लखनऊ। उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं के मामले में भारत निर्वाचन आयोग ने बड़ी कार्रवाई की है। आयोग ने पीलीभीत विधानसभा क्षेत्र के दो निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (ERO) को तत्काल प्रभाव से निलंबित करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही दोनों अधिकारियों और मतदाता पंजीकरण केंद्र (VRC) के कंप्यूटर ऑपरेटर के खिलाफ पहले से दर्ज प्राथमिकी में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 198 जोड़ने के निर्देश दिए हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए आयोग ने उत्तर प्रदेश में मतदाता सूचियों की व्यापक स्तर पर जांच कराने को भी कहा है।यह कार्रवाई पीलीभीत विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में हजारों प्रविष्टियों में कथित गड़बड़ी सामने आने के बाद की गई है। आयोग ने 31 अक्टूबर 2026 को उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पत्र भेजकर दोनों अधिकारियों को निलंबित करने और उनके खिलाफ विभागीय तथा कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ाने के निर्देश दिए। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसकी पूर्व अनुमति के बिना दोनों अधिकारियों को दोबारा बहाल नहीं किया जाना चाहिए।
दो अधिकारियों पर गिरी गाज, कंप्यूटर ऑपरेटर भी जांच के घेरे में
निर्वाचन आयोग की कार्रवाई पीलीभीत विधानसभा क्षेत्र के दो ERO मयंक गोस्वामी और हेमंत चौधरी के खिलाफ की गई है। इनके साथ मतदाता पंजीकरण केंद्र में कार्यरत कंप्यूटर ऑपरेटर अनिल कुमार की भूमिका भी जांच के दायरे में है। आयोग ने संबंधित अधिकारियों को पहले से दर्ज FIR में BNS की धारा 198 शामिल करने के निर्देश दिए हैं।इस मामले में उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की ओर से पहले ही कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की गई थी। दोनों अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच के निर्देश दिए गए थे, जबकि कंप्यूटर ऑपरेटर की सेवाएं समाप्त करने की कार्रवाई भी की गई। अब निर्वाचन आयोग ने मामले को गंभीरता से लेते हुए निलंबन और आपराधिक कार्रवाई को आगे बढ़ाने का निर्देश दिया है।आयोग ने पीलीभीत के पांच सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (AERO) की भूमिका की भी जांच करने को कहा है। उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी से इन अधिकारियों की जिम्मेदारियों और मामले में उनकी भूमिका का विवरण तीन दिनों के भीतर मांगा गया है।
10,470 मतदाता प्रविष्टियों में मिली अनियमितता
जांच में सामने आया कि पीलीभीत विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में कुल 10,470 प्रविष्टियों में अनियमितताएं पाई गईं। जिला निर्वाचन अधिकारी की जांच रिपोर्ट के मुताबिक, मतदाता पंजीकरण केंद्र के कंप्यूटर ऑपरेटर ने 31 मई से 29 अगस्त 2026 के बीच मतदाताओं के विवरण में संशोधन के लिए फॉर्म-8 के कुल 13,779 आवेदन दर्ज किए थे।इनमें से 10,470 आवेदन स्वीकृत कर दिए गए, जबकि 3,309 आवेदन अस्वीकार किए गए। सबसे गंभीर बात यह सामने आई कि स्वीकृत किए गए सभी 10,470 आवेदनों के समर्थन में कोई भौतिक आवेदन पत्र या जरूरी दस्तावेज कार्यालय के रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं थे। जांच में इन सभी स्वीकृत प्रविष्टियों को अनियमित पाया गया।मामले की शुरुआत तब हुई, जब कुछ मतदाताओं ने शिकायत की कि ऑनलाइन पोर्टल पर अपना ईपीआईसी (EPIC) नंबर डालने पर उनके बजाय किसी दूसरे मतदाता का नाम और विवरण दिखाई दे रहा है। यानी मतदाता पहचान पत्र से जुड़े नंबर और संबंधित व्यक्ति के विवरण में विसंगति सामने आ रही थी। शिकायतों के बाद जिला प्रशासन ने जांच शुरू की और बड़ी संख्या में संदिग्ध बदलावों का पता चला।
फॉर्म-8 के जरिए बदले गए थे मतदाताओं के विवरण
