नई दिल्ली। भारत में आयोजित BRICS Summit 2026 पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन समेत कई बड़े नेता भारत पहुंच चुके हैं। अब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी सम्मेलन में शामिल होने वाले हैं। उनके भारत पहुंचने से पहले भाजपा के पूर्व राज्यसभा सांसद और पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य **विनय सहस्रबुद्धे** ने वैश्विक व्यवस्था और BRICS की भूमिका को लेकर बड़ा बयान दिया है।
सहस्रबुद्धे का कहना है कि दुनिया की व्यवस्था किसी एक सुपर पावर या एक मुद्रा के दबदबे पर आधारित नहीं होनी चाहिए। BRICS देश ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की तरफ बढ़ रहे हैं जिसमें अलग-अलग देशों को ज्यादा जगह मिले और वैश्विक व्यापार में किसी एक करेंसी पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता न रहे।
उनकी टिप्पणी ऐसे समय सामने आई है जब BRICS के मंच पर भारत और चीन की भूमिका, डॉलर के विकल्प, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और बदलती विश्व व्यवस्था को लेकर जोरदार चर्चा चल रही है।
क्या बोले विनय सहस्रबुद्धे?
विनय सहस्रबुद्धे ने BRICS को बदलती वैश्विक व्यवस्था से जोड़ते हुए कहा कि दुनिया अब एक सुपर पावर के प्रभुत्व वाली सोच से आगे बढ़ रही है।
उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में किसी एक देश की ताकत और वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में किसी एक मुद्रा का वर्चस्व लंबे समय तक उचित मॉडल नहीं हो सकता।
उन्होंने भारत और रूस के बीच रुपये और रूबल में होने वाले लेन-देन का उदाहरण भी दिया।
उनके मुताबिक स्थानीय मुद्राओं में व्यापार केवल तकनीकी बदलाव नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में विविधता लाने की दिशा में कदम है।
एक मुद्रा का दबदबा भी नहीं होना चाहिए'
सहस्रबुद्धे ने वैश्विक व्यापार में अमेरिकी डॉलर के दबदबे के संदर्भ में भी अपनी बात रखी।
उनका कहना है कि व्यापार और आर्थिक संबंधों में देशों के पास ज्यादा विकल्प होने चाहिए।
अगर दो देश अपनी स्थानीय मुद्राओं में कारोबार कर सकते हैं तो उन्हें हर लेन-देन के लिए किसी तीसरी मुद्रा पर निर्भर रहने की जरूरत क्यों हो?
BRICS के भीतर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने को इसी सोच से जोड़कर देखा जा रहा है।
हालांकि इसका अर्थ तत्काल डॉलर को हटाना नहीं है। वैश्विक व्यापार और वित्तीय व्यवस्था में डॉलर की भूमिका अभी बेहद मजबूत है और इसे बदलना लंबी तथा जटिल प्रक्रिया होगी।
शी जिनपिंग के दौरे से पहले बयान महत्वपूर्ण क्यों?
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा के ठीक पहले यह टिप्पणी कई कारणों से महत्वपूर्ण हो जाती है।
BRICS के सबसे बड़े सदस्य देशों में भारत और चीन शामिल हैं।
दोनों दुनिया की सबसे बड़ी आबादी और अर्थव्यवस्थाओं में गिने जाते हैं।
इसके बावजूद दोनों देशों के बीच सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा जैसे कई मुद्दे मौजूद हैं।
इस बार शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की द्विपक्षीय बैठक की तैयारी भी चल रही है।
ऐसे में BRICS के भविष्य को लेकर भारत और चीन की सोच पर विशेष नजर रहेगी।
मोदी और शी की बैठक की तैयारी
चीन के विदेश मंत्रालय ने पुष्टि की है कि दोनों देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय बैठक की व्यवस्था पर काम कर रहे हैं।
चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा कि बीजिंग भारत के साथ संबंधों को रणनीतिक और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से देखता है।
चीन ने संवाद और सहयोग बढ़ाने के साथ मतभेदों को उचित तरीके से संभालने की बात कही है।
मोदी-शी बैठक इसलिए महत्वपूर्ण होगी क्योंकि BRICS के दो सबसे बड़े देशों के संबंधों का असर संगठन की दिशा पर भी पड़ता है।
BRICS में भारत और चीन की अलग सोच?
