दिल्ली :  जंतर-मंतर पर कथित परीक्षा अनियमितताओं और छात्रों से जुड़े मुद्दों को लेकर हुए आंदोलन के दौरान सामने आया विजेता दहिया का कथित 'बर्गर कांड' एक बार फिर चर्चा में है। पर्यावरण और शिक्षा कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने इस विवाद पर अपनी बात रखते हुए साफ किया है कि उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की कोर टीम के सदस्यों से कभी यह अपेक्षा नहीं की थी कि वे भी उनके साथ भूख हड़ताल करें। वांगचुक के मुताबिक आंदोलन को चलाने के लिए अलग-अलग लोगों की अलग जिम्मेदारियां थीं और कोर टीम के सदस्यों के लिए भोजन करना अपने आप में कोई गलत बात नहीं थी।
यह मामला जुलाई में उस समय चर्चा में आया था जब CJP के तत्कालीन प्रवक्ता विजेता दहिया का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। वीडियो में उन्हें कथित तौर पर एक फास्ट-फूड आउटलेट पर बर्गर खाते हुए दिखाया गया था। उसी दौरान आंदोलन से जुड़े प्रदर्शनकारी सड़कों पर मौजूद थे और पुलिस कार्रवाई को लेकर विवाद चल रहा था। वीडियो का सटीक समय और पूरा संदर्भ स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हुआ था, लेकिन सोशल मीडिया पर इसे लेकर दहिया की जमकर आलोचना हुई।
सोनम वांगचुक ने क्या कहा?
सोनम वांगचुक ने अब इस पूरे विवाद पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि CJP के कोर ग्रुप में शामिल लोगों से उनकी यह अपेक्षा नहीं थी कि वे भी अनशन करें। उनके अनुसार आंदोलन के दौरान कोर टीम के सदस्यों पर व्यवस्था संभालने, लोगों से संवाद करने और दूसरी जिम्मेदारियां निभाने का काम था।
इसलिए वे चाहते थे कि टीम के सदस्य सामान्य रूप से भोजन करें और अपनी जिम्मेदारियां निभाने के लिए शारीरिक रूप से सक्षम रहें। यानी वांगचुक की बात का सार यह है कि भूख हड़ताल उनकी अपनी भूमिका और विरोध का तरीका था, इसे आंदोलन में शामिल हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य नहीं माना गया था।
इस बयान के बाद विजेता दहिया के बर्गर खाने को लेकर पैदा हुआ विवाद एक बार फिर नए संदर्भ में देखा जा रहा है।
आखिर क्या था 'बर्गर कांड'?
20 जुलाई के आसपास CJP के 'चलो संसद' अभियान के दौरान सोशल मीडिया पर विजेता दहिया का एक वीडियो तेजी से वायरल हुआ था। इसमें उन्हें कथित तौर पर एक मॉल के फास्ट-फूड आउटलेट में खाना खाते दिखाया गया।
इस वीडियो के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर सवाल उठे कि जब संगठन के कार्यकर्ता और समर्थक प्रदर्शन में मौजूद थे तो पार्टी के प्रवक्ता वहां से अलग होकर खाना क्यों खा रहे थे।
मामला इतना बढ़ा कि CJP ने दहिया को प्रवक्ता पद से हटा दिया। संगठन ने उनके व्यवहार को उस समय की परिस्थितियों में असंवेदनशील बताया था।
विजेता दहिया ने भी दी थी सफाई
विजेता दहिया ने विवाद के बाद अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि उन्होंने आंदोलन में लगातार काम किया था और दो रातों से ठीक से सोए तक नहीं थे। उनका कहना था कि वह प्रदर्शन स्थल पर मौजूद रहे और आंदोलन की जिम्मेदारियां निभाते रहे।
दहिया ने दावा किया था कि उन्हें केवल वायरल वीडियो के आधार पर निशाना बनाया गया और आंदोलन को बचाने के लिए 'बलि का बकरा' बना दिया गया। उन्होंने यह भी सवाल उठाया था कि जब दूसरे लोग भोजन कर सकते हैं तो उनके बर्गर खाने को इतना बड़ा मुद्दा क्यों बनाया गया।
दहिया का कहना था कि खाना शरीर की बुनियादी जरूरत है और वह स्वयं भूख हड़ताल पर नहीं थे।
सोनम के बयान से विवाद को मिला नया मोड़
अब सोनम वांगचुक की टिप्पणी महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि उन्होंने भी कहा है कि CJP की कोर टीम से उन्होंने अनशन करने की उम्मीद नहीं की थी।
उनके मुताबिक अगर आंदोलन चलाने वाले सभी लोग भूखे रहते तो संगठन और प्रदर्शन से जुड़ी व्यवस्थाओं को संभालना मुश्किल हो सकता था। आंदोलन के दौरान कुछ लोगों को अनशन करना था तो कुछ लोगों को दूसरे काम संभालने थे।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि वांगचुक ने दहिया से जुड़े पूरे विवाद या उस समय सामने आए उनके कथित व्यवहार का समर्थन किया। उनका बयान मुख्य रूप से इस सवाल पर था कि CJP की कोर टीम के लोगों के लिए अनशन करना जरूरी था या नहीं।
फिर CJP ने दहिया को क्यों हटाया?