चुनाव आयोग की जांच में फॉर्म-8 की प्रक्रिया के दुरुपयोग का मामला सामने आया है। फॉर्म-8 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नाम, पता और अन्य व्यक्तिगत विवरणों में संशोधन कराने के लिए किया जाता है। इसके जरिए मतदाता अपने विवरण में सुधार या स्थान परिवर्तन से संबंधित आवेदन कर सकते हैं।जांच रिपोर्ट के अनुसार, कंप्यूटर ऑपरेटर ने ECINET पोर्टल पर 31 मई से 29 अगस्त के बीच बड़ी संख्या में फॉर्म-8 आवेदन दर्ज किए। इनमें 16 जुलाई तक 4,717 और 17 जुलाई से 29 अगस्त के बीच 9,062 आवेदन दर्ज किए गए। इन आवेदनों के समर्थन में आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने के बावजूद 10,470 प्रविष्टियां स्वीकृत कर दी गईं।आयोग ने मामले को केवल तकनीकी गलती मानकर छोड़ने के बजाय जिम्मेदारी तय करने का फैसला किया है। अधिकारियों की भूमिका, कंप्यूटर ऑपरेटर को मिली लॉगिन सुविधा और आवेदन स्वीकृत करने की प्रक्रिया की भी जांच की जा रही है। इस मामले में जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक दलों की ओर से भी सवाल उठाए गए थे।
पूरे उत्तर प्रदेश की मतदाता सूचियों की होगी जांच
पीलीभीत में मामला सामने आने के बाद चुनाव आयोग ने जांच का दायरा बढ़ा दिया है। आयोग ने उत्तर प्रदेश के सभी जिलों में मतदाता सूची की जांच कराने के निर्देश दिए हैं, ताकि नाम जोड़ने, हटाने और विवरण में संशोधन से जुड़ी किसी अन्य अनियमितता का पता लगाया जा सके।इसके अलावा पीलीभीत के जिला निर्वाचन अधिकारी से जिले की सभी चार विधानसभा सीटों की मतदाता सूचियों की जांच रिपोर्ट मांगी गई है। आयोग ने निर्देश दिया है कि संबंधित रिपोर्ट एक सप्ताह के भीतर मुख्य निर्वाचन अधिकारी की टिप्पणियों के साथ प्रस्तुत की जाए।उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को यह भी निर्देश दिया गया है कि वह मतदाता पंजीकरण केंद्र में तैनात कंप्यूटर ऑपरेटर के खिलाफ की गई कार्रवाई की रिपोर्ट तीन दिनों के भीतर उपलब्ध कराएं। साथ ही पांच AERO की जिम्मेदारियों और भूमिका से जुड़ी जानकारी भी आयोग को भेजनी होगी।इस बीच, राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने सभी जिलों में कंप्यूटर सहायकों की ECINET लॉगिन आईडी निष्क्रिय कराने और संबंधित अधिकारियों से इसकी पुष्टि करने के निर्देश दिए हैं। जिला निर्वाचन अधिकारियों को अपने-अपने क्षेत्रों की मतदाता सूचियों की जांच कर अनुपालन रिपोर्ट देने को कहा गया है।
राजनीतिक विवाद के बीच बढ़ी चुनाव आयोग की सख्ती
पीलीभीत मतदाता सूची का मामला राजनीतिक विवाद का विषय भी बना। कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने आरोप लगाया था कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव किए गए हैं। विपक्ष ने मतदाताओं के नाम और अन्य विवरणों में कथित गड़बड़ियों को लेकर चुनाव आयोग से शिकायत की थी।कांग्रेस नेताओं ने दावा किया था कि पीलीभीत सदर विधानसभा क्षेत्र में हजारों मतदाताओं के विवरण प्रभावित हुए हैं। कुछ मामलों में नाम बदलने, नाम हटने और दूसरे लोगों के विवरण दर्ज होने की शिकायतें भी उठाई गई थीं। इन शिकायतों के बाद मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने जिला निर्वाचन अधिकारी से जांच कराई थी। हालांकि, राजनीतिक दलों के आरोप और प्रशासनिक जांच में प्रमाणित पाई गई 10,470 अनियमित प्रविष्टियां अलग-अलग तथ्य हैं।चुनाव आयोग की इस कार्रवाई को मतदाता सूची की शुद्धता और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। आयोग का जोर अब केवल पीलीभीत की गड़बड़ियों को सुधारने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे प्रदेश में ऐसी संभावित अनियमितताओं की पहचान करने पर भी है।फिलहाल दोनों ERO के खिलाफ निलंबन और विभागीय जांच की प्रक्रिया जारी है। कंप्यूटर ऑपरेटर की भूमिका की भी जांच की जा रही है। जांच और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सभी संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी और मामले के अन्य पहलुओं पर अंतिम स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। सबसे अहम बात यह है कि मतदाता सूची में किसी भी वास्तविक मतदाता का नाम या विवरण गलत तरीके से प्रभावित न हो और प्रत्येक पात्र नागरिक का मतदान का अधिकार सुरक्षित रहे।
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