नई दिल्ली। देश की राजनीति में पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और देश के पहले उपप्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की ऐतिहासिक भूमिकाओं को लेकर एक बार फिर बयानबाजी तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी के सांसद और राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे पर निशाना साधते हुए नेहरू के प्रधानमंत्री बनने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि नेहरू ने प्रधानमंत्री पद हासिल करने के लिए वोटों की अनदेखी की और सरदार पटेल को किनारे कर दिया।संबित पात्रा ने कांग्रेस की ओर से आयोजित 'मॉक पार्लियामेंट' यानी प्रतीकात्मक संसद कार्यक्रम की भी आलोचना की और इसे राजनीतिक ड्रामा बताया। उनके बयान के बाद स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं की विरासत, कांग्रेस के इतिहास और मौजूदा राजनीतिक विरोध-प्रदर्शनों को लेकर बहस फिर चर्चा में आ गई है।हालांकि, नेहरू के वोट चुराने का आरोप भाजपा नेता का राजनीतिक दावा है। इसे स्थापित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। कांग्रेस नेतृत्व के चयन और स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री के निर्धारण की प्रक्रिया को लेकर ऐतिहासिक संदर्भों को समझना जरूरी है।
संबित पात्रा ने कांग्रेस पर लगाए गंभीर आरोप
शनिवार, 31 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में संबित पात्रा ने कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि कांग्रेस आज चुनावी प्रक्रिया में कथित वोट चोरी के आरोप लगा रही है, लेकिन उसे अपने इतिहास पर भी नजर डालनी चाहिए।पात्रा ने दावा किया कि वर्ष 1946 में कांग्रेस नेतृत्व के चयन के दौरान सरदार वल्लभभाई पटेल को व्यापक समर्थन प्राप्त था, इसके बावजूद जवाहरलाल नेहरू शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचे। उन्होंने इसे वोट चोरी बताते हुए कांग्रेस की लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता पर सवाल उठाए।भाजपा नेता ने कहा कि कांग्रेस को लोकतंत्र और मतदान प्रक्रिया पर सवाल उठाने से पहले अपने राजनीतिक इतिहास का जवाब देना चाहिए। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी पर भी निशाना साधा।
'मॉक पार्लियामेंट' को लेकर विपक्ष पर हमला
संबित पात्रा ने विपक्षी गठबंधन INDIA की ओर से आयोजित प्रतीकात्मक संसद की आलोचना करते हुए इसे संसदीय व्यवस्था का मजाक बताया। उनका आरोप था कि विपक्ष वास्तविक संसद में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के बजाय प्रतीकात्मक कार्यक्रमों के जरिए राजनीतिक संदेश देने में लगा है।दरअसल, विपक्षी गठबंधन ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ 'जन महाभियोग' नाम से प्रतीकात्मक कार्यक्रम आयोजित किया। यह आयोजन कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के नई दिल्ली स्थित आवास पर हुआ।कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने की, जबकि खड़गे ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ आरोपों से संबंधित प्रतीकात्मक प्रस्ताव प्रस्तुत किया। राहुल गांधी और सोनिया गांधी सहित विपक्ष के कई नेता इसमें शामिल हुए।विपक्ष ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता और मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं पर सवाल उठाए। वहीं, भाजपा ने इन आरोपों को राजनीतिक बताया। यह कार्यक्रम वास्तविक संसदीय महाभियोग की संवैधानिक प्रक्रिया नहीं था।
नेहरू और पटेल के चयन का ऐतिहासिक संदर्भ
