नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस शिव नारायण ढिंगरा ने बुधवार को मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी SIR को लेकर विपक्षी INDIA गठबंधन के विरोध प्रदर्शन पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची का गहन संशोधन भारत निर्वाचन आयोग की कानूनी और संवैधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा है और इसे लेकर लगाए जा रहे आरोपों को तथ्यों के आधार पर परखा जाना चाहिए।जस्टिस ढिंगरा  विपक्ष की ओर से लगाए गए उन आरोपों को खारिज किया, जिनमें कहा जा रहा है कि SIR प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए और वास्तविक मतदाताओं को मतदान के अधिकार से वंचित करने की कोशिश हुई। उन्होंने विपक्षी दलों के सड़क पर उतरकर प्रदर्शन करने और निर्वाचन आयोग मुख्यालय तक मार्च करने के तरीके की आलोचना की।
उनका कहना था कि मतदाता सूची का समय-समय पर संशोधन करना निर्वाचन आयोग के काम का जरूरी हिस्सा है। यदि किसी मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया जाता है, तो उसके लिए निर्धारित कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया उपलब्ध है। ऐसे मामलों में संबंधित व्यक्ति या राजनीतिक दल दस्तावेज और प्रमाण के साथ आपत्ति दर्ज करा सकते हैं।विपक्षी INDIA गठबंधन ने 6 अक्टूबर को दिल्ली में SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर बड़ा विरोध प्रदर्शन किया था। विपक्षी सांसदों ने निर्वाचन आयोग मुख्यालय तक मार्च करने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने उन्हें रास्ते में रोक दिया। इसके बाद राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और अन्य विपक्षी नेता प्रदर्शन में शामिल रहे। कई नेताओं को बाद में हिरासत में भी लिया गया।
विपक्ष का आरोप है कि SIR प्रक्रिया में मतदाता सूची से योग्य मतदाताओं के नाम हटाए गए और प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी रही। विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जवाबदेही की मांग कर रहे हैं। चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि मतदाता सूची संशोधन निर्धारित प्रक्रिया के तहत किया गया है और इसका उद्देश्य पात्र मतदाताओं को सूची में बनाए रखना तथा गलत, डुप्लीकेट या अयोग्य प्रविष्टियों को हटाना है।जस्टिस ढिंगरा ने कहा कि किसी भी मतदाता सूची को स्थायी मानकर नहीं चला जा सकता। समय के साथ लोगों का पता बदलता है, कुछ मतदाताओं की मृत्यु हो जाती है, नए मतदाता 18 वर्ष की आयु पूरी करते हैं और कई अन्य बदलाव होते रहते हैं। ऐसे में निर्वाचन आयोग के लिए मतदाता सूची को अपडेट करना आवश्यक होता है।
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि यदि किसी दल को लगता है कि सूची संशोधन में गड़बड़ी हुई है, तो उसे ठोस प्रमाण सामने रखने चाहिए। केवल यह कहना कि बड़ी संख्या में नाम हटाए गए, अपने आप में प्रक्रिया को अवैध साबित नहीं करता। हर नाम हटाने या जोड़ने के पीछे निर्धारित नियम और प्रक्रिया होती है, जिसकी जांच की जा सकती है।पूर्व न्यायाधीश ने विपक्ष के विरोध प्रदर्शन को राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित बताया और इसे मीडिया का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश करार दिया। यह उनका आकलन है, जबकि विपक्षी दलों का कहना है कि उनका आंदोलन मतदाताओं के अधिकार और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता से जुड़ा है। इस मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच तीखा राजनीतिक मतभेद बना हुआ है।
INDIA गठबंधन के नेताओं का कहना है कि मतदाता सूची से नाम हटना सीधे मतदान के अधिकार से जुड़ा विषय है, इसलिए निर्वाचन आयोग को पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक और पारदर्शी बनानी चाहिए। विपक्ष ने आयोग से SIR से संबंधित फैसलों, नाम हटाने की प्रक्रिया और शिकायतों पर कार्रवाई का विस्तृत ब्यौरा सामने रखने की मांग की है।दूसरी ओर, चुनाव आयोग का रुख है कि मतदाता सूची का संशोधन नियमित और कानूनी प्रक्रिया है। आयोग के अनुसार, सूची में केवल पात्र मतदाताओं का नाम होना सुनिश्चित करना चुनाव की निष्पक्षता के लिए जरूरी है। आयोग ने विपक्ष की ओर से लगाए गए कई आरोपों को भ्रामक भी बताया है।जस्टिस ढिंगरा ने इसी संदर्भ में कहा कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण को अपने आप में गलत नहीं माना जा सकता। उनका कहना था कि यदि सूची में मृत व्यक्तियों, दोहराए गए नामों या स्थान बदल चुके मतदाताओं की प्रविष्टियां बनी रहें, तो इससे चुनावी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसलिए सूची की जांच और संशोधन जरूरी है।
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचन आयोग को स्वतंत्र रूप से अपना काम करने दिया जाना चाहिए। साथ ही यदि आयोग के किसी फैसले से किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल को आपत्ति है, तो न्यायिक और प्रशासनिक उपाय मौजूद हैं।दिल्ली में SIR के खिलाफ हुआ विरोध प्रदर्शन दो दिनों तक राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बना रहा। दूसरे दिन भी विपक्षी सांसदों ने प्रदर्शन किया और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ अपनी मांगें दोहराईं।इस पूरे विवाद में मुख्य मुद्दा यही है कि मतदाता सूची से नाम हटाने और जोड़ने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रही और क्या सभी पात्र मतदाताओं को पर्याप्त अवसर दिया गया। विपक्ष इस प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा है, जबकि निर्वाचन आयोग अपने कदमों को नियमों के अनुरूप बता रहा है।
जस्टिस शिव नारायण ढिंगरा का बयान इसी बहस के बीच आया है। उन्होंने विपक्ष के आरोपों को स्वीकार करने के बजाय इस बात पर जोर दिया कि निर्वाचन आयोग का मतदाता सूची का गहन संशोधन करना उसकी जिम्मेदारी है। उनके मुताबिक, यदि किसी को किसी विशेष नाम या मामले को लेकर आपत्ति है, तो उसे प्रमाण और निर्धारित प्रक्रिया के जरिए चुनौती दी जानी चाहिए।फिलहाल SIR को लेकर राजनीतिक विवाद जारी है। विपक्ष इस मुद्दे को मतदाताओं के अधिकार से जोड़कर आंदोलन कर रहा है, जबकि चुनाव आयोग और उसके पक्ष में बोलने वाले लोग इसे मतदाता सूची को सही और अद्यतन रखने की जरूरी प्रक्रिया बता रहे हैं। आने वाले दिनों में आयोग की ओर से दिए जाने वाले जवाब और इस मुद्दे पर होने वाली कानूनी कार्यवाही पर नजर बनी रहेगी।
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