नई दिल्ली। दुनिया इस समय कई मोर्चों पर युद्ध, तनाव और आर्थिक अनिश्चितता का सामना कर रही है। एक तरफ रूस और यूक्रेन का संघर्ष है तो दूसरी तरफ पश्चिम एशिया में युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा और व्यापार व्यवस्था को हिला दिया है। ऐसे समय में नई दिल्ली में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विश्व नेताओं के साथ तस्वीरें केवल सामान्य कूटनीतिक मुलाकातों तक सीमित नहीं मानी जा रही हैं।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ गर्मजोशी, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के साथ मुलाकात और BRICS मंच पर दुनिया के कई महत्वपूर्ण नेताओं को एक साथ साधने की भारत की कोशिश ने एक बड़ा संदेश दिया है—**भारत किसी एक खेमे की राजनीति के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक स्वायत्तता के आधार पर सभी प्रमुख शक्तियों से संबंध बनाए रखना चाहता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने इसी के साथ युद्धों को समाप्त करने के लिए संवाद और कूटनीति का रास्ता अपनाने की बात दोहराई है।
पुतिन के साथ दिखी मोदी की खास केमिस्ट्री
BRICS सम्मेलन से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात खास चर्चा में रही।
दोनों नेताओं के बीच करीब 45 मिनट तक द्विपक्षीय वार्ता हुई।
इस दौरान भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी के कई पहलुओं पर बातचीत की गई।
ऊर्जा, व्यापार, रक्षा और वैश्विक संघर्ष जैसे मुद्दे चर्चा के केंद्र में रहे।
मुलाकात के बाद मोदी और पुतिन एक ही कार से INNOPROM औद्योगिक प्रदर्शनी में पहुंचे।
दोनों नेताओं का एक ही कार में जाना भारत और रूस के बीच पुराने और गहरे रणनीतिक संबंधों के प्रतीक के तौर पर भी देखा गया।
पुतिन को दिया साफ संदेश- युद्ध नहीं बातचीत
भारत ने रूस के साथ दोस्ती दिखाई लेकिन इसके साथ ही युद्ध के मुद्दे पर अपना पुराना रुख भी दोहराया।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वैश्विक संघर्षों का समाधान संवाद और कूटनीति के जरिए होना चाहिए।
भारत शांति के प्रयासों में योगदान देने के लिए तैयार है।
यही भारत की विदेश नीति का महत्वपूर्ण पहलू है।
नई दिल्ली रूस के साथ दशकों पुराने रणनीतिक संबंध बनाए रखती है, लेकिन साथ ही संघर्षों के शांतिपूर्ण समाधान की वकालत भी करती है।
यानी भारत रूस से दोस्ती और शांति की अपील दोनों को साथ लेकर चलने की कोशिश कर रहा है।
ईरानी राष्ट्रपति के साथ मुलाकात क्यों खास?
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन की भारत यात्रा भी बेहद महत्वपूर्ण है।
मौजूदा पश्चिम एशिया संकट के बीच ईरान दुनिया की राजनीति के केंद्र में है।
ऐसे समय में ईरानी राष्ट्रपति का नई दिल्ली पहुंचना और भारतीय नेतृत्व के साथ बातचीत करना भारत की कूटनीतिक भूमिका को महत्वपूर्ण बनाता है।
भारत के ईरान के साथ पुराने आर्थिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक संबंध हैं।
चाबहार बंदरगाह से लेकर मध्य एशिया तक कनेक्टिविटी और ऊर्जा सुरक्षा जैसे कई मुद्दों पर दोनों देशों के हित जुड़े हुए हैं।
इसके साथ भारत के इजरायल और अमेरिका से भी मजबूत संबंध हैं।
यही संतुलन भारत की विदेश नीति को खास बनाता है।
दुनिया को क्या संदेश दे रहे मोदी?
BRICS के मंच से प्रधानमंत्री मोदी की सबसे महत्वपूर्ण कोशिश भारत को एक ऐसे देश के रूप में पेश करने की दिखाई देती है जो अलग-अलग और कई बार एक-दूसरे के विरोधी देशों से भी बातचीत कर सकता है।
भारत अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी रखता है।
रूस उसका पुराना रणनीतिक साझेदार है।
ईरान के साथ उसके महत्वपूर्ण क्षेत्रीय हित जुड़े हैं।
इजरायल के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग है।
खाड़ी देशों के साथ ऊर्जा और आर्थिक संबंध हैं।
वहीं चीन के साथ मतभेदों के बावजूद दोनों देश BRICS जैसे बहुपक्षीय मंचों पर साथ काम करते हैं।
इसलिए भारत की रणनीति किसी एक शक्ति केंद्र के साथ पूरी तरह जुड़ने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ अपने हितों के आधार पर संबंध बनाने की है।
'भारत किसी के खिलाफ नहीं'
BRICS को अक्सर पश्चिमी देशों के प्रभाव के विकल्प के रूप में देखा जाता है।
लेकिन भारत लगातार कोशिश करता रहा है कि यह संगठन पश्चिम विरोधी गठबंधन में न बदले।
भारत के लिए BRICS का उद्देश्य मौजूदा वैश्विक संस्थाओं को खत्म करना नहीं बल्कि उनमें सुधार और विकासशील देशों की भागीदारी बढ़ाना है।
प्रधानमंत्री मोदी पहले भी BRICS को मानवता के हित में काम करने वाला समावेशी मंच बताते रहे हैं।
भारत की यही नीति इस बार भी दिखाई दे रही है।
BRICS की ताकत कितनी बड़ी?
