नई दिल्ली: दक्षिण एशिया में स्टील्थ लड़ाकू विमानों को लेकर रणनीतिक मुकाबला तेज होता दिखाई दे रहा है। चीन पहले से पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों पर तेजी से आगे बढ़ रहा है, जबकि पाकिस्तान के चीनी J-35 स्टील्थ फाइटर हासिल करने की संभावनाओं को लेकर लगातार चर्चा चल रही है। इसी बीच रूस का Su-57 एक बार फिर भारत के लिए संभावित विकल्प के रूप में सुर्खियों में है। हालांकि अभी भारत की ओर से Su-57 खरीदने का कोई अंतिम समझौता घोषित नहीं किया गया है। रूस ने भारत के सामने इसकी आपूर्ति और संयुक्त उत्पादन का प्रस्ताव रखा है।
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने जून 2026 में भारत को Su-57 कार्यक्रम में शामिल करने और भारत में संयुक्त उत्पादन की पेशकश की थी। इसके बाद इस प्रस्ताव को लेकर दोनों देशों के बीच चर्चा आगे बढ़ने की खबरें सामने आईं। हालिया रिपोर्टों में भी Su-57 की संयुक्त उत्पादन पेशकश को भारत-रूस रक्षा वार्ता के एजेंडे का हिस्सा बताया गया है।
भारत के लिए क्यों अहम है Su-57?
Su-57 रूस का पांचवीं पीढ़ी का मल्टीरोल लड़ाकू विमान है। इसे कम रडार दृश्यता यानी स्टील्थ विशेषताओं के साथ हवाई युद्ध और जमीन पर हमले जैसी अलग-अलग भूमिकाओं के लिए विकसित किया गया है। भारत के लिए इसकी सबसे बड़ी रणनीतिक अहमियत यह है कि स्वदेशी Advanced Medium Combat Aircraft यानी AMCA के बड़े पैमाने पर उपलब्ध होने से पहले यह अंतरिम पांचवीं पीढ़ी की क्षमता देने वाला विकल्प बन सकता है। कुछ रक्षा विश्लेषकों ने इसी संभावित क्षमता अंतर को Su-57 के पक्ष में सबसे महत्वपूर्ण तर्क बताया है। भारत का AMCA कार्यक्रम भविष्य की वायु शक्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन पांचवीं पीढ़ी के स्वदेशी लड़ाकू विमान को विकसित करने, परीक्षण करने और फिर स्क्वाड्रन स्तर पर शामिल करने में समय लगेगा। इसी अवधि में चीन के पास स्टील्थ विमानों की बढ़ती क्षमता भारत के सामने रणनीतिक चुनौती पेश करती है।
पाकिस्तान का J-35 प्लान कितना पक्का?
यहीं एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है। पाकिस्तान को J-35 मिलने की कई रिपोर्टें सामने आई हैं। मई 2026 की एक रिपोर्ट में पाकिस्तान और चीन के बीच J-35 को लेकर प्रारंभिक सहयोगी समझौते का दावा किया गया था। लेकिन दूसरी विश्लेषणात्मक रिपोर्टों का कहना है कि अभी तक अंतिम खरीद अनुबंध या पाकिस्तान को J-35 की वास्तविक डिलीवरी की सार्वजनिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए यह कहना कि पाकिस्तान के पास J-35 आ चुका है, फिलहाल सही नहीं होगा।
अगर भविष्य में पाकिस्तान J-35 हासिल करता है तो भारत के लिए चुनौती बढ़ सकती है। वहीं चीन खुद भी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की क्षमता बढ़ा रहा है। ऐसे में भारत को पश्चिमी और उत्तरी दोनों मोर्चों को ध्यान में रखते हुए अपनी वायु शक्ति की योजना बनानी होगी।
क्या Su-57 इसका सीधा जवाब होगा?
