महुआ मोइत्रा को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं, ऑनलाइन पेशी की मांग हुई खारिज
नई दिल्ली : तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सांसद महुआ मोइत्रा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। एक विवादित फेसबुक पोस्ट से जुड़े मामले में पुलिस के समक्ष वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होने की उनकी मांग को सर्वोच्च अदालत ने खारिज कर दिया। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने उनकी दलीलों पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि राजनीति में आने के बाद विरोध और आलोचना का सामना करना पड़ता है तथा इस तरह की आशंकाओं के आधार पर अदालत से विशेष राहत नहीं मांगी जा सकती।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने की। अदालत ने कहा कि महुआ मोइत्रा एक निर्वाचित सांसद हैं और यदि उन्हें पुलिस जांच में शामिल होने का निर्देश दिया गया है तो उन्हें कानून के अनुसार जांच एजेंसी के सामने उपस्थित होना चाहिए। अदालत ने उनकी इस दलील को स्वीकार नहीं किया कि पुलिस स्टेशन जाने पर उनके ऊपर अंडे फेंके जा सकते हैं या भीड़ द्वारा विरोध किया जा सकता है।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने टिप्पणी करते हुए कहा कि राजनीति में आने के बाद इस तरह की परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि देश के स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने प्राणों की आहुति दी और गोलियां तक खाईं, ऐसे में केवल विरोध प्रदर्शन या अंडे फेंके जाने की आशंका के आधार पर अदालत से विशेष छूट मांगना उचित नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि इस प्रकार की याचिकाएं न्यायालय के समक्ष नहीं आनी चाहिए।
यह पूरा मामला जून 2026 में दर्ज एक प्राथमिकी से जुड़ा है। भारतीय जनता पार्टी के एक नेता की शिकायत पर महुआ मोइत्रा के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि उन्होंने सोशल मीडिया पर साझा किए गए दो वीडियो में ऐसी टिप्पणियां कीं जो कथित रूप से भड़काऊ प्रकृति की थीं। इसी मामले की जांच के सिलसिले में पुलिस ने उन्हें पूछताछ के लिए उपस्थित होने का नोटिस जारी किया था।
विवाद उस समय और बढ़ गया था जब कृष्णानगर स्थित अदालत परिसर के बाहर कुछ भाजपा समर्थक कथित रूप से टमाटर और अंडे लेकर इकट्ठा हुए थे। आरोप था कि वे महुआ मोइत्रा के विरोध में उन पर अंडे और टमाटर फेंकना चाहते थे। इसी घटना का हवाला देते हुए महुआ मोइत्रा ने अदालत में कहा कि उन्हें पुलिस स्टेशन जाकर पेश होने में सुरक्षा संबंधी चिंता है।
सुप्रीम कोर्ट में महुआ मोइत्रा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि उनकी मुवक्किल को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जांच अधिकारी के समक्ष पेश होने की अनुमति दी जाए। उनका कहना था कि पुलिस स्टेशन में उपस्थित होने पर भीड़ द्वारा हमले या विरोध की आशंका बनी हुई है। उन्होंने यह भी दलील दी कि पहले भी विरोध प्रदर्शन के दौरान अंडे फेंके जाने जैसी घटनाएं सामने आ चुकी हैं।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट इन दलीलों से संतुष्ट नहीं हुआ। अदालत ने स्पष्ट किया कि कलकत्ता हाईकोर्ट पहले ही इस मामले में अंतरिम राहत देते हुए महुआ मोइत्रा को जांच एजेंसी के साथ सहयोग करने और निर्धारित तिथि पर जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दे चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट के आदेश का पालन करना आवश्यक है और यदि किसी प्रकार की कठिनाई है तो उसके लिए संबंधित अदालत का रुख किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के आदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि महुआ मोइत्रा जांच अधिकारी के सामने उपस्थित नहीं होती हैं, तो उन्हें उसके परिणामों का सामना करना पड़ सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि इस विषय में पहले से स्पष्ट निर्देश मौजूद हैं और सर्वोच्च अदालत को हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं दिखाई देता।
सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख को देखते हुए महुआ मोइत्रा के वकील ने अपनी याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। अदालत ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए याचिका को वापस लिया हुआ मानकर खारिज कर दिया।
अब इस मामले में महुआ मोइत्रा को कलकत्ता हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुसार निर्धारित तिथि पर जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित होना होगा। जांच एजेंसी मामले की विवेचना आगे बढ़ाएगी और उसके आधार पर अगली कानूनी कार्रवाई की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को इस रूप में देखा जा रहा है कि अदालत ने कानून के समक्ष सभी नागरिकों की समान जवाबदेही और जांच में सहयोग की आवश्यकता को दोहराया है।