BRICS अब केवल पांच देशों का संगठन नहीं रहा।
इसके विस्तार के बाद इसकी वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक ताकत काफी बढ़ी है।
प्रधानमंत्री मोदी ने BRICS बिजनेस फोरम में कहा कि BRICS से जुड़े देश दुनिया की करीब आधी आबादी और वैश्विक GDP के लगभग 40 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करते हैं।
वैश्विक व्यापार में भी समूह की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत से ज्यादा बताई गई।
यानी BRICS के फैसलों का असर अब केवल सदस्य देशों तक सीमित नहीं है।
वैश्विक व्यापार, ऊर्जा, वित्त और सप्लाई चेन में इसकी भूमिका लगातार बढ़ रही है।
दुनिया से तेज बढ़ी BRICS की अर्थव्यवस्था
प्रधानमंत्री मोदी ने BRICS देशों की आर्थिक क्षमता पर भी जोर दिया।
उन्होंने कहा कि पिछले वर्षों में BRICS देशों की संयुक्त आर्थिक ताकत दुनिया की औसत वृद्धि की तुलना में ज्यादा तेजी से बढ़ी है।
भारत इसे आने वाले वर्षों में व्यापार और निवेश बढ़ाने के बड़े अवसर के रूप में देख रहा है।
BRICS देशों के बीच व्यापार बढ़ाने से सदस्य देश पश्चिमी बाजारों पर निर्भरता कम कर सकते हैं और नए बाजार तैयार कर सकते हैं।
लेकिन भारत का जोर इसे किसी एक देश या समूह के खिलाफ इस्तेमाल करने के बजाय आर्थिक सहयोग बढ़ाने पर है।
डॉलर का विकल्प बनेगी लोकल करेंसी?
BRICS में सबसे ज्यादा चर्चा वाले मुद्दों में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार भी शामिल है।
रूस और ईरान जैसे देश अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था के विकल्प तलाशने में ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं।
BRICS देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन बढ़ाने से डॉलर पर निर्भरता कुछ हद तक कम हो सकती है।
हालांकि एक साझा BRICS करेंसी बनाना बेहद जटिल और लंबी प्रक्रिया है।
सदस्य देशों की अर्थव्यवस्था, मौद्रिक नीतियां और राजनीतिक हित काफी अलग हैं।
इसलिए फिलहाल फोकस स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों को बढ़ाने पर ज्यादा है।
रूस के साथ 100 अरब डॉलर व्यापार का लक्ष्य
भारत और रूस के आर्थिक संबंधों में पिछले कुछ वर्षों में बड़ी तेजी आई है।
दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार को 2030 तक **100 अरब डॉलर** तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है।
ऊर्जा इस रिश्ते का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
रूस भारत के लिए कच्चे तेल का प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन चुका है।
मध्य पूर्व में तेल सप्लाई संकट के दौरान रूसी तेल भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए और महत्वपूर्ण हो गया है।
मोदी-पुतिन की बैठक में व्यापार और ऊर्जा संबंधों को मजबूत करने पर जोर इसी रणनीति का हिस्सा है।
ऊर्जा सुरक्षा भारत के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देशों में शामिल है।
पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने और कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंचने से भारत की चिंता बढ़ी है।
ऐसे समय में रूस, खाड़ी देश और दूसरे तेल उत्पादकों के साथ मजबूत संबंध भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
भारत किसी एक सप्लायर पर निर्भर नहीं रहना चाहता।
इसीलिए नई दिल्ली रूस के साथ तेल व्यापार बनाए रखते हुए सऊदी अरब, यूएई, इराक और दूसरे देशों से भी ऊर्जा संबंध मजबूत रखती है।
ईरान इसलिए भी महत्वपूर्ण
ईरान भारत के लिए केवल तेल या पश्चिम एशिया की राजनीति के कारण महत्वपूर्ण नहीं है।
चाबहार बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक महत्व रखता है।
इसके जरिए भारत पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच सकता है।
इसके अलावा इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर में भी ईरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अगर क्षेत्र में शांति और स्थिरता रहती है तो भारत से मध्य एशिया और रूस तक व्यापारिक कनेक्टिविटी को मजबूत करने में ईरान बड़ी भूमिका निभा सकता है।
अमेरिका क्या देख रहा होगा?