BRICS को लेकर भारत और चीन के बीच एक महत्वपूर्ण रणनीतिक अंतर भी दिखाई देता है।
चीन BRICS के जरिए अमेरिका के नेतृत्व वाली वैश्विक व्यवस्था को ज्यादा मजबूती से चुनौती देने की कोशिश करता दिखाई देता है।
दूसरी तरफ भारत BRICS को पश्चिम-विरोधी गठबंधन में बदलने से बचाना चाहता है।
भारत का जोर बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था पर है, लेकिन इसके साथ वह अमेरिका और यूरोप से अपने संबंधों को भी मजबूत रखना चाहता है।
यही कारण है कि नई दिल्ली BRICS को 'Anti-West' के बजाय 'Non-Western' मंच के रूप में देखने पर जोर देती रही है।
भारत किसी एक खेमे में नहीं जाना चाहता
भारत की विदेश नीति का एक प्रमुख आधार रणनीतिक स्वायत्तता है।
भारत अमेरिका के साथ QUAD में शामिल है।
रूस के साथ उसकी दशकों पुरानी रणनीतिक साझेदारी है।
BRICS में वह चीन और ईरान के साथ बैठता है।
पश्चिम एशिया में भारत के इजरायल, सऊदी अरब, यूएई और ईरान सभी से महत्वपूर्ण संबंध हैं।
इसका मतलब है कि भारत किसी एक वैश्विक शक्ति केंद्र के साथ पूरी तरह जुड़ने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ अपने राष्ट्रीय हित के आधार पर रिश्ते रखना चाहता है।
रूस भी BRICS का बड़ा पावर सेंटर
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी ने नई दिल्ली BRICS Summit को और महत्वपूर्ण बना दिया है।
प्रधानमंत्री मोदी और पुतिन के बीच द्विपक्षीय बैठक हो चुकी है।
दोनों नेताओं ने ऊर्जा, व्यापार, रक्षा और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों पर चर्चा की।
भारत और रूस 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं।
मध्य पूर्व में जारी संकट के बीच ऊर्जा सुरक्षा भी दोनों देशों के रिश्तों का बड़ा मुद्दा है।
ईरान की मौजूदगी ने बढ़ाई अहमियत
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन भी सम्मेलन में शामिल हैं।
मौजूदा पश्चिम एशिया संकट के कारण ईरान की मौजूदगी विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो गई है।
ईरान BRICS के उन देशों में है जो अमेरिकी प्रतिबंधों और डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था पर निर्भरता कम करने की खुलकर वकालत करते रहे हैं।
भारत के लिए ईरान की अहमियत अलग है।
चाबहार बंदरगाह, मध्य एशिया से कनेक्टिविटी और इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के हित जुड़े हुए हैं।
डॉलर को चुनौती देगा BRICS?
BRICS की हर बैठक में एक सवाल जरूर उठता है—क्या यह समूह डॉलर का विकल्प तैयार करेगा?
इसका जवाब फिलहाल सीधा नहीं है।
BRICS के सदस्य स्थानीय मुद्राओं में ज्यादा व्यापार करने की कोशिश जरूर कर रहे हैं।
भारत-रूस व्यापार में रुपये और रूबल के इस्तेमाल की कोशिश इसका उदाहरण है।
चीन भी युआन के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल को बढ़ाना चाहता है।
लेकिन एक साझा BRICS मुद्रा बनाना बहुत कठिन है।
सदस्य देशों की अर्थव्यवस्था, केंद्रीय बैंक व्यवस्था, मुद्रास्फीति, पूंजी नियंत्रण और राजनीतिक हित एक-दूसरे से काफी अलग हैं।
इसलिए निकट भविष्य में डॉलर को पूरी तरह हटाने के बजाय स्थानीय मुद्रा व्यापार बढ़ाना ज्यादा व्यावहारिक लक्ष्य दिखाई देता है।
BRICS की ताकत कितनी बड़ी?
BRICS अब दुनिया का बेहद प्रभावशाली समूह बन चुका है।
विस्तार के बाद इसमें 11 सदस्य देश हैं।
सम्मेलन से जुड़ी आधिकारिक चर्चाओं के मुताबिक BRICS देश दुनिया की करीब आधी आबादी, लगभग 40 प्रतिशत वैश्विक GDP और एक चौथाई से अधिक वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं।
इसका मतलब है कि समूह की आर्थिक क्षमता बहुत बड़ी है।
लेकिन बड़ी आबादी और GDP अपने आप राजनीतिक एकता में नहीं बदलती।
BRICS की असली चुनौती सदस्य देशों के अलग-अलग हितों के बीच सहमति बनाना है।
सप्लाई चेन पर भी बड़ा फोकस
इस बार BRICS सम्मेलन में केवल भू-राजनीति और करेंसी की चर्चा नहीं हो रही है।
सप्लाई चेन को मजबूत करना भी एजेंडे में शामिल है।
BRICS Logistics Supply-Chain Cooperation Framework पर चर्चा चल रही है।
इसका उद्देश्य सदस्य देशों के बीच परिवहन, लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन को ज्यादा मजबूत और सुरक्षित बनाना है।
पश्चिम एशिया के संकट ने इस मुद्दे को और महत्वपूर्ण बना दिया है।
तेल, गैस, खाद्य पदार्थ और उर्वरक जैसी जरूरी चीजों की सप्लाई में बाधा पूरी दुनिया में कीमतें बढ़ा सकती है।
स्टार्टअप फंड भी एजेंडे में
BRICS Summit 2026 में एक Incubator Network और Startup Innovation Fund जैसे प्रस्ताव भी चर्चा में हैं।
इसके जरिए सदस्य देशों के स्टार्टअप और इनोवेशन इकोसिस्टम को जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
अगर इस पर ठोस सहमति बनती है तो BRICS को केवल राजनीतिक मंच के बजाय आर्थिक और तकनीकी सहयोग के नेटवर्क के रूप में मजबूत किया जा सकता है।
भारत जैसे बड़े स्टार्टअप बाजार के लिए यह महत्वपूर्ण अवसर हो सकता है।
क्या BRICS अमेरिका विरोधी संगठन है?
