नई दिल्ली। केंद्र सरकार की कल्याणकारी योजनाओं में लाभार्थियों की पहचान के लिए आधार कार्ड के स्थान पर मतदाता पहचान पत्र (वोटर ID) और बायोमेट्रिक सत्यापन का इस्तेमाल किए जाने के कथित प्रस्ताव को लेकर राजनीतिक विवाद बढ़ गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और महासचिव जयराम रमेश ने गुरुवार, 5 नवंबर 2026 को इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से सवाल किए। उन्होंने पूछा कि यदि सरकारी योजनाओं का लाभ मतदाता पहचान पत्र से जोड़ा जाता है, तो उन लोगों का क्या होगा जिनके पास वोटर आईडी नहीं है या जिनके नाम मतदाता सूची से हट गए हैं।जयराम रमेश की प्रतिक्रिया केंद्रीय पंचायती राज मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह के हालिया बयानों के बाद सामने आई है। ललन सिंह ने सरकारी कल्याणकारी कार्यक्रमों के लाभार्थियों की पहचान और भुगतान प्रक्रिया में आधार के बजाय वोटर आईडी नंबर तथा बायोमेट्रिक सत्यापन के इस्तेमाल की बात कही थी। हालांकि, अभी तक सरकार की ओर से सभी कल्याणकारी योजनाओं में आधार को हटाकर वोटर आईडी लागू करने का कोई व्यापक आधिकारिक आदेश जारी होने की पुष्टि नहीं हुई है।कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इस मामले को उठाते हुए केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने पिछले कुछ दिनों में दो बार सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों के लाभार्थियों की पहचान के लिए आधार की जगह मतदाता पहचान पत्र इस्तेमाल करने की बात कही है।कांग्रेस ने इस संभावित बदलाव को लेकर आशंका जताई है कि इससे गरीब और वंचित वर्ग के लोगों के सामने नई समस्याएं पैदा हो सकती हैं। पार्टी का सवाल है कि यदि किसी पात्र व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में नहीं है, तो क्या उसे सरकारी सहायता से वंचित कर दिया जाएगा। कांग्रेस इस मुद्दे को नागरिकों के अधिकारों और कल्याणकारी योजनाओं तक उनकी पहुंच से जोड़कर देख रही है।
विवाद की शुरुआत 30 अक्टूबर को आयोजित राष्ट्रीय जन योजना अभियान 2026-27 की एक कार्यशाला में केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह के बयान से हुई थी। उन्होंने लाभार्थियों की पहचान के लिए आधार कार्ड के इस्तेमाल पर सवाल उठाते हुए मतदाता पहचान पत्र के ईपीआईसी (EPIC) नंबर और बायोमेट्रिक सत्यापन को अपनाने की बात कही थी। इसके बाद तीन नवंबर को सिक्किम के गंगटोक में भी उन्होंने इस विषय पर अपनी बात दोहराई।ललन सिंह के बयान को लेकर विपक्षी दलों ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि सरकारी योजनाओं का उद्देश्य जरूरतमंद नागरिकों तक सहायता पहुंचाना है। ऐसे में लाभार्थियों की पहचान के नियमों में किसी भी बदलाव से पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि कोई पात्र व्यक्ति केवल दस्तावेज की कमी के कारण योजना से बाहर न हो जाए।इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) से भी जुड़ा है। वर्तमान में मतदाता सूचियों की समीक्षा को लेकर राजनीतिक बहस चल रही है। विपक्षी दल पहले से ही मतदाता सूची से नाम हटाए जाने की प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं। ऐसे समय में कल्याणकारी योजनाओं के लाभ को वोटर आईडी से जोड़ने की संभावना ने नई बहस को जन्म दिया है।कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की आशंका है कि यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटता है और सरकारी योजनाओं के लिए वोटर आईडी अनिवार्य कर दी जाती है, तो उसे दोहरी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, यह फिलहाल विपक्ष द्वारा जताई गई आशंका है। सरकार की ओर से ऐसी कोई अंतिम नीति सार्वजनिक नहीं की गई है, जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि मतदाता सूची में नाम नहीं होने पर किसी व्यक्ति की कल्याणकारी सहायता स्वतः बंद हो जाएगी।