भारत की रूस और ईरान के साथ बढ़ती कूटनीतिक सक्रियता पर अमेरिका की नजर होना स्वाभाविक है।
वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच रक्षा, तकनीक और रणनीतिक सहयोग मजबूत है।
लेकिन रूस और ईरान को लेकर दोनों देशों की नीतियां कई मुद्दों पर अलग रही हैं।
भारत ने बार-बार स्पष्ट किया है कि उसकी विदेश नीति राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय होगी।
इसलिए रूस से तेल खरीद हो या ईरान के साथ संपर्क—नई दिल्ली अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों को प्राथमिकता देती रही है।
क्या यह अमेरिका विरोधी संदेश है?
BRICS की तस्वीरों को सीधे अमेरिका विरोधी संदेश मानना स्थिति को जरूरत से ज्यादा सरल बनाना होगा।
भारत अमेरिका के साथ अपने संबंध कमजोर करने के बजाय उन्हें भी मजबूत कर रहा है।
साथ ही वह रूस और ईरान से संबंध छोड़ना नहीं चाहता।
इसे भारत की 'मल्टी-अलाइनमेंट' रणनीति के रूप में देखा जा सकता है।
इस रणनीति में भारत अलग-अलग मुद्दों पर अलग देशों के साथ सहयोग करता है।
इसका उद्देश्य किसी एक महाशक्ति के साथ स्थायी खेमेबंदी से बचना और रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखना है।
सुरक्षित समुद्री रास्तों पर मोदी का जोर
BRICS बिजनेस फोरम में प्रधानमंत्री मोदी ने समुद्री व्यापार और नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया।
यह बयान मौजूदा परिस्थितियों में बेहद महत्वपूर्ण है।
पश्चिम एशिया के संघर्ष के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और लाल सागर जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर चिंता बढ़ी है।
भारत का बड़ा हिस्सा विदेशी व्यापार समुद्री मार्गों से होता है।
तेल और गैस का आयात भी समुद्री रास्तों पर निर्भर है।
इसलिए समुद्री मार्गों में बाधा भारत की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डाल सकती है।
व्यापारिक बाधाओं के बीच 'आर्थिक सेतु' भारत
प्रधानमंत्री मोदी ने BRICS बिजनेस फोरम में भारत को वैश्विक व्यापार के लिए एक आर्थिक सेतु के रूप में पेश किया।
दुनिया में व्यापारिक बाधाएं बढ़ रही हैं और अलग-अलग देशों के बीच आर्थिक तनाव दिखाई दे रहा है।
ऐसे समय में भारत नए व्यापार समझौते, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और सप्लाई चेन के जरिए अलग-अलग बाजारों को जोड़ने की कोशिश कर रहा है।
भारत का संदेश है कि BRICS केवल राजनीतिक बयानबाजी का मंच न बने बल्कि वास्तविक व्यापार और निवेश बढ़ाने वाला समूह बने।
Global South की आवाज बनने की कोशिश
भारत लंबे समय से खुद को Global South यानी विकासशील देशों की आवाज के रूप में पेश कर रहा है।
अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के कई देशों की शिकायत रही है कि वैश्विक संस्थाओं में उनकी आबादी और आर्थिक क्षमता के अनुपात में प्रतिनिधित्व नहीं है।
भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, विश्व बैंक और दूसरी वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग करता रहा है।
BRICS भारत को इस मुद्दे को उठाने के लिए एक बड़ा मंच देता है।
युद्ध के बीच शांति की बात
मौजूदा BRICS सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें ऐसे देशों के नेता मौजूद हैं जिनका वैश्विक संघर्षों से सीधा संबंध है।
रूस यूक्रेन युद्ध का प्रमुख पक्ष है।
ईरान पश्चिम एशिया के मौजूदा संघर्ष के केंद्र में है।
ऐसे माहौल में भारत बार-बार संवाद और कूटनीति की बात कर रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी ने पुतिन के सामने भी यही रुख रखा।
भारत का कहना है कि लंबे समय तक चलने वाले युद्ध से किसी का फायदा नहीं होता और समाधान बातचीत के जरिए तलाशना चाहिए।
मोदी-पुतिन की गर्मजोशी के मायने
कूटनीति में तस्वीरों और बॉडी लैंग्वेज का भी अपना महत्व होता है।
