नई दिल्ली। भारत के लिए खनिज सुरक्षा अब केवल खनन और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन तक सीमित मुद्दा नहीं रह गया है। देश की आर्थिक, औद्योगिक और रणनीतिक जरूरतों को देखते हुए जरूरी खनिजों की स्थिर और भरोसेमंद आपूर्ति राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ गई है। इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टील, रक्षा क्षेत्र, इलेक्ट्रिक वाहन, रिन्यूएबल एनर्जी और नई तकनीकों के विकास में खनिजों की भूमिका लगातार बढ़ रही है।

ऐसे में यदि भारत घरेलू स्तर पर जरूरी खनिजों की उपलब्धता और सप्लाई चेन को मजबूत नहीं कर पाता है, तो आयात पर उसकी निर्भरता बढ़ सकती है। इससे न केवल देश की अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ सकता है, बल्कि रणनीतिक स्तर पर भी बाहरी देशों पर निर्भरता बढ़ने की आशंका है।

खनिज संसाधनों को लेकर यह चिंता ऐसे समय में महत्वपूर्ण हो जाती है, जब दुनिया भर में महत्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों की मांग तेजी से बढ़ रही है। इलेक्ट्रिक वाहनों से लेकर ऊर्जा भंडारण और आधुनिक रक्षा तकनीक तक, कई नए उद्योग ऐसे खनिजों पर निर्भर हैं जिनकी आपूर्ति सीमित देशों के हाथों में केंद्रित है।

खनिज सुरक्षा क्यों जरूरी

भारत तेजी से बुनियादी ढांचे के विस्तार, औद्योगिक उत्पादन और हरित ऊर्जा की ओर बढ़ रहा है। इसके लिए बड़ी मात्रा में लौह अयस्क, कोयला, बॉक्साइट और अन्य खनिजों के साथ-साथ महत्वपूर्ण खनिजों की जरूरत है।

इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरी उद्योग के विस्तार के साथ लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और ग्रेफाइट जैसे खनिजों की मांग बढ़ रही है। इसी तरह रक्षा उपकरणों, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और आधुनिक तकनीकी उत्पादों के लिए भी कई महत्वपूर्ण खनिज जरूरी हैं।

यदि इन संसाधनों की घरेलू उपलब्धता पर्याप्त नहीं है, तो भारत को आयात पर निर्भर रहना पड़ सकता है। वैश्विक बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव या भू-राजनीतिक तनाव की स्थिति में यह निर्भरता देश के लिए आर्थिक जोखिम बन सकती है।

1957 के कानून से जुड़ा विवाद

भारत में खनिजों से जुड़े कर और अधिकारों का मुद्दा लंबे समय से कानूनी बहस का विषय रहा है। इसकी एक प्रमुख वजह Mines and Minerals (Development and Regulation) Act, 1957 यानी MMDR Act से संबंधित प्रावधानों की व्याख्या रही है।

1957 में बनाए गए इस कानून में खनिज विकास के क्षेत्र में केंद्र की भूमिका और खनिज अधिकारों पर कर लगाने की राज्यों की शक्तियों के बीच संबंध को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं सामने आती रही हैं।

संविधान राज्यों को खनिज अधिकारों से संबंधित कर लगाने की शक्ति प्रदान करता है, लेकिन केंद्र को खनिज विकास और उसके नियमन के व्यापक हित में राज्यों की शक्तियों को सीमित करने का अधिकार भी प्राप्त है।

यहीं से कानून की व्याख्या को लेकर जटिलता पैदा हुई।

अधिकारों की सीमा को लेकर असमंजस

MMDR Act में केंद्र और राज्यों के अधिकारों की सीमाओं को लेकर लंबे समय तक अलग-अलग मत सामने आते रहे। राज्यों का तर्क रहा कि संविधान उन्हें खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति देता है। दूसरी ओर, केंद्र के अधिकार और खनिज विकास को नियंत्रित करने वाली केंद्रीय व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठते रहे।

इन अलग-अलग व्याख्याओं के कारण खनिज कर और रॉयल्टी से संबंधित कई मामले अदालतों तक पहुंचे। करीब 35 वर्षों से यह विषय कानूनी विवादों का हिस्सा बना हुआ है।

मामला केवल टैक्स वसूली तक सीमित नहीं है। इसके पीछे केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय अधिकारों, प्राकृतिक संसाधनों से होने वाली आय और खनिज क्षेत्र के नियमन का बड़ा सवाल भी जुड़ा हुआ है।

