नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालय जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रसंघ की बहाली को लेकर पिछले 18 दिनों से चल रहे आंदोलन में आखिरकार छात्रों को बड़ी सफलता मिली है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रसंघ चुनाव कराने और इससे जुड़ी प्रक्रिया की समयसीमा तय करने की मांग स्वीकार कर ली है। गुरुवार को जारी नए आदेश के अनुसार, विश्वविद्यालय में छात्रसंघ का संविधान 15 मई 2027 तक तैयार कर मंजूर और लागू किया जाएगा। इसके बाद 16 जुलाई 2027 से शुरू होने वाले आगामी शैक्षणिक सत्र के छह सप्ताह के भीतर छात्रसंघ चुनाव आयोजित किए जाएंगे। इस फैसले से करीब दो दशकों से छात्रसंघ चुनाव की बहाली की मांग कर रहे विद्यार्थियों के बीच खुशी का माहौल है। प्रशासन ने आंदोलन के दौरान छात्रों के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाइयों को वापस लेने का भी निर्णय लिया है।
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रसंघ बहाली की मांग को लेकर 12 अक्टूबर से आंदोलन शुरू हुआ था। कई छात्र अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए थे। उनका कहना था कि विश्वविद्यालय में लंबे समय से निर्वाचित छात्रसंघ नहीं होने के कारण विद्यार्थियों की समस्याओं और मांगों को प्रभावी तरीके से प्रशासन के सामने रखने में कठिनाई होती है।
छात्रों की प्रमुख मांग थी कि विश्वविद्यालय में लोकतांत्रिक तरीके से छात्रसंघ चुनाव कराए जाएं। इसके साथ ही चुनाव की निश्चित समयसीमा घोषित करने और आंदोलन में भाग लेने वाले विद्यार्थियों के खिलाफ जारी निलंबन तथा अन्य अनुशासनात्मक आदेशों को वापस लेने की मांग भी उठाई गई थी।
आंदोलन के दौरान छात्र लगातार विश्वविद्यालय प्रशासन से बातचीत करने की मांग कर रहे थे। कई दौर की बातचीत के बावजूद चुनाव की समयसीमा को लेकर सहमति नहीं बन पा रही थी। इस कारण आंदोलन लंबा खिंचता गया और विश्वविद्यालय परिसर में तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई।
दरअसल, जामिया मिल्लिया इस्लामिया में वर्ष 2006 के बाद से छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए हैं। पिछले लगभग 20 वर्षों से विश्वविद्यालय में निर्वाचित छात्रसंघ की व्यवस्था बहाल करने की मांग उठती रही है। छात्रों का कहना था कि देश के अन्य प्रमुख विश्वविद्यालयों की तरह जामिया में भी विद्यार्थियों को लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का अवसर मिलना चाहिए।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने इससे पहले 26 अक्टूबर को एक आदेश जारी कर छात्रसंघ चुनाव कराने पर सहमति जताई थी। उस आदेश के अनुसार, छात्रसंघ के संविधान को मंजूरी मिलने के 15 दिनों के भीतर चुनाव कराने की बात कही गई थी। हालांकि, संविधान को कब तक मंजूरी मिलेगी, इसकी निश्चित तारीख घोषित नहीं की गई थी।
यही कारण था कि आंदोलनकारी छात्रों ने पहले आदेश को पर्याप्त नहीं माना। उन्होंने कहा कि जब तक संविधान तैयार करने और चुनाव कराने की स्पष्ट समयसीमा निर्धारित नहीं होती, तब तक आंदोलन समाप्त नहीं किया जाएगा। इसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन और प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच गतिरोध बना रहा।
गुरुवार को विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रों की मांगों पर विचार करते हुए नया आदेश जारी किया। इसमें छात्रसंघ संविधान को मंजूरी देने और लागू करने की अंतिम समयसीमा 15 मई 2027 निर्धारित की गई। साथ ही आगामी शैक्षणिक सत्र शुरू होने के छह सप्ताह के भीतर चुनाव कराने का फैसला लिया गया।
विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार, चुनाव की प्रक्रिया लिंगदोह समिति की सिफारिशों और संबंधित नियमों के अनुरूप पूरी की जाएगी। इसके तहत चुनाव प्रक्रिया को व्यवस्थित और पारदर्शी बनाने का प्रयास किया जाएगा। हालांकि, चुनाव की सटीक तारीख की अलग से घोषणा की जानी बाकी है।
प्रशासन ने आंदोलन के दौरान छात्रों के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाइयों को भी वापस लेने का निर्णय लिया है। इसमें कारण बताओ नोटिस, निलंबन, निष्कासन और विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश पर लगाए गए प्रतिबंध जैसे आदेश शामिल हैं। इस फैसले को आंदोलनकारी छात्रों के लिए महत्वपूर्ण राहत माना जा रहा है।