यह सवाल मौजूदा सम्मेलन में सबसे ज्यादा चर्चा में है।
रूस, चीन और ईरान जैसे सदस्य अमेरिकी प्रभुत्व वाली विश्व व्यवस्था को चुनौती देने की बात ज्यादा मुखर तरीके से करते हैं।
लेकिन भारत का रुख अलग है।
नई दिल्ली का मानना है कि दुनिया बहुध्रुवीय होनी चाहिए, लेकिन इसका मतलब पश्चिम से टकराव नहीं होना चाहिए।
भारत अमेरिका और यूरोप के साथ व्यापार, तकनीक, रक्षा और निवेश संबंध लगातार बढ़ा रहा है।
इसलिए भारत BRICS को किसी सैन्य या अमेरिका विरोधी गठबंधन में बदलने से बचाना चाहता है।
'Non-Western' लेकिन 'Anti-Western' नहीं
भारत की BRICS रणनीति को एक लाइन में समझना हो तो इसे 'Non-Western but not Anti-Western' कहा जा सकता है।
यानी यह ऐसा मंच हो जहां पश्चिम के बाहर की उभरती अर्थव्यवस्थाओं को ज्यादा आवाज मिले, लेकिन मंच का उद्देश्य पश्चिमी देशों से दुश्मनी करना न हो।
पूर्व राजनयिक अजय बिसारिया ने भी चेताया है कि अमेरिका BRICS को पश्चिम विरोधी संगठन के रूप में देख सकता है।
उनके मुताबिक भारत इस धारणा को रोकने और संगठन को गैर-पश्चिमी लेकिन पश्चिम-विरोधी नहीं रखने की कोशिश कर रहा है।
एक सुपर पावर वाली दुनिया पर सवाल
विनय सहस्रबुद्धे की टिप्पणी का सबसे बड़ा संदेश इसी जगह दिखाई देता है।
उनका तर्क किसी एक देश को दूसरी महाशक्ति से बदलने का नहीं बल्कि दुनिया में कई शक्ति केंद्र होने का है।
अगर अमेरिका का एकाधिकार कम हो और उसकी जगह केवल चीन का प्रभुत्व स्थापित हो जाए तो वह भी वास्तविक बहुध्रुवीय व्यवस्था नहीं होगी।
भारत के लिए आदर्श स्थिति ऐसी वैश्विक व्यवस्था है जिसमें अमेरिका, चीन, भारत, यूरोप, रूस और Global South के दूसरे देशों को पर्याप्त भूमिका मिले।
चीन के लिए भी संदेश?
सहस्रबुद्धे के बयान को सीधे चीन के खिलाफ चेतावनी कहना उचित नहीं होगा।
उन्होंने व्यापक वैश्विक व्यवस्था और एक सुपर पावर के प्रभुत्व की सोच पर सवाल उठाया है।
लेकिन BRICS में चीन की विशाल आर्थिक ताकत के कारण यह मुद्दा महत्वपूर्ण जरूर हो जाता है।
भारत नहीं चाहेगा कि अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देने के नाम पर BRICS चीन-केंद्रित संगठन बन जाए।
नई दिल्ली के लिए संगठन में शक्ति संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है।
मोदी-शी बैठक में किन मुद्दों पर नजर?