राज्यों के राजस्व का महत्वपूर्ण स्रोत

खनिज संपदा वाले राज्यों के लिए खनन से मिलने वाला राजस्व महत्वपूर्ण होता है। खनिज अधिकारों पर कर, रॉयल्टी और अन्य शुल्क के जरिए राज्यों को राजस्व प्राप्त होता है। यह पैसा राज्य सरकारें बुनियादी ढांचे, कल्याणकारी योजनाओं और स्थानीय विकास पर खर्च करती हैं।

इसलिए खनिजों पर कर लगाने के अधिकार को लेकर राज्यों की दिलचस्पी स्वाभाविक है। दूसरी ओर, केंद्र के लिए खनिज क्षेत्र का नियमन राष्ट्रीय औद्योगिक नीति, रणनीतिक जरूरतों और संसाधनों के संतुलित उपयोग से जुड़ा है।

इसी वजह से केंद्र और राज्यों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण हो जाता है।

कानूनी विवाद का असर

खनिज कर व्यवस्था को लेकर लंबे समय तक चले विवादों का असर खनन क्षेत्र और निवेश पर भी पड़ सकता है। जब कर और शुल्क से संबंधित नियमों की व्याख्या को लेकर अनिश्चितता रहती है तो परियोजनाओं की लागत और निवेश संबंधी फैसलों पर असर पड़ सकता है।

खनन परियोजनाओं को शुरू करने में पहले से ही लंबा समय लगता है। जमीन, पर्यावरण, वन और अन्य मंजूरियों के अलावा यदि कर व्यवस्था को लेकर भी कानूनी अनिश्चितता बनी रहे तो परियोजनाओं के लिए जोखिम बढ़ सकता है।

ऐसे में स्पष्ट और स्थिर खनिज नीति भारत की आर्थिक जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण है।

रणनीतिक खनिजों पर बढ़ता फोकस

भारत अब महत्वपूर्ण खनिजों की घरेलू खोज और उत्पादन पर भी जोर दे रहा है। इसका उद्देश्य आयात निर्भरता को कम करना और भविष्य के उद्योगों के लिए जरूरी संसाधनों की आपूर्ति सुनिश्चित करना है।

इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी स्टोरेज, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और आधुनिक रक्षा उपकरणों के विस्तार के साथ रणनीतिक खनिजों का महत्व आने वाले वर्षों में और बढ़ सकता है।

यदि भारत इन खनिजों की घरेलू आपूर्ति, रिसाइक्लिंग और वैकल्पिक स्रोतों को विकसित करता है तो वह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आने वाले झटकों से बेहतर तरीके से निपट सकेगा।

घरेलू उत्पादन के साथ वैश्विक साझेदारी भी जरूरी

खनिज सुरक्षा हासिल करने के लिए केवल घरेलू खनन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। भारत को विदेशों में खनिज संपत्तियों में निवेश, रणनीतिक साझेदारी और लंबी अवधि के सप्लाई समझौतों पर भी ध्यान देना होगा।

इसके अलावा खनिजों की प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाना भी जरूरी है। केवल कच्चे खनिज का उत्पादन करने से देश पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं बन सकता। मूल्य श्रृंखला के विभिन्न चरणों में घरेलू क्षमता विकसित करनी होगी।

आगे की राह

भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था और आधुनिक उद्योगों की जरूरतों को देखते हुए खनिज सुरक्षा आने वाले वर्षों में एक महत्वपूर्ण नीति मुद्दा रहने वाली है। इसके लिए केंद्र और राज्यों के बीच स्पष्ट अधिकार विभाजन, स्थिर कर व्यवस्था और निवेश के अनुकूल माहौल जरूरी होगा।

करीब 35 वर्षों से चले आ रहे कानूनी विवाद यह संकेत देते हैं कि खनिज संसाधनों के इस्तेमाल और उनसे होने वाले राजस्व को लेकर व्यवस्था को अधिक स्पष्ट बनाने की जरूरत है।

खनिज सुरक्षा को केवल खनन बढ़ाने के नजरिए से देखने के बजाय इसे आर्थिक सुरक्षा, औद्योगिक विकास और राष्ट्रीय रणनीतिक हितों से जोड़कर देखना होगा। भारत यदि घरेलू संसाधनों का प्रभावी इस्तेमाल, महत्वपूर्ण खनिजों की खोज, रिसाइक्लिंग, प्रसंस्करण और वैश्विक आपूर्ति साझेदारी को एक साथ आगे बढ़ाता है, तो आयात निर्भरता कम करने की दिशा में मजबूत कदम उठाया जा सकता है।

आने वाले समय में भारत की औद्योगिक और तकनीकी महत्वाकांक्षाओं की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि देश अपनी खनिज सुरक्षा को कितनी दूरदर्शिता और स्पष्ट नीति के साथ मजबूत करता है।

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