ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर केंद्र के सुप्रीम कोर्ट रुख को कांग्रेस ने बताया यू-टर्न
नई दिल्ली। कांग्रेस ने बुधवार को ग्रेट निकोबार आइलैंड प्रोजेक्ट को लेकर केंद्र सरकार के रुख पर कड़ी आपत्ति जताई। पार्टी ने सरकार के सुप्रीम कोर्ट जाने के फैसले को “हैरान करने वाला यू-टर्न” बताया। कांग्रेस महासचिव और संचार विभाग के प्रभारी जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि केंद्र इस परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय और आदिवासी अधिकारों के सवालों का सामना करने के बजाय कलकत्ता हाई कोर्ट में लंबित मामलों की आगे की सुनवाई रुकवाने की कोशिश कर रहा है।
जयराम रमेश ने एक मीडिया रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट साझा करते हुए कहा कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर कलकत्ता हाई कोर्ट में आगे की कार्यवाही पर रोक लगाई जाए। ये मामले हाई कोर्ट की पोर्ट ब्लेयर सर्किट बेंच में लंबित हैं और इनमें परियोजना से जुड़े फॉरेस्ट राइट्स एक्ट यानी FRA के पालन, आदिवासी समुदायों की सहमति और पर्यावरणीय मंजूरियों पर सवाल उठाए गए हैं।
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में दायर विशेष अनुमति याचिका में कलकत्ता हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें हाई कोर्ट ने केंद्र की प्रारंभिक आपत्तियों को खारिज कर दिया था। केंद्र ने तर्क दिया था कि याचिकाकर्ता मीना गुप्ता को इस मामले में याचिका दाखिल करने का अधिकार नहीं है, लेकिन हाई कोर्ट ने मई 2026 में इन आपत्तियों को स्वीकार नहीं किया और याचिकाओं को अंतिम सुनवाई के लिए आगे बढ़ने की अनुमति दी।
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट करीब 92 हजार करोड़ रुपये की बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजना है। इसमें ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एयरपोर्ट, बिजली परियोजना और नया टाउनशिप विकसित करने की योजना शामिल है। परियोजना को राष्ट्रीय सामरिक और आर्थिक महत्व का बताया गया है, लेकिन इसके पर्यावरणीय प्रभाव, जंगलों की कटाई, जैव विविधता और स्थानीय आदिवासी समुदायों पर संभावित असर को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं।
कांग्रेस का आरोप है कि सरकार पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों से जुड़े सवालों की पूरी न्यायिक जांच से बचना चाहती है। जयराम रमेश ने कहा कि सरकार एक ऐसी परियोजना को आगे बढ़ा रही है, जिसके प्रभाव को लेकर विशेषज्ञों, पर्यावरणविदों और नागरिक समूहों ने गंभीर चिंताएं जताई हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इस मामले में पर्याप्त वैज्ञानिक और सामाजिक जांच के बिना जल्दबाजी की जा रही है। यह कांग्रेस का राजनीतिक आरोप है; केंद्र सरकार का कहना रहा है कि परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय और कानूनी मुद्दों की समीक्षा की गई है और आवश्यक मंजूरियां निर्धारित प्रक्रिया के तहत दी गई हैं।
जयराम रमेश इससे पहले भी ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को लेकर सरकार पर सवाल उठा चुके हैं। उन्होंने पर्यावरणीय अनुपालन रिपोर्ट, जैव विविधता संरक्षण योजना और गैलेथिया बे से जुड़ी रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की थी। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने जवाब में कहा था कि परियोजना से जुड़ी चिंताओं पर आवश्यक स्तर पर विचार किया जा चुका है।
कलकत्ता हाई कोर्ट के सामने लंबित याचिकाओं का मुख्य मुद्दा फॉरेस्ट राइट्स एक्ट के तहत आदिवासी और वन आश्रित समुदायों की सहमति की प्रक्रिया है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि जिस तरीके से सहमति ली गई, उसमें कानूनी प्रक्रियाओं का पूरी तरह पालन नहीं हुआ। दूसरी ओर केंद्र और अंडमान-निकोबार प्रशासन इन आरोपों का विरोध करते रहे हैं।
हाई कोर्ट ने अपने मई के आदेश में यह भी कहा था कि इतनी बड़ी सार्वजनिक परियोजना कानून से ऊपर नहीं हो सकती और उसका न्यायिक परीक्षण किया जा सकता है। अदालत ने यह माना कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में अत्यंत संवेदनशील जनजातीय समुदाय रहते हैं, इसलिए परियोजना से जुड़े अधिकारों और कानूनी प्रक्रियाओं की जांच जरूरी है।
केंद्र की सुप्रीम कोर्ट याचिका में हाई कोर्ट की आगे की कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग की गई है। उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक केंद्र ने जुलाई में विशेष अनुमति याचिका दाखिल की थी। अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष है और शीर्ष अदालत आगे तय करेगी कि हाई कोर्ट में लंबित कार्यवाही जारी रहेगी या उस पर कोई अंतरिम रोक लगाई जाएगी।
कांग्रेस ने केंद्र के इस कदम को अपनी पुरानी स्थिति से अलग बताया है। पार्टी का कहना है कि यदि सरकार को भरोसा है कि परियोजना में सभी कानूनी और पर्यावरणीय नियमों का पालन हुआ है, तो उसे हाई कोर्ट में अंतिम सुनवाई से पीछे नहीं हटना चाहिए।
वहीं सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में मुख्य तर्क यह है कि याचिकाकर्ता की पात्रता और मामले की सुनवाई योग्य होने का सवाल पहले तय होना चाहिए। केंद्र का कहना है कि हाई कोर्ट द्वारा प्रारंभिक आपत्तियां खारिज किए जाने के बाद उसने शीर्ष अदालत का रुख किया है। इस बिंदु पर अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट को करना है।
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को लेकर कानूनी और राजनीतिक बहस अब और तेज हो गई है। एक ओर सरकार इसे रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण परियोजना के रूप में आगे बढ़ा रही है, दूसरी ओर विपक्ष और पर्यावरण समूह इसके संभावित पारिस्थितिक और सामाजिक प्रभावों को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
फिलहाल सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट पर है। शीर्ष अदालत का फैसला यह तय करेगा कि कलकत्ता हाई कोर्ट में लंबित याचिकाओं की अंतिम सुनवाई आगे बढ़ेगी या पहले केंद्र की आपत्तियों पर सुप्रीम कोर्ट में निर्णय होगा। इस बीच कांग्रेस ने साफ किया है कि वह ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट से जुड़े पर्यावरणीय और आदिवासी अधिकारों के मुद्दे को राजनीतिक और सार्वजनिक स्तर पर उठाती रहेगी।