नई दिल्ली : 27 अक्टूबर 2026। भारत की पारंपरिक हस्तशिल्प कला और कारीगरों की प्रतिभा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की दिशा में ब्रिक्स सांस्कृतिक बाजार 2026 एक महत्वपूर्ण मंच बनकर सामने आया है। नई दिल्ली के राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय एवं हस्तकला अकादमी में 10 से 15 सितंबर तक आयोजित इस कार्यक्रम में भारत सहित ब्रिक्स सदस्य और साझेदार देशों के कारीगरों ने अपनी पारंपरिक कलाओं का प्रदर्शन किया। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना के माध्यम से देश के पारंपरिक कारीगरों को प्रशिक्षण, आधुनिक उपकरण और बाजार तक पहुंच उपलब्ध कराने के प्रयास जारी हैं। हालांकि, ब्रिक्स बाजार में शामिल भारतीय कारीगरों में कितने पीएम विश्वकर्मा योजना के लाभार्थी थे, इसकी आधिकारिक संख्या स्पष्ट नहीं है।
ब्रिक्स कल्चरल बाजार में दिखी भारत की सांस्कृतिक विरासत
ब्रिक्स बाजार 2026 का आयोजन भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान किया गया। कार्यक्रम की थीम 'क्राफ्टिंग कल्चर्स, कनेक्टिंग पीपल' यानी शिल्प के जरिए संस्कृतियों और लोगों को जोड़ना रखी गई थी।इस आयोजन में विभिन्न देशों के कारीगरों ने हस्तनिर्मित उत्पाद, वस्त्र, कलाकृतियां और पारंपरिक शिल्प प्रस्तुत किए।भारत की ओर से राजस्थान, मध्य प्रदेश और कश्मीर की पारंपरिक कलाओं का प्रदर्शन विशेष आकर्षण रहा।कार्यक्रम में शामिल आगंतुकों को कारीगरों से सीधे संवाद करने और हस्तशिल्प उत्पादों के निर्माण की प्रक्रिया समझने का अवसर मिला।
लाख की चूड़ियों से लेकर टेराकोटा तक का प्रदर्शन
ब्रिक्स बाजार में भारतीय हस्तशिल्प की विविधता देखने को मिली। मध्य प्रदेश की ब्लॉक प्रिंटिंग, राजस्थान की लाख की चूड़ियां और टेराकोटा कला तथा कश्मीर की पेपर माशे कला का जीवंत प्रदर्शन किया गया।कारीगरों ने आगंतुकों को बताया कि पारंपरिक तकनीकों के माध्यम से इन उत्पादों को किस प्रकार तैयार किया जाता है।विशेष रूप से लाख की चूड़ियां बनाने की प्रक्रिया ने भारतीय हस्तकला की बारीकियों को सामने रखा।इस प्रकार के प्रदर्शन का उद्देश्य केवल उत्पादों की बिक्री तक सीमित नहीं था, बल्कि उनके पीछे मौजूद सांस्कृतिक परंपराओं और तकनीकी कौशल से लोगों को परिचित कराना भी था।
पीएम विश्वकर्मा योजना से कारीगरों को मिल रहा सहयोग
प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना की शुरुआत 17 सितंबर 2023 को की गई थी। इसका उद्देश्य पारंपरिक औजारों और हाथों से काम करने वाले कारीगरों को आर्थिक तथा तकनीकी सहायता प्रदान करना है।इस योजना के अंतर्गत बढ़ई, लोहार, कुम्हार, सुनार, मोची और अन्य पारंपरिक व्यवसायों से जुड़े कारीगरों को सहायता उपलब्ध कराई जाती है।योजना में कुल 18 पारंपरिक व्यवसाय शामिल हैं। इसके तहत लाभार्थियों को कौशल प्रशिक्षण, आधुनिक उपकरण खरीदने के लिए सहायता और बिना गारंटी के ऋण की सुविधा दी जाती है।इसके अतिरिक्त डिजिटल लेनदेन तथा उत्पादों के विपणन के लिए भी प्रोत्साहन दिया जाता है।
कारीगरों के लिए बाजार तक पहुंच बढ़ाने की पहल
पीएम विश्वकर्मा योजना का एक प्रमुख उद्देश्य छोटे कारीगरों को स्थानीय बाजारों से आगे बढ़ाकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अवसर उपलब्ध कराना है।इसके लिए प्रदर्शनियों, व्यापार मेलों और विशेष हस्तशिल्प आयोजनों का सहारा लिया जा रहा है।जनवरी 2026 में नई दिल्ली के दिल्ली हाट में आयोजित पीएम विश्वकर्मा हाट में 117 से अधिक कारीगरों को अपने उत्पाद प्रदर्शित करने का अवसर मिला था।सरकार के अनुसार, ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से कारीगरों को ग्राहकों, व्यापारिक संस्थानों और संभावित खरीदारों से सीधे संपर्क स्थापित करने में सहायता मिलती है।
ब्रिक्स देशों के बीच सांस्कृतिक सहयोग को बढ़ावा
ब्रिक्स बाजार में भारत के अलावा रूस, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और अन्य सदस्य तथा साझेदार देशों की कलाओं को भी प्रदर्शित किया गया।इस आयोजन ने विभिन्न देशों की सांस्कृतिक विरासत को साझा मंच प्रदान कियाविदेशी कारीगरों ने भी पारंपरिक हस्तशिल्प के संरक्षण और नई पीढ़ी तक कौशल पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर दिया।कार्यक्रम का एक प्रमुख उद्देश्य कारीगरों, डिजाइनरों और छोटे रचनात्मक उद्यमों के बीच संपर्क बढ़ाना था।
भारतीय हस्तशिल्प को वैश्विक पहचान मिलने की उम्मीद
भारतीय हस्तशिल्प उद्योग देश की सांस्कृतिक विरासत के साथ ग्रामीण आजीविका का भी महत्वपूर्ण माध्यम है।ब्रिक्स जैसे अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में भागीदारी से पारंपरिक उत्पादों को नए ग्राहकों और संभावित व्यापारिक साझेदारों तक पहुंचाने के अवसर मिल सकते हैं।वहीं, पीएम विश्वकर्मा योजना से मिलने वाला प्रशिक्षण, उपकरण सहयोग और वित्तीय सहायता कारीगरों के व्यवसाय को मजबूत करने में भूमिका निभा सकता है।हालांकि, इन पहलों से वास्तविक बिक्री, निर्यात और कारीगरों की आय में कितना सुधार हुआ है, इसका आकलन संबंधित आंकड़ों के आधार पर ही किया जा सकता है।