नई दिल्ली। सत्य निकेतन में बिल्डिंग ढहने की घटना के बाद दिल्ली प्रशासन हरकत में आ गया है। उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने हादसे को लेकर एक उच्चस्तरीय बैठक बुलाई है। बैठक में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के साथ दिल्ली सरकार, नगर निगम, पुलिस, एनडीआरएफ और दिल्ली विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद हैं। हादसे के बाद भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने और आपात स्थिति में राहत एवं बचाव व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण फैसले लिए जाने की संभावना है।

बैठक में मंत्री आशीष सूद, एमसीडी कमिश्नर, एनडीआरएफ के प्रमुख, दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति योगेश सिंह और दिल्ली पुलिस कमिश्नर समेत कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। बैठक में सत्य निकेतन की घटना से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की जा रही है। प्रशासन की प्राथमिकता यह जानने की है कि हादसे की परिस्थितियां क्या थीं और भविष्य में इस तरह के खतरे की समय रहते पहचान कैसे की जा सकती है।

सत्य निकेतन का इलाका दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के नजदीक स्थित है। यहां बड़ी संख्या में छात्र रहते हैं और कई इमारतों में पीजी, हॉस्टल तथा किराये के आवास संचालित होते हैं। ऐसे में किसी इमारत की संरचनात्मक स्थिति खराब होने पर बड़ी संख्या में लोगों की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि घटना के बाद इमारतों की सुरक्षा और नियमों के पालन का मुद्दा प्रमुखता से सामने आया है।

खतरनाक इमारतों की पहचान पर हो सकता है बड़ा फैसला

उपराज्यपाल की अध्यक्षता में हो रही बैठक में राजधानी की पुरानी और जर्जर इमारतों की पहचान को लेकर विस्तृत कार्ययोजना पर चर्चा होने की संभावना है। नगर निगम से ऐसे भवनों की जानकारी मांगी जा सकती है जिन्हें पहले से असुरक्षित या खतरनाक घोषित किया गया है।

इसके अलावा उन इमारतों की जांच पर भी जोर दिया जा सकता है जिनमें बिना पर्याप्त सुरक्षा उपायों के निर्माण, मरम्मत या बदलाव किए गए हैं। अधिकारियों के बीच इस बात पर मंथन होने की उम्मीद है कि भवनों की संरचनात्मक सुरक्षा की नियमित जांच के लिए किस तरह की व्यवस्था तैयार की जाए।

बैठक में एमसीडी की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भवन निर्माण से जुड़े नियमों के अनुपालन, जर्जर इमारतों की पहचान और खतरनाक भवनों के खिलाफ समय पर कदम उठाने जैसे मुद्दों पर नगर निगम से जानकारी ली जा सकती है।

राहत-बचाव व्यवस्था की होगी समीक्षा

बैठक का दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा आपदा की स्थिति में राहत और बचाव कार्यों को अधिक प्रभावी बनाना है। एनडीआरएफ प्रमुख की मौजूदगी को इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। किसी इमारत के गिरने की स्थिति में शुरुआती कुछ घंटे बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। मलबे में फंसे लोगों तक जल्द पहुंचने के लिए पुलिस, दमकल विभाग, नगर निगम और आपदा प्रतिक्रिया बल के बीच बेहतर समन्वय जरूरी होता है।

ऐसे में बैठक में विभिन्न एजेंसियों के बीच सूचना साझा करने, मौके पर टीमों को जल्द पहुंचाने और भारी मशीनों सहित आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने की प्रक्रिया की समीक्षा की जा सकती है। यह भी देखा जा सकता है कि घनी आबादी वाले क्षेत्रों में किसी बड़े हादसे के दौरान बचाव दल को पहुंचने में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

DU के कुलपति भी बैठक में शामिल

दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति योगेश सिंह की बैठक में मौजूदगी भी अहम मानी जा रही है। सत्य निकेतन और आसपास के इलाकों में बड़ी संख्या में विश्वविद्यालय के छात्र रहते हैं। ऐसे में छात्रों की सुरक्षा को लेकर भी चर्चा होने की संभावना है।

विश्वविद्यालय के आसपास स्थित पीजी, किराये के मकान और अन्य आवासीय भवनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय प्रशासन और विश्वविद्यालय के बीच समन्वय बढ़ाने पर विचार किया जा सकता है। खासकर उन भवनों पर ध्यान दिया जा सकता है जिनमें क्षमता से अधिक लोग रह रहे हों या जहां सुरक्षा मानकों को लेकर शिकायतें सामने आई हों।

नियमों की अनदेखी पर सख्ती के संकेत

सत्य निकेतन की घटना के बाद भवन सुरक्षा से जुड़े नियमों की अनदेखी करने वालों के खिलाफ सख्त कदम उठाने की मांग भी तेज हो सकती है। राजधानी में कई स्थानों पर पुरानी इमारतों में निर्माण और बदलाव किए जाते हैं। ऐसे मामलों में भवन की संरचनात्मक क्षमता का ध्यान नहीं रखा गया तो दुर्घटना का खतरा बढ़ सकता है।

बैठक में यह तय किया जा सकता है कि जर्जर और असुरक्षित इमारतों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया को कैसे तेज किया जाए। साथ ही भवन मालिकों की जिम्मेदारी तय करने और आवश्यक सुरक्षा प्रमाणपत्रों को लेकर निगरानी बढ़ाने जैसे कदमों पर भी विचार हो सकता है।

हादसे से सबक लेकर बनेगी आगे की रणनीति

उपराज्यपाल द्वारा बुलाई गई उच्चस्तरीय बैठक का उद्देश्य केवल सत्य निकेतन हादसे की समीक्षा करना नहीं, बल्कि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस व्यवस्था तैयार करना भी है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता समेत विभिन्न विभागों और एजेंसियों के वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी से संकेत मिल रहे हैं कि भवन सुरक्षा और आपदा प्रबंधन को लेकर व्यापक स्तर पर फैसले किए जा सकते हैं।

अब नजर बैठक के बाद लिए जाने वाले निर्णयों पर है। जर्जर इमारतों का सर्वेक्षण, खतरनाक भवनों के खिलाफ कदम, पीजी और किराये की इमारतों की सुरक्षा जांच तथा आपदा के दौरान विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय जैसे मुद्दों पर नई व्यवस्था सामने आ सकती है।

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