इसे केवल Su-57 बनाम J-35 की सीधी लड़ाई के रूप में देखना सही नहीं होगा। आधुनिक हवाई युद्ध में सिर्फ विमान की गति या स्टील्थ क्षमता फैसला नहीं करती। लंबी दूरी की मिसाइलें, एयरबोर्न अर्ली वार्निंग सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, ग्राउंड रडार, डेटा लिंक, सैटेलाइट और नेटवर्क आधारित युद्ध क्षमता भी महत्वपूर्ण होती है। इसके बावजूद Su-57 भारत को पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान की तत्काल जरूरत और AMCA के आने के बीच के अंतर को कम करने में मदद कर सकता है। यही वजह है कि इसे एक संभावित ‘ब्रिज फाइटर’ के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन यह तभी व्यावहारिक होगा जब विमान समय पर उपलब्ध हो, पर्याप्त संख्या में मिले और भारतीय हथियार तथा दूसरे सिस्टम उसके साथ प्रभावी तरीके से एकीकृत किए जा सकें। रूस की उत्पादन क्षमता और डिलीवरी समय को लेकर भी विश्लेषकों ने सवाल उठाए हैं।
भारत में बन सकता है Su-57?
इस प्रस्ताव का एक महत्वपूर्ण पहलू स्थानीय उत्पादन है। HAL के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर डीके सुनील ने 2026 में कहा था कि रूसी टीम साझेदारी से जुड़े पहलुओं का अध्ययन कर चुकी है और निवेश से संबंधित रूसी कोटेशन का इंतजार किया जा रहा था। इससे साफ है कि चर्चा सिर्फ तैयार विमान खरीदने तक सीमित नहीं रही बल्कि भारत में उत्पादन की संभावना भी विचार का हिस्सा रही है। भारत के लिए किसी भी संभावित सौदे में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर बेहद महत्वपूर्ण होगा। यदि भारत को उत्पादन, रखरखाव, भारतीय हथियारों के एकीकरण और भविष्य में अपग्रेड की पर्याप्त स्वतंत्रता मिलती है तो प्रस्ताव की रणनीतिक उपयोगिता बढ़ सकती है। रूस की तरफ से सह-उत्पादन और कस्टमाइजेशन की पेशकश की गई है।
लेकिन AMCA का क्या होगा?
Su-57 सौदे के खिलाफ सबसे बड़ा रणनीतिक तर्क यही है। भारत पहले से अपने AMCA कार्यक्रम को प्राथमिकता दे रहा है। यदि बड़ी रकम किसी विदेशी पांचवीं पीढ़ी के विमान पर खर्च होती है तो सवाल उठ सकता है कि इससे AMCA के लिए उपलब्ध संसाधनों या संस्थागत प्राथमिकताओं पर असर तो नहीं पड़ेगा। रक्षा विशेषज्ञों ने इस जोखिम की ओर ध्यान दिलाया है। इसलिए भारत के सामने फैसला केवल यह नहीं है कि Su-57 अच्छा विमान है या नहीं। वास्तविक सवाल यह है कि क्या सीमित संख्या में Su-57 लेकर तत्काल स्टील्थ क्षमता हासिल की जाए और समानांतर रूप से AMCA को तेजी से आगे बढ़ाया जाए, या फिर पूरी ताकत स्वदेशी कार्यक्रम पर लगाई जाए।
फिलहाल सौदा तय नहीं
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि Su-57 को भारतीय वायुसेना में शामिल करने का अंतिम फैसला सार्वजनिक रूप से घोषित नहीं हुआ है। हालिया रिपोर्टों में रूस की पेशकश और बातचीत की चर्चा जरूर है, लेकिन इसे पक्का सौदा कहना जल्दबाजी होगी। इसी तरह पाकिस्तान के J-35 कार्यक्रम को भी अंतिम और पूरी तरह सुनिश्चित डिलीवरी मान लेना उचित नहीं है। अगर पाकिस्तान को भविष्य में J-35 मिलता है और चीन अपनी पांचवीं पीढ़ी की ताकत लगातार बढ़ाता है, तो भारत के लिए स्टील्थ फाइटर क्षमता की जरूरत और महत्वपूर्ण हो जाएगी। ऐसी स्थिति में Su-57 एक अंतरिम विकल्प हो सकता है, जबकि लंबी अवधि में भारत की असली रणनीतिक ताकत AMCA और स्वदेशी रक्षा तकनीक के विकास पर निर्भर करेगी। यानी Su-57 संभावित रूप से भारत की ‘ढाल’ का हिस्सा बन सकता है, लेकिन अभी इसे भारत का तय J-35 जवाब कहना सही नहीं होगा।
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