संबित पात्रा के आरोपों के बीच वर्ष 1946 में कांग्रेस अध्यक्ष के चयन की प्रक्रिया फिर चर्चा में आ गई है। उस समय कांग्रेस अध्यक्ष पद का विशेष महत्व था, क्योंकि इसी नेतृत्व से अंतरिम सरकार के गठन की दिशा तय होनी थी।ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, कांग्रेस की कई प्रांतीय समितियों ने सरदार वल्लभभाई पटेल के नाम का समर्थन किया था। हालांकि, महात्मा गांधी की भूमिका और पार्टी के भीतर हुए विचार-विमर्श के बाद जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष बने।बाद में नेहरू ने अंतरिम सरकार का नेतृत्व किया और 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने।इस घटनाक्रम को लेकर राजनीतिक दल अलग-अलग व्याख्याएं प्रस्तुत करते हैं। लेकिन 1946 की कांग्रेस की आंतरिक नेतृत्व चयन प्रक्रिया को आज के आम चुनावों में मतदाताओं के वोट चोरी होने के समान बताना ऐतिहासिक रूप से सटीक नहीं है।
SIR को लेकर भी कांग्रेस पर निशाना
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान संबित पात्रा ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची को अद्यतन करने की प्रक्रिया लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है।पात्रा ने दावा किया कि कांग्रेस शासनकाल में भी कई बार विशेष गहन पुनरीक्षण किया गया था। उन्होंने विपक्ष की ओर से मतदाताओं के नाम हटाए जाने संबंधी आरोपों पर सवाल उठाए।भाजपा नेता ने कहा कि यदि इतनी बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम वास्तव में हटाए गए होते, तो इसका व्यापक विरोध दिखाई देता।उन्होंने मतदाता सूची में अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और दोहरी प्रविष्टियों से जुड़े मामलों का भी उल्लेख किया। हालांकि, मतदाता सूची से किसी नाम को हटाने की वैधता संबंधित दस्तावेजों, चुनाव आयोग के नियमों और उपलब्ध अपील प्रक्रिया के आधार पर तय होती है।कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का आरोप है कि पुनरीक्षण प्रक्रिया से वास्तविक मतदाताओं के नाम हटने का जोखिम है। दूसरी ओर, भाजपा का कहना है कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना जरूरी है।
राहुल गांधी पर भी साधा निशाना
संबित पात्रा ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की राजनीतिक भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष संसद की कार्यवाही में व्यवधान पैदा करता है और फिर संसद के बाहर प्रतीकात्मक कार्यक्रम आयोजित करता है।पात्रा ने कहा कि कांग्रेस को संवैधानिक संस्थाओं के प्रति जिम्मेदार रवैया अपनाना चाहिए। उन्होंने विपक्ष पर चुनाव आयोग के खिलाफ आरोपों के जरिए जनता के बीच भ्रम पैदा करने का आरोप भी लगाया।वहीं, विपक्षी गठबंधन का कहना है कि चुनावी पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों को लेकर सवाल उठाना लोकतांत्रिक जवाबदेही का हिस्सा है। विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त के कामकाज की आलोचना करते हुए निष्पक्ष चुनाव व्यवस्था की मांग दोहराई है।
चुनाव आयोग को लेकर बढ़ा राजनीतिक टकराव
देश में मतदाता सूची पुनरीक्षण और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सत्तापक्ष तथा विपक्ष के बीच लगातार राजनीतिक मतभेद सामने आ रहे हैं।कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठा रहे हैं। दूसरी ओर, भाजपा विपक्ष के आरोपों को तथ्यहीन बताते हुए चुनावी संस्थाओं की प्रक्रियाओं का समर्थन कर रही है।संबित पात्रा के ताजा बयान ने इस बहस में स्वतंत्रता से पहले के कांग्रेस नेतृत्व चयन का मुद्दा भी जोड़ दिया है। नेहरू और पटेल के राजनीतिक योगदान तथा उनकी ऐतिहासिक भूमिकाओं को लेकर चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है।फिलहाल भाजपा और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं। चुनाव आयोग से संबंधित विवादों और मतदाता सूची की शुद्धता पर उठ रहे सवालों के बीच राजनीतिक दलों के दावों की तथ्यात्मक जांच और संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन महत्वपूर्ण बना हुआ है।
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