नई दिल्ली। देश में मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता और मेडिकल कॉलेजों की निगरानी से जुड़े नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि 'मेंटेनेंस ऑफ स्टैंडर्ड्स ऑफ मेडिकल एजुकेशन रेगुलेशंस, 2023' (MSMER-2023) को वापस लेने का उद्देश्य मेडिकल शिक्षा के मानकों को कमजोर करना नहीं, बल्कि नियामक व्यवस्था को अधिक स्पष्ट और प्रभावी बनाना है। आयोग ने कहा कि इस फैसले से मेडिकल कॉलेजों की निगरानी और तय शैक्षणिक मानकों के अनुपालन की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होगी।एनएमसी के अनुसार, यह कदम नियामक प्रक्रियाओं में दोहराव खत्म करने, विभिन्न बोर्डों की जिम्मेदारियां स्पष्ट करने और मेडिकल कॉलेजों के लिए अनुपालन संबंधी आवश्यकताओं को सरल बनाने के उद्देश्य से उठाया गया है।
2023 के नियमों को वापस लेने का फैसला
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने 14 अक्टूबर 2026 की अधिसूचना के माध्यम से MSMER-2023 को वापस लेने की घोषणा की थी। यह अधिसूचना 17 अक्टूबर को सरकारी राजपत्र में प्रकाशित हुई।इन नियमों को मूल रूप से सितंबर 2023 में लागू किया गया था। इनके अंतर्गत मेडिकल कॉलेजों में निर्धारित शैक्षणिक मानकों का पालन सुनिश्चित करने, वार्षिक जानकारी प्राप्त करने और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई की व्यवस्था की गई थी।हालांकि, आयोग ने कहा कि नियम वापस लेने के बावजूद मेडिकल संस्थानों को वार्षिक प्रकटीकरण रिपोर्ट (ADR) जमा करानी होगी।
मेडिकल शिक्षा के मानकों में नहीं होगी कमी
एनएमसी ने अपनी सफाई में कहा कि नियमों को वापस लेने का अर्थ मेडिकल शिक्षा के शैक्षणिक मानकों में ढील देना नहीं है।आयोग के मुताबिक, मेडिकल कॉलेजों को शिक्षकों की उपलब्धता, बुनियादी ढांचे, शैक्षणिक सुविधाओं और अन्य निर्धारित आवश्यकताओं का पालन करना होगा।एनएमसी ने बताया कि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019 के तहत विभिन्न स्वायत्त बोर्डों के अधिकार और जिम्मेदारियां पहले से निर्धारित हैं।ऐसे में एक ही काम के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं बनाए रखने के बजाय नियामक जिम्मेदारियों को स्पष्ट करना आवश्यक था।
UGMEB और PGMEB की क्या है जिम्मेदारी?
एनएमसी अधिनियम, 2019 के अनुसार, अंडरग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन बोर्ड (UGMEB) और पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन बोर्ड (PGMEB) मेडिकल शिक्षा से जुड़े शैक्षणिक मानक निर्धारित करने के लिए जिम्मेदार हैं।इन बोर्डों का प्रमुख कार्य एमबीबीएस और स्नातकोत्तर मेडिकल पाठ्यक्रमों के लिए न्यूनतम आवश्यकताएं, पाठ्यक्रम संबंधी नियम और शैक्षणिक मानक तैयार करना है।आयोग ने स्पष्ट किया कि इन बोर्डों की भूमिका मुख्य रूप से शैक्षणिक गुणवत्ता के मानक तय करने से संबंधित है।
मेडिकल कॉलेजों की जांच करेगा MARB
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम की धारा 26 के तहत मेडिकल असेसमेंट एंड रेटिंग बोर्ड (MARB) को मेडिकल संस्थानों के मूल्यांकन और निरीक्षण की जिम्मेदारी दी गई है।इस बोर्ड का काम यह जांचना है कि मेडिकल कॉलेज निर्धारित मानकों का पालन कर रहे हैं या नहीं।यदि किसी मेडिकल संस्थान में कमियां पाई जाती हैं, तो संबंधित वैधानिक प्रावधानों के अनुसार नियामक कार्रवाई की जा सकती है।एनएमसी का कहना है कि MSMER-2023 के तहत UGMEB और PGMEB के माध्यम से भी संस्थानों के मूल्यांकन और वार्षिक अनुपालन की समानांतर व्यवस्था बन गई थी। इससे नियामक कार्यों में दोहराव हो रहा था।
अदालती टिप्पणियों के बाद लिया फैसला
आयोग के अनुसार, अदालती टिप्पणियों और कानूनी प्रावधानों की विस्तृत समीक्षा के बाद नियमों को वापस लेने का निर्णय लिया गया।एनएमसी ने कहा कि विभिन्न बोर्डों की जिम्मेदारियां आयोग अधिनियम के अनुरूप रहनी चाहिए।इस बदलाव का उद्देश्य मेडिकल कॉलेजों के लिए प्रशासनिक प्रक्रियाओं को आसान बनाना और नियामक व्यवस्था में स्पष्टता लाना है।आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि पहले दिए गए अनुमोदन, नवीनीकरण और अन्य निर्णय नियमों की वापसी से प्रभावित नहीं होंगे।इसके अलावा पहले से लंबित मामलों को अधिसूचना में निर्धारित प्रावधानों के अनुसार निपटाया जाएगा।
वार्षिक रिपोर्ट जमा करना रहेगा अनिवार्य
एनएमसी ने मेडिकल कॉलेजों को स्पष्ट किया है कि उन्हें पहले की तरह वार्षिक प्रकटीकरण रिपोर्ट जमा करनी होगी।इस रिपोर्ट में संस्थानों के शिक्षकों, बुनियादी सुविधाओं और अन्य आवश्यक जानकारियों का विवरण दिया जाता है।वार्षिक रिपोर्ट जमा करने की अनिवार्यता एनएमसी अधिनियम, 2019 की धारा 24 और 25 के संबंधित प्रावधानों के अंतर्गत जारी रहेगी।आयोग के अनुसार, इस व्यवस्था से संस्थानों के कामकाज की जानकारी प्राप्त करने और निर्धारित मानकों के अनुपालन की निगरानी में मदद मिलेगी।
जुर्माने के प्रावधान हटने पर भी उठे सवाल
हालांकि, MSMER-2023 को वापस लेने से नियमों के उल्लंघन पर निर्धारित कुछ विशेष दंडात्मक प्रावधान भी समाप्त हो गए हैं।इनमें मेडिकल कॉलेजों पर एक करोड़ रुपये तक जुर्माना और गलत जानकारी देने वाले शिक्षकों या प्रशासकों पर पांच लाख रुपये तक जुर्माने की व्यवस्था शामिल थी।इन प्रावधानों के हटने के बाद मेडिकल संस्थानों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के तरीकों को लेकर सवाल उठे हैं।एनएमसी ने स्पष्ट किया है कि मेडिकल शिक्षा की निगरानी जारी रहेगी। हालांकि, भविष्य में नियमों के उल्लंघन पर किस प्रक्रिया के तहत कार्रवाई होगी, इसकी व्यावहारिक स्थिति संबंधित वैधानिक प्रावधानों और आगे जारी होने वाले दिशानिर्देशों से स्पष्ट होगी।
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