नई दिल्ली। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से स्वतंत्रता दिवस के भाषण में इस्तेमाल किए गए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर स्पष्टीकरण दिया है। रिजिजू ने कहा कि प्रधानमंत्री ने विपक्षी दलों या उनके नेताओं को ‘दिमागी नक्सल’ नहीं कहा था। उनके मुताबिक यह टिप्पणी माओवादी विचारधारा, अलगाववाद और देश की एकता को कमजोर करने वाले विचारों का समर्थन करने वालों के संदर्भ में की गई थी।
केंद्रीय मंत्री ने रविवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट साझा कर प्रधानमंत्री के बयान की व्याख्या की। रिजिजू ने कहा कि जो लोग माओवादियों का समर्थन करते हैं, भारतीय संविधान को अस्वीकार करते हैं, अलगाववादी ताकतों के साथ खड़े होते हैं या भारत की एकता और अखंडता को नुकसान पहुंचाने वाले विचारों को बढ़ावा देते हैं, उन्हें इस श्रेणी में रखा गया है।
उन्होंने अनुच्छेद 370 को बहाल करने की मांग करने वालों और पूर्वोत्तर भारत को देश के अन्य हिस्सों से अलग करने की बात करने वालों का भी उल्लेख किया। हालांकि, ‘दिमागी नक्सल’ कोई विधिक या आधिकारिक रूप से परिभाषित श्रेणी नहीं है। रिजिजू की ओर से बताई गई बातें इस राजनीतिक अभिव्यक्ति को लेकर सरकार की व्याख्या हैं।
रिजिजू ने अपनी पोस्ट के साथ शर्जील इमाम के एक पुराने बयान का वीडियो भी साझा किया। शर्जील इमाम पर वर्ष 2020 के दिल्ली दंगों और नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शनों से संबंधित कई मामले दर्ज हैं। वीडियो में कथित रूप से पूर्वोत्तर भारत को देश के बाकी हिस्सों से अलग करने की बात कही गई थी। रिजिजू ने इस बयान का हवाला देते हुए कहा कि देश को तोड़ने वाले ऐसे विचार ही प्रधानमंत्री की टिप्पणी के निशाने पर थे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल किया था। उन्होंने कहा था कि देश में हथियारबंद नक्सलवाद का प्रभाव कम हो रहा है, लेकिन माओवादी सोच का समर्थन करने वाले कुछ लोग अब भी समाज को भटकाने और अस्थिरता पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री ने देश से ऐसे तत्वों की पहचान करने और उन्हें अलग-थलग करने की अपील की थी। उन्होंने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा अभियानों और विकास योजनाओं का जिक्र करते हुए कहा था कि कई इलाकों में हिंसक गतिविधियां कम हुई हैं और लोग मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं।
प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद कांग्रेस, वाम दलों और अन्य विपक्षी दलों ने सरकार पर निशाना साधा था। विपक्षी नेताओं ने आशंका जताई कि ‘दिमागी नक्सल’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल सरकार की नीतियों से असहमति रखने वाले लोगों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है।
कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने प्रधानमंत्री की टिप्पणी की आलोचना करते हुए कहा था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार से सवाल पूछना और उसकी नीतियों का विरोध करना नागरिकों का अधिकार है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर और वाम दलों के नेताओं ने भी कहा कि राजनीतिक असहमति को माओवादी या राष्ट्रविरोधी सोच से जोड़ना उचित नहीं है।
विपक्ष की आलोचना के बाद रिजिजू ने कहा कि प्रधानमंत्री की टिप्पणी को जानबूझकर विपक्षी नेताओं से जोड़कर प्रस्तुत किया जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक विपक्ष और देशविरोधी विचारधारा के बीच अंतर है। उनका कहना है कि सरकार ने सभी विपक्षी नेताओं को इस श्रेणी में रखने की कोई बात नहीं कही है।
इस पूरे विवाद ने राजनीतिक असहमति, राष्ट्रीय सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सरकार का पक्ष है कि हिंसक माओवाद और अलगाववादी विचारों को वैचारिक समर्थन देने वालों की पहचान आवश्यक है। वहीं, विपक्ष का कहना है कि किसी अस्पष्ट राजनीतिक शब्द के जरिए सरकार के आलोचकों को निशाना बनाए जाने का खतरा हो सकता है।
अब किरेन रिजिजू के स्पष्टीकरण के बाद भी विवाद समाप्त होता दिखाई नहीं दे रहा है। विपक्ष सरकार से ‘दिमागी नक्सल’ शब्द की स्पष्ट सीमा और परिभाषा बताने की मांग कर सकता है, जबकि भाजपा इसे देश की एकता और संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ काम करने वाली विचारधाराओं से जोड़ रही है।
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