आतंकी साजिश मामले में आरोपी को राहत, हाईकोर्ट ने खारिज की NIA की चुनौती
नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर में कथित बड़ी आतंकी साजिश से जुड़े मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपी को मिली जमानत में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की अपील खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि मौजूदा परिस्थितियों में पहले से दिए गए जमानत आदेश को बदलने का पर्याप्त आधार नहीं है। इस फैसले के साथ आरोपी को मिली राहत बरकरार रहेगी। मामला गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA के तहत दर्ज कथित आतंकी साजिश से जुड़ा है।अदालत के सामने NIA की ओर से जमानत आदेश को चुनौती दी गई थी। जांच एजेंसी का आरोप था कि आरोपी कथित तौर पर जम्मू-कश्मीर में सक्रिय आतंकी नेटवर्क और बड़ी साजिश से जुड़ा हुआ था। एजेंसी ने मामले की गंभीरता और जांच के दौरान सामने आए तथ्यों का हवाला देते हुए जमानत पर सवाल उठाए थे। हालांकि, हाईकोर्ट ने अपील पर विचार करने के बाद जमानत में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
आरोपी का नाम मतीन अहमद भट
यह मामला मतीन अहमद भट से संबंधित है। दिल्ली हाईकोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने 30 अक्टूबर 2026 को न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति अरुण भारद्वाज की पीठ ने NIA की अपील खारिज की। अदालत ने कहा कि जमानत देने वाले विशेष अदालत के आदेश में ऐसी कोई गंभीर कानूनी त्रुटि नहीं दिखाई गई, जिसके आधार पर उसे रद्द किया जा सके।
13 अक्टूबर 2021 को हुई थी गिरफ्तारी
NIA ने इस मामले में RC No. 29/2021/NIA/DLI के तहत केस दर्ज किया था। मतीन अहमद भट को 13 अक्टूबर 2021 को गिरफ्तार किया गया था। जांच एजेंसी ने उसे आरोपपत्र में आरोपी नंबर 10 बनाया था। मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी, 121ए, 122 और 123 तथा UAPA की धारा 18, 18ए, 18बी, 20, 38 और 39 के तहत दर्ज किया गया था।विशेष NIA अदालत पटियाला हाउस ने 3 मई 2023 को मतीन अहमद भट को जमानत प्रदान की थी। इसके बाद NIA ने इस आदेश को चुनौती देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी। एजेंसी का कहना था कि विशेष अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया और आरोपी के खिलाफ मौजूद सामग्री को अलग-अलग देखकर मामले की गंभीरता को कम करके आंका।
NIA ने लगाए थे गंभीर आरोप
जांच एजेंसी के अनुसार, जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35ए हटाए जाने के बाद प्रतिबंधित आतंकी संगठनों ने स्थानीय युवाओं को अपने नेटवर्क से जोड़ने की साजिश रची थी। NIA का आरोप था कि विभिन्न आतंकी संगठनों ने मिलकर यूनाइटेड जिहाद काउंसिल (UJC) के माध्यम से अपनी गतिविधियों को संचालित करने और घाटी में आतंकी नेटवर्क को दोबारा सक्रिय करने की योजना बनाई थी।एजेंसी ने आरोप लगाया था कि इस नेटवर्क में पाकिस्तान स्थित हैंडलर और जम्मू-कश्मीर में सक्रिय आतंकी संगठनों के सदस्य शामिल थे। स्थानीय युवाओं को सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के माध्यम से संपर्क में लाकर उन्हें कट्टरपंथ की ओर प्रेरित करने का प्रयास किया जाता था। इसके अलावा हथियारों की आवाजाही, स्थानीय युवाओं की भर्ती, सुरक्षा बलों की गतिविधियों पर नजर रखने और आतंकियों को रसद सहायता उपलब्ध कराने जैसे काम भी कथित साजिश का हिस्सा बताए गए थे।NIA के मुताबिक, मतीन अहमद भट का संपर्क हिजबुल मुजाहिदीन के एक आतंकी से हुआ था। एजेंसी ने आरोप लगाया कि वह ओवर ग्राउंड वर्कर (OGW) के रूप में काम कर रहा था और लश्कर-ए-तैयबा तथा हिजबुल मुजाहिदीन से जुड़े सक्रिय आतंकियों की सहायता करता था। जांच एजेंसी ने उस पर हथियारों और गोला-बारूद की आवाजाही में मदद करने, स्थानीय युवाओं को आतंकी गतिविधियों से जोड़ने तथा आतंकियों को लॉजिस्टिक सहयोग देने के आरोप लगाए थे।
मोबाइल से मिले ऑडियो और डिजिटल साक्ष्यों का हवाला
NIA ने आरोपी के घर से जब्त किए गए मोबाइल फोन और अन्य डिजिटल सामग्री को जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया था। एजेंसी के अनुसार, मोबाइल फोन से कुछ ऑडियो क्लिप और बातचीत के रिकॉर्ड मिले थे। इन ऑडियो क्लिप में कथित तौर पर हथियारों, पिस्तौल, गोलियों और आतंकियों से जुड़े व्यक्तियों के बारे में बातचीत सामने आई थी।जांच एजेंसी ने इन ऑडियो रिकॉर्डिंग और कॉल डिटेल के आधार पर आरोपी के कथित आतंकी संपर्कों को साबित करने की कोशिश की। NIA ने यह भी दावा किया था कि एक संरक्षित गवाह के बयान और अन्य डिजिटल साक्ष्य आरोपी की भूमिका की पुष्टि करते हैं। एजेंसी का कहना था कि आरोपी ने कथित तौर पर अपने मोबाइल फोन का इस्तेमाल पाकिस्तान में मौजूद कुछ लोगों से संपर्क स्थापित करने के लिए भी कराया था।NIA ने हाईकोर्ट में दलील दी कि विशेष अदालत ने आरोपी के कथित खुलासे, मोबाइल फोन से प्राप्त सामग्री और गवाहों के बयानों को उचित महत्व नहीं दिया। एजेंसी के अनुसार, जब आरोप तय किए जा चुके हैं, तो पहले से मिली जमानत पर दोबारा विचार किया जाना चाहिए।
विशेष अदालत ने क्यों दी थी जमानत?