मोदी और पुतिन के बीच दिखाई देने वाली गर्मजोशी यह संकेत देती है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव और बदलती परिस्थितियों के बावजूद भारत-रूस संबंध मजबूत बने हुए हैं।
दोनों नेताओं का एक कार में प्रदर्शनी स्थल तक जाना भी चर्चा का विषय बना।
लेकिन भारत इसी के साथ दूसरे देशों के नेताओं से भी सक्रिय संवाद कर रहा है।
इसलिए इसे केवल रूस की तरफ झुकाव के रूप में देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी।
ईरानी राष्ट्रपति का हाथ थामने का संदेश
ईरानी राष्ट्रपति के साथ प्रधानमंत्री मोदी की गर्मजोशी भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा सकती है।
भारत यह दिखाना चाहता है कि संघर्ष और प्रतिबंधों के दौर में भी संवाद के रास्ते बंद नहीं होने चाहिए।
भारत की कोशिश खुद को ऐसे देश के रूप में स्थापित करने की है जो अलग-अलग पक्षों से बात कर सकता है।
यही भूमिका भविष्य में किसी कूटनीतिक पहल में भी भारत की उपयोगिता बढ़ा सकती है।
चीन भी BRICS समीकरण का अहम हिस्सा
BRICS में चीन की मौजूदगी भारत के लिए एक अलग चुनौती और अवसर दोनों है।
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा मौजूद है।
इसके बावजूद दोनों देश BRICS, SCO और दूसरे बहुपक्षीय मंचों पर साथ बैठते हैं।
यह भारत की विदेश नीति के उसी सिद्धांत को दर्शाता है जिसमें मतभेद होने के बावजूद संवाद और आर्थिक सहयोग के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं किए जाते।
BRICS को ठोस नतीजे देने होंगे
BRICS की बढ़ती सदस्य संख्या और आर्थिक ताकत के बावजूद संगठन के सामने बड़ी चुनौती भी है।
इसके सदस्य देशों के राष्ट्रीय हित कई मामलों में एक-दूसरे से अलग हैं।
रूस, चीन और ईरान पश्चिमी व्यवस्था के प्रति ज्यादा आक्रामक रुख रखते हैं।
भारत, ब्राजील और कुछ दूसरे सदस्य BRICS को पश्चिम विरोधी सैन्य या राजनीतिक गठबंधन बनाने के पक्ष में नहीं हैं।
इसीलिए संगठन की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह मतभेदों के बावजूद व्यापार, वित्त, तकनीक और विकास जैसे क्षेत्रों में कितने ठोस परिणाम देता है।
तस्वीरों से आगे है भारत का संदेश
पुतिन से गले मिलना या ईरानी राष्ट्रपति के साथ गर्मजोशी से हाथ मिलाना कैमरे के लिए मजबूत तस्वीरें जरूर हैं, लेकिन इनके पीछे भारत की विदेश नीति का बड़ा संदेश छिपा है।
नई दिल्ली यह दिखाना चाहती है कि वह रूस से दोस्ती रख सकती है, ईरान से बातचीत कर सकती है, अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी आगे बढ़ा सकती है और चीन के साथ मतभेदों के बावजूद बहुपक्षीय मंच पर संवाद कर सकती है।
इसी रणनीतिक संतुलन को भारत अपनी ताकत बनाना चाहता है।
दुनिया को मोदी का बड़ा संदेश क्या?
BRICS 2026 के मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संदेश तीन हिस्सों में समझा जा सकता है।
पहला—**युद्ध का समाधान संवाद और कूटनीति है।**
दूसरा—**भारत किसी एक वैश्विक खेमे में बंधकर अपनी विदेश नीति नहीं चलाएगा।**
तीसरा—**BRICS को टकराव का मंच बनाने के बजाय व्यापार, विकास, सुरक्षित सप्लाई चेन और Global South की आवाज मजबूत करने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए।**
यही वजह है कि रूस के राष्ट्रपति पुतिन के साथ मोदी की गर्मजोशी और ईरानी राष्ट्रपति के साथ उनकी मुलाकात को केवल फोटो-ऑप के रूप में नहीं देखा जा रहा।
दुनिया में जब अमेरिका, रूस, चीन और ईरान के बीच अलग-अलग स्तर पर तनाव है, तब भारत सभी प्रमुख शक्तियों के साथ बातचीत बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
BRICS के मंच से नई दिल्ली का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है—**भारत दोस्ती अपने हितों के आधार पर करेगा, युद्ध के बजाय बातचीत की वकालत करेगा और बदलती विश्व व्यवस्था में स्वतंत्र शक्ति केंद्र के रूप में अपनी जगह मजबूत करेगा।**
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