नई दिल्ली। भारत अपने समुद्री खनिज संसाधनों के दोहन की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाने जा रहा है। खान मंत्रालय गुरुवार, 1 अक्टूबर से ऑफशोर मिनरल ब्लॉकों की नई नीलामी प्रक्रिया शुरू करेगा। इस पहल का उद्देश्य समुद्र तल में मौजूद महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों की खोज और भविष्य में उनके विकास को बढ़ावा देना है, ताकि देश की दीर्घकालिक मिनरल सुरक्षा को मजबूत किया जा सके।
मौजूदा दौर में इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, रिन्यूएबल एनर्जी, एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक्स और रणनीतिक उद्योगों में खनिजों की मांग तेजी से बढ़ रही है। इसी कारण भारत अपने घरेलू खनिज संसाधनों के साथ समुद्री क्षेत्रों में उपलब्ध संभावनाओं पर भी ध्यान बढ़ा रहा है।
खान मंत्रालय के अनुसार कोबाल्ट, निकेल, मैंगनीज, तांबा और रेयर अर्थ एलिमेंट जैसे खनिज आधुनिक तकनीकी अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। इनका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, ऊर्जा भंडारण प्रणालियों, पवन और सौर ऊर्जा उपकरणों, इलेक्ट्रॉनिक्स तथा कई रणनीतिक क्षेत्रों में होता है।
मंत्रालय का कहना है कि तकनीकी प्रगति, स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव और मजबूत वैश्विक सप्लाई चेन की जरूरत के बीच ऑफशोर मिनरल संसाधनों का महत्व लगातार बढ़ रहा है। भारत यदि अपने समुद्री क्षेत्र में उपलब्ध खनिजों की खोज और विकास बढ़ाता है तो इससे आयात पर निर्भरता कम करने और घरेलू आपूर्ति को मजबूत बनाने में मदद मिल सकती है।
इस नीलामी में अंडमान सागर क्षेत्र के दो ऑफशोर ब्लॉक शामिल किए जाने की जानकारी सामने आई है। ये क्षेत्र ग्रेट निकोबार के आसपास स्थित हैं और इनमें पॉलीमेटैलिक नोड्यूल्स तथा क्रस्ट जैसे समुद्री खनिज संसाधनों की संभावनाएं हैं। ऐसे निक्षेपों में निकेल, कोबाल्ट और रेयर अर्थ जैसे महत्वपूर्ण तत्व पाए जा सकते हैं।
सरकार ने इससे पहले भी ऑफशोर मिनरल सेक्टर को निजी निवेश के लिए खोलने की दिशा में कदम उठाए थे। नवंबर 2024 में भारत ने पहली बार 13 ऑफशोर मिनरल ब्लॉकों की ई-नीलामी शुरू की थी। इनमें केरल तट के पास निर्माण रेत के तीन ब्लॉक, गुजरात तट के पास लाइम-मड के तीन ब्लॉक और ग्रेट निकोबार के पास पॉलीमेटैलिक नोड्यूल्स तथा क्रस्ट के सात ब्लॉक शामिल थे।
इसके बाद ऑफशोर मिनरल नीलामी से जुड़े नियमों और प्रक्रिया में भी बदलाव किए गए। सरकार का उद्देश्य नीलामी प्रक्रिया को प्रतिस्पर्धी और पारदर्शी बनाने के साथ निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाना है। ऑफशोर एरिया मिनरल नियमों के तहत खनिज ब्लॉकों के लिए कंपोजिट लाइसेंस और अन्य अधिकार नीलामी के जरिए दिए जा सकते हैं।
भारत के लिए ऑफशोर मिनरल संसाधनों का महत्व केवल औद्योगिक उत्पादन तक सीमित नहीं है। क्रिटिकल मिनरल्स की वैश्विक सप्लाई कुछ देशों और क्षेत्रों में केंद्रित होने के कारण कई अर्थव्यवस्थाएं अपनी सप्लाई चेन को विविध बनाने पर काम कर रही हैं। भारत भी इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी निर्माण, सेमीकंडक्टर, रक्षा और अक्षय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाने की तैयारी कर रहा है।
