नई दिल्ली। भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष की ओर से लगातार उठाई जा रही पद से हटाने की मांग के बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बड़ा बयान दिया है। गुरुवार, 22 अक्टूबर को उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ नया प्रस्ताव लाया जाता है, तो उस पर संसद के निर्धारित नियमों और संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार विचार किया जाएगा। ओम बिरला का यह बयान ऐसे समय सामने आया है, जब विपक्षी दल विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के दौरान कथित अनियमितताओं को लेकर चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण में गंभीर गड़बड़ियां हुई हैं। हालांकि, इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है।

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्ताव पर क्या बोले ओम बिरला?

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने संसद भवन परिसर में आयोजित संवाददाता सम्मेलन के दौरान मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने संबंधी प्रस्ताव पर अपनी प्रतिक्रिया दी।

उन्होंने कहा कि अगर विपक्ष की ओर से कोई नया नोटिस आता है तो उसकी जांच संसदीय नियमों और निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुसार की जाएगी।

बिरला ने स्पष्ट किया कि जिस तरह सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को पद से हटाने के लिए संवैधानिक प्रक्रिया निर्धारित है, उसी तरह मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने के लिए भी विशेष व्यवस्था मौजूद है।

उन्होंने कहा कि जब प्रस्ताव औपचारिक रूप से सामने आएगा, तभी उसके अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।

लोकसभा अध्यक्ष ने यह भी कहा कि लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचार व्यक्त करने और विरोध दर्ज कराने का अधिकार है।

विपक्ष दो बार कर चुका है हटाने की कोशिश

मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए विपक्ष पहले भी दो बार संसदीय प्रक्रिया शुरू करने का प्रयास कर चुका है।

पहली बार दिए गए नोटिस लोकसभा और राज्यसभा, दोनों सदनों में अस्वीकार कर दिए गए थे।

इसके बाद विपक्ष की ओर से दूसरी बार नोटिस प्रस्तुत किए गए। इनसे संबंधित मामला अभी राज्यसभा में लंबित बताया गया है।

अब विपक्ष की ओर से नया प्रस्ताव लाने की संभावना पर लोकसभा अध्यक्ष का बयान सामने आया है।

हालांकि, ओम बिरला ने किसी प्रस्ताव को स्वीकार करने या मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने की घोषणा नहीं की है। उन्होंने केवल यह स्पष्ट किया है कि नया नोटिस मिलने पर निर्धारित प्रक्रिया अपनाई जाएगी।

एसआईआर को लेकर लगातार विरोध प्रदर्शन

मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष की नाराजगी का प्रमुख कारण मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान है।

विपक्षी दलों का आरोप है कि एसआईआर के दौरान पात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित हुई।

कांग्रेस सहित कई विपक्षी दल इन कथित अनियमितताओं को लेकर चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं।

पिछले कुछ दिनों में देश के अलग-अलग हिस्सों में विरोध प्रदर्शन किए गए हैं। प्रदर्शनकारियों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग भी उठाई है।

विपक्ष का कहना है कि मतदाता सूची से किसी पात्र नागरिक का नाम हटना लोकतांत्रिक अधिकारों को प्रभावित करता है। दूसरी ओर, मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण चुनाव आयोग की नियमित संवैधानिक जिम्मेदारियों का हिस्सा है।

राष्ट्रपति से भी मिल चुके हैं विपक्षी नेता

मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की मांग को लेकर विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के समक्ष भी अपनी चिंताएं रखी हैं।

विपक्ष इस मुद्दे को केवल चुनाव आयोग तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि संसद और अन्य संवैधानिक मंचों पर भी उठाने की रणनीति अपना रहा है।

राजनीतिक दलों का कहना है कि चुनाव प्रक्रिया में मतदाताओं का विश्वास बनाए रखना बेहद जरूरी है।

इस बीच ओम बिरला के बयान से यह स्पष्ट हुआ है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने के किसी भी नए प्रस्ताव पर फैसला राजनीतिक मांग के आधार पर नहीं, बल्कि निर्धारित संवैधानिक नियमों के तहत ही होगा।

कैसे हटाया जा सकता है मुख्य निर्वाचन आयुक्त को?

भारत के संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उनके पद से उसी प्रकार और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है।

इसके लिए संसद में विशेष प्रक्रिया अपनाना आवश्यक होता है।

प्रस्ताव को दोनों सदनों में विशेष बहुमत से पारित किया जाना जरूरी है। इसमें प्रत्येक सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई समर्थन आवश्यक होता है।

हटाने का आधार सिद्ध कदाचार या अक्षमता होना चाहिए। इसके बाद निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति द्वारा पद से हटाने का आदेश जारी किया जा सकता है।

इस प्रकार केवल विपक्ष की मांग या विरोध प्रदर्शन के आधार पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से नहीं हटाया जा सकता।

चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर छिड़ी राजनीतिक बहस

ज्ञानेश कुमार को लेकर चल रहे विवाद ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही पर नई राजनीतिक बहस शुरू कर दी है।

विपक्षी दलों का कहना है कि चुनाव आयोग को सभी राजनीतिक दलों और मतदाताओं के प्रति समान व्यवहार करना चाहिए।

वहीं सत्तारूढ़ भाजपा ने विपक्ष के आरोपों और विरोध प्रदर्शनों की आलोचना की है। भाजपा नेताओं का कहना है कि संवैधानिक संस्थाओं पर राजनीतिक आरोप लगाकर उनकी विश्वसनीयता को नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए।

इस मुद्दे पर दोनों पक्षों के अलग-अलग तर्क सामने आ रहे हैं।

एक नवंबर को बड़े प्रदर्शन की तैयारी

एसआईआर और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्षी गठबंधन ने आंदोलन तेज करने की योजना बनाई है।

जानकारी के अनुसार, विपक्षी गठबंधन इंडिया ने एक नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में बड़ी रैली आयोजित करने की घोषणा की है।

इस रैली के जरिए मतदाता सूची के पुनरीक्षण और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़े मुद्दों को उठाने की तैयारी है।

विपक्ष का प्रयास इस मुद्दे पर व्यापक जनसमर्थन जुटाने का है।

संसद के अगले कदम पर टिकी राजनीतिक नजरें

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के बयान के बाद अब सवाल यह है कि विपक्ष मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ नया नोटिस कब और किस रूप में प्रस्तुत करेगा।

यदि नया प्रस्ताव दिया जाता है, तो सबसे पहले उसकी स्वीकार्यता और नियमों के अनुरूप होने की जांच की जाएगी।

इसके बाद ही आगे की संसदीय प्रक्रिया तय हो सकेगी।

फिलहाल ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कोई नया प्रस्ताव स्वीकार किए जाने या उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू होने की पुष्टि नहीं हुई है।

लोकसभा अध्यक्ष ने यह संकेत जरूर दिया है कि संसद में इस विषय पर निर्धारित नियमों के अनुसार विचार करने का रास्ता मौजूद है।

अब विपक्ष की आगामी रणनीति और संसदीय प्रक्रिया पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। यह मुद्दा आने वाले दिनों में संसद और राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बना रह सकता है।

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