इस मुद्दे पर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने भी केंद्र सरकार की आलोचना की है। पार्टी ने चार नवंबर को बयान जारी कर कहा कि वोटर आईडी और बायोमेट्रिक सत्यापन को अनिवार्य बनाने से ग्रामीण गरीबों तथा कमजोर वर्गों के लोगों को सरकारी सहायता प्राप्त करने में कठिनाई हो सकती है। पार्टी ने आशंका जताई कि इससे पहले से सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का सामना कर रहे लोगों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।दरअसल, आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र दोनों अलग-अलग उद्देश्यों के लिए बनाए गए पहचान दस्तावेज हैं। आधार का उपयोग विभिन्न सरकारी सेवाओं और योजनाओं में पहचान तथा सत्यापन के लिए किया जाता है। वहीं, मतदाता पहचान पत्र मुख्य रूप से निर्वाचन प्रक्रिया से संबंधित है और इसका इस्तेमाल मतदाता की पहचान के लिए किया जाता है।दोनों दस्तावेजों की उपयोगिता और पात्रता संबंधी नियम भी अलग हैं। मतदाता पहचान पत्र 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के पात्र मतदाताओं को जारी किया जाता है, जबकि आधार सभी आयु वर्ग के निवासियों के लिए उपलब्ध है। इसी अंतर को देखते हुए सवाल उठ रहे हैं कि यदि कल्याणकारी योजनाओं में वोटर आईडी को प्राथमिक पहचान दस्तावेज बनाया जाता है, तो बच्चों और अन्य गैर-मतदाता लाभार्थियों के लिए क्या व्यवस्था होगी।विशेषज्ञों के अनुसार, कल्याणकारी योजनाओं में लाभार्थियों की पहचान सुनिश्चित करना और फर्जी दावों को रोकना महत्वपूर्ण प्रशासनिक उद्देश्य हैं। लेकिन सत्यापन प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए, जिससे पात्र लोगों को योजनाओं का लाभ प्राप्त करने में अनावश्यक परेशानी न हो।
केंद्र सरकार की अनेक योजनाओं में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से लाभार्थियों के बैंक खातों में सहायता राशि भेजी जाती है। ऐसी व्यवस्था में पहचान का सही सत्यापन जरूरी है। हालांकि, किसी नई पहचान प्रणाली को लागू करने से पहले उसके तकनीकी, कानूनी और सामाजिक प्रभावों का मूल्यांकन भी आवश्यक माना जाता है।इस बीच, केंद्रीय मंत्री के बयान को लेकर यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि पंचायती राज मंत्रालय की ओर से आधार को सभी केंद्रीय योजनाओं में तत्काल समाप्त करने की घोषणा नहीं की गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मंत्रालय स्वयं फिलहाल ऐसी व्यक्तिगत नकद अंतरण योजना संचालित नहीं करता, जिसमें सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में भुगतान किया जाता हो। इसलिए ललन सिंह के बयान का वास्तविक दायरा और उसका अन्य मंत्रालयों की योजनाओं पर संभावित प्रभाव अभी स्पष्ट नहीं है।जयराम रमेश के सवालों ने इस मुद्दे को एक व्यापक राजनीतिक बहस में बदल दिया है। कांग्रेस चाहती है कि केंद्र सरकार यह स्पष्ट करे कि प्रस्तावित व्यवस्था किन योजनाओं में लागू होगी और क्या लाभार्थियों को आधार के अतिरिक्त अन्य पहचान दस्तावेजों का विकल्प भी उपलब्ध रहेगा।फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार वास्तव में कल्याणकारी योजनाओं की पहचान प्रणाली में बड़ा बदलाव करने जा रही है या केंद्रीय मंत्री का बयान केवल एक प्रस्ताव तक सीमित है। इस संबंध में विस्तृत आधिकारिक दिशा-निर्देश सामने आने के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।