इन उद्योगों के लिए निकेल और कोबाल्ट जैसे खनिज खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं। इनका इस्तेमाल कई तरह की बैटरी टेक्नोलॉजी में किया जाता है। वहीं रेयर अर्थ एलिमेंट्स का उपयोग इलेक्ट्रिक मोटर, इलेक्ट्रॉनिक्स, मैग्नेट, रक्षा उपकरण और कई हाई-टेक उत्पादों में होता है।
मैंगनीज भी स्टील उद्योग के अलावा बैटरी टेक्नोलॉजी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। तांबा बिजली नेटवर्क, इलेक्ट्रिक वाहन, चार्जिंग सिस्टम और रिन्यूएबल एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है।
इसी वजह से खान मंत्रालय घरेलू खनिज उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ क्रिटिकल मिनरल्स की खोज, विदेशों में खनिज संपत्तियों में निवेश और ऑफशोर संसाधनों के विकास जैसे कई मोर्चों पर काम कर रहा है।
अंडमान सागर के नए ब्लॉकों की नीलामी का उद्देश्य निजी और तकनीकी विशेषज्ञता को समुद्री खनिज खोज से जोड़ना भी है। समुद्र तल से खनिजों की खोज और संभावित उत्पादन पारंपरिक खनन की तुलना में तकनीकी रूप से ज्यादा चुनौतीपूर्ण होता है। इसके लिए समुद्री भूविज्ञान, सर्वेक्षण, गहरे समुद्र की तकनीक और पर्यावरणीय अध्ययन की जरूरत होती है।
ऑफशोर खनन से जुड़े पर्यावरणीय पहलुओं को भी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। मौजूदा नियमों के तहत किसी ऑफशोर क्षेत्र को खनिज अधिकारों के लिए अधिसूचित करने से पहले पर्यावरण, मत्स्य पालन और अन्य संबंधित विभागों से परामर्श जरूरी है। सरकार ने संसद में भी कहा था कि ऑफशोर ब्लॉक की प्रक्रिया में संबंधित मंत्रालयों और विभागों से पूर्व परामर्श किया जाता है।
समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर संभावित असर को देखते हुए ऑफशोर खनन परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय मूल्यांकन और संचालन से पहले जरूरी मंजूरियां महत्वपूर्ण रहेंगी। विशेष रूप से अंडमान-निकोबार क्षेत्र की जैव विविधता को देखते हुए विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन एक प्रमुख मुद्दा होगा।
सरकार का कहना है कि समुद्री खनिज संसाधनों का जिम्मेदार और टिकाऊ विकास आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को मजबूत कर सकता है। घरेलू संसाधनों की उपलब्धता बढ़ने से भविष्य में उद्योगों को कच्चे माल की स्थिर आपूर्ति मिलने और वैश्विक बाजार में कीमतों या सप्लाई से जुड़े जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है।
1 अक्टूबर से शुरू होने वाली नई नीलामी को इसलिए केवल खनन क्षेत्र का कदम नहीं बल्कि भारत की औद्योगिक और ऊर्जा रणनीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है। इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ते भारत के लिए आने वाले वर्षों में क्रिटिकल मिनरल्स की मांग और बढ़ने की संभावना है।
ऑफशोर संसाधनों की सफल खोज और विकास से भारत अपने समुद्री क्षेत्र में मौजूद खनिज क्षमता का बेहतर उपयोग कर सकता है। इससे देश की संसाधन सुरक्षा, तकनीकी आत्मनिर्भरता और रणनीतिक उद्योगों के लिए कच्चे माल की उपलब्धता मजबूत करने की दिशा में नई संभावनाएं खुल सकती हैं।