प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित बैठक में द्विपक्षीय संबंध सबसे बड़ा मुद्दा होंगे।
सीमा पर शांति और स्थिरता भारत की प्राथमिकताओं में बनी हुई है।
इसके अलावा दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश और आर्थिक सहयोग भी चर्चा में आ सकता है।
भारत का चीन के साथ बड़ा व्यापारिक रिश्ता है, लेकिन व्यापार घाटा लंबे समय से चिंता का विषय रहा है।
महत्वपूर्ण खनिज, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, सोलर उपकरण और औद्योगिक सप्लाई चेन में भी चीन की बड़ी भूमिका है।
इसलिए राजनीतिक मतभेदों के बावजूद आर्थिक संबंधों को पूरी तरह अलग करना आसान नहीं है।
ग्लोबल साउथ की लीडरशिप की होड़
BRICS के भीतर एक और महत्वपूर्ण सवाल है—Global South की आवाज कौन बनेगा?
भारत पिछले कई वर्षों से खुद को विकासशील देशों की आवाज के रूप में पेश कर रहा है।
चीन भी अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका में बड़े निवेश और व्यापार के जरिए अपना प्रभाव बढ़ा चुका है।
इसलिए BRICS में भारत और चीन सहयोगी होने के साथ कई मामलों में प्रतिस्पर्धी भी हैं।
भारत की कोशिश है कि छोटे और विकासशील देशों को ऐसा मंच मिले जिसमें वे किसी एक बड़ी शक्ति पर निर्भर न रहें।
भारत के लिए अवसर भी चुनौती भी
BRICS की बढ़ती ताकत भारत के लिए बड़ा अवसर है।
भारत इसके जरिए Global South में अपनी भूमिका मजबूत कर सकता है।
नए व्यापार बाजार खोज सकता है।
स्थानीय मुद्रा व्यापार बढ़ा सकता है।
ऊर्जा और सप्लाई चेन सुरक्षा में सहयोग हासिल कर सकता है।
लेकिन चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि BRICS किसी दूसरे देश के रणनीतिक एजेंडे का मंच न बन जाए।
भारत को रूस, चीन, ईरान और पश्चिमी देशों के बीच बेहद सावधानी से संतुलन साधना होगा।
शी के भारत आने पर दुनिया की नजर
शी जिनपिंग की भारत यात्रा केवल BRICS सम्मेलन में भागीदारी नहीं है।
भारत-चीन संबंधों में लंबे समय से मौजूद तनाव के कारण उनकी प्रधानमंत्री मोदी के साथ मुलाकात पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी।
अगर दोनों नेता सीमा, व्यापार और द्विपक्षीय संबंधों पर आगे बढ़ने का संकेत देते हैं तो इसका असर एशिया की राजनीति पर भी पड़ सकता है।
वहीं अगर मतभेद बने रहते हैं तो BRICS के भीतर भारत-चीन प्रतिस्पर्धा आगे भी दिखाई देती रहेगी।
BRICS के सामने असली परीक्षा
BRICS के पास जनसंख्या और अर्थव्यवस्था की ताकत जरूर है लेकिन उसकी असली परीक्षा अब ठोस परिणाम देने की है।
क्या सदस्य देश आपसी व्यापार बढ़ा पाएंगे?
क्या स्थानीय मुद्राओं में भुगतान आसान होगा?
क्या सप्लाई चेन संकट के समय एक-दूसरे की मदद कर पाएंगे?
क्या भारत और चीन अपने मतभेदों के बावजूद संगठन को आगे बढ़ा पाएंगे?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या BRICS अमेरिका के प्रभुत्व का विरोध करते हुए चीन के प्रभुत्व वाले मंच में बदलने से बच पाएगा?
यही सवाल संगठन के भविष्य को तय करेंगे।
'एक सुपर पावर' वाली सोच से आगे जाने का संदेश
शी जिनपिंग के भारत आने से पहले विनय सहस्रबुद्धे की टिप्पणी ने BRICS की मूल बहस को फिर सामने ला दिया है।
उनका संदेश है कि वैश्विक व्यवस्था में किसी एक सुपर पावर या एक मुद्रा का दबदबा नहीं होना चाहिए।
BRICS को ऐसी बहुध्रुवीय व्यवस्था तैयार करने में भूमिका निभानी चाहिए जहां देशों के पास ज्यादा आर्थिक और रणनीतिक विकल्प हों।
भारत के लिए इसका अर्थ अमेरिका को हटाकर चीन को शीर्ष पर बैठाना नहीं बल्कि **कई शक्ति केंद्रों वाली दुनिया** तैयार करना है।
यही कारण है कि नई दिल्ली में मोदी-पुतिन की गर्मजोशी, ईरान के साथ संवाद और अब शी जिनपिंग की यात्रा को एक ही व्यापक कूटनीतिक तस्वीर में देखा जा रहा है।
भारत का संदेश साफ दिखाई देता है—**सहयोग सभी से होगा, लेकिन वैश्विक व्यवस्था में किसी एक शक्ति का एकाधिकार स्वीकार नहीं किया जाएगा।**