पंजाब : राजनीति में एक बार फिर शिरोमणि अकाली दल (SAD) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच संभावित गठबंधन को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। आगामी विधानसभा चुनाव 2027 से पहले दोनों दलों के नेताओं के बयानों ने सियासी गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। पूर्व केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल के बाद अब अकाली नेता बिक्रम सिंह मजीठिया के बयान ने इन अटकलों को और हवा दे दी है।
बिक्रम सिंह मजीठिया ने बीजेपी और अकाली दल के पुराने रिश्तों का जिक्र करते हुए कहा कि दोनों दलों ने लंबे समय तक मिलकर पंजाब की राजनीति में काम किया है। उन्होंने गठबंधन को लेकर पूछे गए सवाल पर संकेत दिए कि भविष्य में क्या होगा, यह समय बताएगा। मजीठिया के इस बयान को दोनों पार्टियों के बीच फिर से नजदीकियां बढ़ने के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
दरअसल, अकाली दल और बीजेपी का गठबंधन पंजाब की राजनीति का एक पुराना समीकरण रहा है। दोनों दलों ने कई चुनाव साथ लड़े और 2007 से 2017 तक पंजाब में मिलकर सरकार भी चलाई। अकाली दल जहां ग्रामीण और सिख वोट बैंक में मजबूत माना जाता था, वहीं बीजेपी का प्रभाव शहरी क्षेत्रों में ज्यादा रहा। दोनों दलों का गठजोड़ लंबे समय तक एक मजबूत राजनीतिक समीकरण बना रहा।
हालांकि, साल 2020 में केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों को लेकर दोनों दलों के रिश्तों में दरार आ गई थी। किसान आंदोलन के दौरान शिरोमणि अकाली दल ने एनडीए से अलग होने का फैसला किया और हरसिमरत कौर बादल ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था। बाद में केंद्र सरकार ने कृषि कानून वापस ले लिए, लेकिन दोनों दलों के बीच दूरी बनी रही।
अब पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 को देखते हुए राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। अकाली दल लंबे समय से राज्य में अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने की कोशिश कर रहा है, जबकि बीजेपी भी पंजाब में अपने संगठन को मजबूत करने में जुटी है। ऐसे में दोनों दलों के साथ आने की संभावना को लेकर चर्चाएं लगातार बढ़ रही हैं।
हरसिमरत कौर बादल ने भी हाल के दिनों में बीजेपी के साथ पुराने संबंधों और भविष्य की संभावनाओं को लेकर संकेत दिए थे। इसके बाद सुखबीर सिंह बादल की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात ने भी राजनीतिक हलकों में कई सवाल खड़े कर दिए थे। हालांकि दोनों दलों की ओर से गठबंधन को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर बीजेपी और अकाली दल फिर साथ आते हैं तो पंजाब की चुनावी लड़ाई का समीकरण बदल सकता है। आम आदमी पार्टी की सरकार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी और कांग्रेस की चुनौती के बीच दोनों दल अपने-अपने वोट बैंक को जोड़ने की कोशिश कर सकते हैं।
हालांकि गठबंधन की राह आसान नहीं होगी। दोनों दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती किसान आंदोलन के बाद बनी दूरी को खत्म करना और अपने समर्थकों को फिर से साथ लाना होगी। अकाली दल को जहां ग्रामीण और पंथक राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करनी होगी, वहीं बीजेपी को पंजाब में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की चुनौती का सामना करना पड़ेगा।
बीजेपी की ओर से अभी तक गठबंधन को लेकर कोई स्पष्ट फैसला सामने नहीं आया है। पार्टी नेताओं ने कई मौकों पर पंजाब में अपनी संगठनात्मक ताकत बढ़ाने और अपने दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी की बात कही है। हालांकि भविष्य में गठबंधन की संभावनाओं को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया गया है।
2027 का विधानसभा चुनाव पंजाब की राजनीति के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। आम आदमी पार्टी सत्ता बचाने की कोशिश करेगी, जबकि कांग्रेस और बीजेपी-अकाली दल जैसे संभावित गठबंधन सत्ता में वापसी के लिए रणनीति बना रहे हैं।
फिलहाल अकाली दल और बीजेपी के बीच गठबंधन को लेकर सिर्फ संकेत और चर्चाएं हैं। अंतिम फैसला दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व की बातचीत के बाद ही साफ होगा। लेकिन इतना तय है कि पंजाब की राजनीति में पुराने सहयोगियों के फिर साथ आने की संभावना ने चुनावी माहौल को गर्म कर दिया है।
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