूची तक सीमित नहीं है। इनमें चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया, संवैधानिक स्वतंत्रता और जवाबदेही से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी सवाल भी शामिल हैं।
आगामी सुनवाई में याचिकाकर्ता चुनाव आयोग के हलफनामे का जवाब प्रस्तुत कर सकते हैं। वहीं आयोग अपने पक्ष में अतिरिक्त दस्तावेज और स्पष्टीकरण दाखिल कर सकेगा।
अदालत के सामने मुख्य प्रश्न यह होगा कि एसआईआर से संबंधित फैसले कानून और निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुरूप लिए गए थे या नहीं।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने आरोपों की सत्यता पर कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है। ऐसे में सभी पक्षों की निगाहें 17 नवंबर की सुनवाई पर रहेंगी।