छात्रों की ओर से सुरक्षा कर्मचारियों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए थे। इससे पहले प्रशासन ने आंदोलन के दौरान सुरक्षा कर्मचारियों के आचरण से जुड़े आरोपों की जांच के लिए समिति गठित करने पर सहमति जताई थी। हालांकि, इस जांच के निष्कर्षों के बारे में अभी कोई अंतिम जानकारी उपलब्ध नहीं है।
इस बीच आंदोलन का असर विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गतिविधियों पर भी पड़ा। परिसर में तनावपूर्ण स्थिति को देखते हुए प्रशासन ने कक्षाओं को ऑनलाइन माध्यम से संचालित करने का निर्णय लिया था। इसके साथ ही परीक्षाओं और अन्य कार्यक्रमों से जुड़ी व्यवस्थाओं में भी बदलाव किए गए।
विश्वविद्यालय ने 27 अक्टूबर को जारी आदेश में ऑनलाइन कक्षाओं की व्यवस्था 8 नवंबर तक जारी रखने की जानकारी दी थी। प्रशासन ने कहा था कि परिसर की स्थिति को ध्यान में रखते हुए आगे समीक्षा की जाएगी। आंदोलन के कारण विश्वविद्यालय के सामान्य शैक्षणिक वातावरण पर भी असर पड़ा।
जामिया मिल्लिया इस्लामिया के 106वें स्थापना दिवस पर भी छात्रसंघ बहाली का मुद्दा प्रमुखता से सामने आया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने विरोध प्रदर्शन के चलते आधिकारिक स्थापना दिवस समारोह और तालीमी मेले का आयोजन रद्द कर दिया था।
इसके बावजूद छात्रों ने परिसर में स्थापना दिवस को अपने तरीके से मनाने का निर्णय लिया। छात्रों ने गुलिस्तान-ए-गालिब के सामने 'इंकलाबी मेला' आयोजित किया। इस दौरान विद्यार्थियों ने छात्रसंघ की बहाली और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखी।
भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों की मौजूदगी में कार्यक्रम के दौरान नारेबाजी भी हुई। छात्रों ने इस अवसर को अपने आंदोलन और विश्वविद्यालय की ऐतिहासिक विरासत से जोड़कर देखा।
आंदोलन के दौरान परिसर में तोड़फोड़ और तनाव की घटनाएं भी सामने आई थीं। विश्वविद्यालय प्रशासन की शिकायत पर दिल्ली पुलिस ने अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है। हालांकि, इस मामले में जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया अलग से जारी है और सभी आरोपों की पुष्टि जांच के आधार पर ही हो सकेगी।
विश्वविद्यालय में छात्रसंघ बहाली का फैसला विद्यार्थियों के प्रतिनिधित्व के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। छात्रसंघ का उद्देश्य विद्यार्थियों की शैक्षणिक, प्रशासनिक और अन्य समस्याओं को विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने रखना तथा उनके समाधान के लिए लोकतांत्रिक मंच उपलब्ध कराना होता है।
छात्रों का तर्क रहा है कि छात्रसंघ चुनाव होने से विश्वविद्यालय की निर्णय प्रक्रिया में विद्यार्थियों की भागीदारी बढ़ सकती है। इसके माध्यम से छात्र अपने प्रतिनिधियों का चुनाव कर सकते हैं और विभिन्न मुद्दों पर संगठित तरीके से अपनी बात रख सकते हैं।
दूसरी ओर, विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना रहा है कि छात्रसंघ की बहाली के लिए संविधान, कानूनी प्रावधानों और संबंधित दिशानिर्देशों का पालन आवश्यक है। इसी कारण चुनाव कराने से पहले उचित प्रक्रिया पूरी करने पर जोर दिया गया है।
फिलहाल 18 दिनों के आंदोलन के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से छात्रसंघ संविधान और चुनाव की समयसीमा तय किए जाने से लंबे समय से चली आ रही मांग को महत्वपूर्ण सफलता मिली है। अब छात्रों की नजर 15 मई 2027 तक संविधान लागू होने और नए शैक्षणिक सत्र में चुनाव प्रक्रिया शुरू होने पर रहेगी।
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में लगभग दो दशक बाद छात्रसंघ चुनाव का रास्ता साफ होने से विश्वविद्यालय के छात्र प्रतिनिधित्व के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ने की उम्मीद है। हालांकि, चुनाव संपन्न होने और निर्वाचित छात्रसंघ के गठन के बाद ही बहाली की प्रक्रिया पूरी मानी जाएगी।
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