विशेष अदालत ने जमानत देते समय आरोपी के खिलाफ उपलब्ध सामग्री पर विचार किया था। अदालत ने पाया था कि आरोपी के कथित खुलासे वाले बयान से कोई ऐसी स्वतंत्र बरामदगी सामने नहीं आई, जिससे उसकी भूमिका स्पष्ट रूप से स्थापित हो सके। अदालत ने यह भी कहा था कि आतंकी संगठनों की बैठकों में शामिल होने, ओवर ग्राउंड वर्कर के रूप में काम करने और हथियारों की आवाजाही में सहायता करने के आरोपों को समर्थन देने वाला पर्याप्त प्रत्यक्ष साक्ष्य प्रथम दृष्टया सामने नहीं आया था।विशेष अदालत ने यह भी गौर किया था कि आरोपी और मुजफ्फर अहमद बांडे के बीच कथित फोन कॉल से अपने आप यह साबित नहीं होता कि आरोपी आतंकी साजिश का हिस्सा था। अदालत के अनुसार, बातचीत से अधिकतम हथियारों के बारे में जानकारी या किसी व्यक्ति के प्रति सहानुभूति का संकेत मिल सकता है, लेकिन इससे कथित साजिश में सक्रिय भागीदारी स्वतः साबित नहीं होती।इसी आधार पर विशेष अदालत ने आरोपी को जमानत देने का फैसला किया था।
हाईकोर्ट ने जमानत रद्द करने के लिए क्या माना?
दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि किसी आरोपी को दी गई जमानत के खिलाफ अपील और जमानत रद्द करने की याचिका दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। जमानत देने वाले आदेश को तभी रद्द किया जा सकता है, जब उसमें गंभीर कानूनी गलती, मनमानी, विकृति या अप्रासंगिक आधार पर फैसला लेने जैसी स्थिति सामने आए।पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि जमानत के खिलाफ अपील में उच्च अदालत को अभियोजन के प्रत्येक साक्ष्य का विस्तार से परीक्षण करके मुकदमे की सुनवाई नहीं करनी चाहिए। अदालत का काम यह देखना है कि निचली अदालत ने जमानत देते समय प्रासंगिक तथ्यों और कानूनी प्रावधानों पर विचार किया था या नहीं।पीठ ने यह भी ध्यान दिया कि आरोपी के खिलाफ आरोप गंभीर हैं, लेकिन इनकी अंतिम जांच मुकदमे की सुनवाई के दौरान होनी चाहिए। मामले में अभियोजन पक्ष के कई गवाहों की गवाही अभी बाकी है। गवाहों की संख्या और लंबित सुनवाई को देखते हुए मुकदमे के जल्द समाप्त होने की संभावना भी नहीं है।इन सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने NIA की अपील में कोई ठोस आधार नहीं पाया और उसे खारिज कर दिया।
ट्रायल के दौरान प्रभावित नहीं होगी सुनवाई
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण भी दिया। अदालत ने कहा कि जमानत के आदेश और मौजूदा अपील की सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियों को आरोपी के खिलाफ चल रहे मुकदमे के अंतिम निर्णय को प्रभावित नहीं करना चाहिए। ट्रायल कोर्ट मामले के सभी साक्ष्यों और गवाहों के बयानों के आधार पर स्वतंत्र रूप से सुनवाई करेगा।इसका अर्थ है कि NIA की अपील खारिज होने से आरोपी को मिली जमानत बरकरार रहेगी, लेकिन उसे आरोपों से बरी नहीं किया गया है। मुकदमे की सुनवाई आगे जारी रहेगी और आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर अंतिम फैसला ट्रायल कोर्ट ही करेगा।30 अक्टूबर 2026 को दिए गए इस फैसले में हाईकोर्ट ने NIA की अपील खारिज कर दी और लागत के संबंध में कोई आदेश पारित नहीं किया।