CJP की कार्रवाई का मुख्य आधार केवल खाना खाना नहीं बल्कि उस समय का संदर्भ बताया गया था। संगठन ने कहा था कि जब प्रदर्शनकारी और टीम के अन्य सदस्य पुलिस कार्रवाई का सामना कर रहे थे, उस समय सामने आए वीडियो और उसके बाद की प्रतिक्रिया को असंवेदनशील माना गया।
इसके बाद विजेता दहिया को प्रवक्ता पद और संगठन की आधिकारिक जिम्मेदारियों से हटा दिया गया।
हालांकि विवाद के करीब एक महीने बाद CJP के संयोजक अभिजीत दीपके का रुख कुछ नरम दिखाई दिया। उन्होंने कहा कि संगठन दहिया की वापसी पर भविष्य में विचार कर सकता है। दीपके ने दहिया को अच्छा इंसान भी बताया, लेकिन आंदोलन के दौरान हुए घटनाक्रम को असंवेदनशील करार दिया।
CJP के लोगों ने अनशन क्यों नहीं किया?
सोनम वांगचुक के मुताबिक इसकी सबसे बड़ी वजह आंदोलन में काम का बंटवारा था। उनका मानना था कि अनशन उनका अपना विरोध का तरीका था, जबकि CJP की टीम को आंदोलन का संचालन करना था।
प्रदर्शन स्थल की व्यवस्था, समर्थकों के साथ तालमेल, मीडिया से बातचीत और दूसरी गतिविधियों के लिए ऐसे लोगों की जरूरत थी जो सक्रिय रह सकें।
इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि कोर ग्रुप के लोगों के भोजन करने पर उन्हें आपत्ति नहीं थी। यानी आंदोलन का समर्थन करने का मतलब यह नहीं था कि हर समर्थक को भूख हड़ताल पर बैठना ही पड़े।
26 दिन चला था वांगचुक का अनशन
सोनम वांगचुक ने कथित परीक्षा अनियमितताओं और छात्रों के मुद्दों को लेकर 26 दिनों तक भूख हड़ताल की थी। बाद में उन्होंने अपना अनशन समाप्त कर दिया। उनके मुताबिक उनकी प्राथमिकताओं में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई न होना, परीक्षा व्यवस्था में जवाबदेही पर चर्चा और प्रभावित परिवारों से जुड़े मुद्दे शामिल थे।
उन्होंने यह भी कहा था कि उनका मुख्य उद्देश्य छात्रों को किसी तरह की कानूनी परेशानी से बचाना था। सरकार की ओर से कुछ मांगों पर लिखित आश्वासन मिलने के बाद उन्होंने अनशन समाप्त किया।
वांगचुक ने बताया था कि वह शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल लोगों के खिलाफ मुकदमे न दर्ज किए जाने का लिखित भरोसा चाहते थे और इसी मुद्दे पर उन्होंने बातचीत के दौरान जोर दिया।
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बिना क्यों तोड़ा अनशन?
आंदोलन के दौरान तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग प्रमुख मुद्दों में शामिल थी। हालांकि वांगचुक ने इस्तीफा हुए बिना अपना अनशन खत्म कर दिया था।
इस पर उन्होंने बाद में कहा कि उनकी प्राथमिकता छात्रों और प्रदर्शनकारियों को कानूनी कार्रवाई से बचाना थी। उनके मुताबिक अनशन को किसी एक व्यक्ति के इस्तीफे तक सीमित करने के बजाय छात्रों से जुड़े व्यापक मुद्दों और जवाबदेही पर ध्यान देना जरूरी था।
दूसरी तरफ CJP ने उस समय कहा था कि वांगचुक का अनशन खत्म होने के बावजूद उसका आंदोलन जारी रहेगा और वह धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करता रहेगा। 
बर्गर विवाद से आंदोलन तक
विजेता दहिया का 'बर्गर कांड' सोशल मीडिया पर आंदोलन की गंभीरता और उसके नेतृत्व को लेकर बड़ी बहस में बदल गया था। लेकिन सोनम वांगचुक के ताजा बयान ने साफ किया है कि उनकी नजर में आंदोलन के हर सदस्य का भूख हड़ताल पर रहना जरूरी नहीं था।
उनके अनुसार अनशन करने वालों और आंदोलन की दूसरी जिम्मेदारियां संभालने वालों की भूमिका अलग-अलग थी। इसलिए CJP के कोर सदस्यों के भोजन करने को वे अपने अनशन के खिलाफ नहीं मानते थे।
वहीं दहिया को हटाने का फैसला CJP ने उस समय सामने आए वीडियो और परिस्थितियों में उनके व्यवहार को लेकर किया था। ऐसे में सोनम वांगचुक का बयान 'बर्गर कांड' को नया संदर्भ जरूर देता है, लेकिन CJP की उस समय की कार्रवाई और विवाद से जुड़े सभी सवालों को स्वतः खत्म नहीं करता।
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