एकतरफा टैरिफ पर ब्रिक्स की गंभीर चिंता IMF और विश्व बैंक में तत्काल सुधार की मांग
नई दिल्ली। ब्रिक्स देशों के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक गवर्नरों ने एकतरफा टैरिफ तथा व्यापार संबंधी प्रतिबंधों पर गंभीर चिंता जताई है। संयुक्त बयान में सदस्य देशों ने कहा कि ऐसे कदम अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित करते हैं और विश्व व्यापार संगठन यानी डब्ल्यूटीओ के नियमों के अनुरूप नहीं हैं। साथ ही उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ और विश्व बैंक जैसे ब्रेटन वुड्स संस्थानों में सुधार की तत्काल आवश्यकता दोहराई। यह रुख ऐसे समय सामने आया है, जब भारत और चीन समेत कई अर्थव्यवस्थाएं अमेरिका की ऊंची शुल्क नीतियों से उत्पन्न चुनौतियों का सामना कर रही हैं।
बयान में कहा गया कि व्यापार और वित्त से जुड़ी एकतरफा कार्रवाइयों का दबाव उभरते बाजारों तथा विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर अधिक पड़ता है। इसके बावजूद ब्रिक्स अर्थव्यवस्थाओं ने मजबूती दिखाई है और वैश्विक विकास में योगदान जारी रखा है। सदस्य देशों ने स्थिर, मजबूत, टिकाऊ, समावेशी और संतुलित आर्थिक वृद्धि के महत्व पर जोर दिया। उनकी चिंता केवल सीमा शुल्क बढ़ने तक सीमित नहीं है। गैर-टैरिफ उपायों और वित्तीय गतिविधियों को प्रभावित करने वाली कार्रवाइयों को भी इसी व्यापक समस्या का हिस्सा बताया गया है।
टैरिफ किसी देश में आयात होने वाले सामान पर लगाया जाने वाला सीमा शुल्क है। इससे सरकार को राजस्व मिलता है और घरेलू उत्पादों को आयातित सामान के मुकाबले कीमत में लाभ मिल सकता है। लेकिन दूसरे देश से माल खरीदने की लागत भी बढ़ती है। डब्ल्यूटीओ के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों के तहत देशों ने शुल्क घटाने और अधिकतम शुल्क दरों से संबंधित प्रतिबद्धताएं स्वीकार की हैं। इसलिए व्यापार व्यवस्था में शुल्क का प्रश्न केवल घरेलू नीति का विषय नहीं रहता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय दायित्वों से भी जुड़ता है।
आर्थिक दृष्टि से अचानक शुल्क बढ़ने पर कारोबारियों के सामने कीमत, आपूर्ति और बाजार से जुड़े फैसले बदलने की स्थिति बन सकती है। आयातक बढ़ी लागत का कुछ हिस्सा स्वयं वहन कर सकते हैं या उसे ग्राहकों तक पहुंचा सकते हैं। निर्यातकों को भी प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए अपनी कीमतों और व्यापार रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। यह संभावित प्रभाव है; अलग-अलग उत्पादों और बाजारों में इसका स्वरूप अलग होगा। ब्रिक्स की चिंता का व्यापक संदर्भ यही है कि व्यापार में अनिश्चितता आर्थिक योजना को कठिन बना सकती है।
हालांकि, एकतरफा उपायों को डब्ल्यूटीओ नियमों के प्रतिकूल बताने वाला यह निष्कर्ष ब्रिक्स के संयुक्त बयान का हिस्सा है। इसे किसी विशिष्ट विवाद पर डब्ल्यूटीओ के अंतिम निर्णय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। व्यापारिक नियमों की व्याख्या और विवादों का समाधान निर्धारित प्रक्रियाओं के माध्यम से होता है। ब्रिक्स देशों ने अपने बयान से नियम आधारित व्यापार व्यवस्था के प्रति समर्थन और मौजूदा नीतियों पर असहमति जाहिर की है।
वित्तीय संस्थानों में सुधार की मांग इस बयान का दूसरा प्रमुख पहलू है। सदस्य देशों का कहना है कि वैश्विक उत्पादन और आर्थिक वृद्धि में उभरते बाजारों तथा विकासशील देशों की हिस्सेदारी बढ़ी है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय आर्थिक निर्णय लेने वाली संस्थाओं में उनकी भूमिका भी बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित होनी चाहिए। ब्रिक्स ने इन संस्थानों को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए आपसी समन्वय मजबूत करने की बात कही है। सीमा पार भुगतान प्रणालियों के बीच बेहतर तालमेल पर भी जोर दिया गया।
आईएमएफ में प्रतिनिधित्व की चर्चा समझने के लिए उसकी कोटा व्यवस्था महत्वपूर्ण है। प्रत्येक सदस्य देश का कोटा संस्था में उसके वित्तीय योगदान और मतदान शक्ति से जुड़ा होता है। मतदान अधिकारों में सभी सदस्यों को मिलने वाले मूल मतों के साथ कोटा आधारित मत शामिल होते हैं। इसलिए कोटा वितरण में बदलाव से निर्णय प्रक्रिया में देशों की सापेक्ष भूमिका प्रभावित हो सकती है। आईएमएफ के अनुसार, सामान्य कोटा समीक्षा में कुल संसाधनों के आकार और सदस्य देशों के बीच उनके वितरण पर विचार किया जाता है।
इस पृष्ठभूमि में सुधार की मांग का अर्थ केवल संस्थाओं के संसाधन बढ़ाना नहीं है। इसमें यह प्रश्न भी शामिल है कि निर्णयों में किन देशों की आवाज कितनी प्रभावी है। उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए वित्तीय सहायता, आर्थिक स्थिरता और विकास से जुड़े फैसले विशेष महत्व रखते हैं। प्रतिनिधित्व, पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर देकर ब्रिक्स इन विषयों को वैश्विक आर्थिक शासन की चर्चा के केंद्र में लाना चाहता है।
संयुक्त बयान व्यापार और वित्तीय शासन के दो मुद्दों को एक साथ सामने रखता है। व्यापार के क्षेत्र में सदस्य देशों ने एकतरफा कदमों पर आपत्ति जताई है, जबकि वित्तीय संस्थानों में बदलते आर्थिक संतुलन के अनुसार सुधार की मांग की है। बयान अपने आप किसी शुल्क को समाप्त नहीं करता और न ही संस्थागत सुधार लागू करता है। आगे की प्रगति सदस्य देशों के समन्वय, अंतरराष्ट्रीय बातचीत और संबंधित संस्थाओं की निर्णय प्रक्रियाओं पर निर्भर करेगी। फिलहाल ब्रिक्स ने स्पष्ट किया है कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में विकासशील देशों की चिंताओं और बढ़ती भूमिका को अधिक महत्व मिलना चाहिए।