नई दिल्ली : राजधानी दिल्ली में कैंसर के बढ़ते मामलों के बीच बीमारी की निगरानी व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। दिल्ली में एक साल में कैंसर के 29,238 नए मामले सामने आने के बावजूद कैंसर की अनिवार्य रिपोर्टिंग व्यवस्था लागू नहीं है। ऐसे में बीमारी के वास्तविक आंकड़े, मरीजों की संख्या और इलाज की जरूरतों का सही आकलन करने में चुनौतियां बनी हुई हैं। सुप्रीम कोर्ट की पहल के बाद अब कैंसर को नोटिफाएबल डिजीज घोषित करने की मांग फिर तेज हो गई है।
कैंसर को नोटिफाएबल डिजीज बनाने का मतलब होगा कि अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों को हर नए कैंसर मरीज की जानकारी सरकार को देना अनिवार्य होगा। इससे देशभर में कैंसर के मामलों का सटीक डेटा तैयार किया जा सकेगा और सरकार बेहतर स्वास्थ्य योजनाएं बना सकेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में उन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कैंसर को नोटिफाएबल बीमारी घोषित करने पर विचार करने को कहा है, जहां अभी यह व्यवस्था लागू नहीं है। अदालत ने समान नीति की जरूरत पर जोर देते हुए कैंसर की अनिवार्य रिपोर्टिंग को लेकर सवाल उठाए हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा कैंसर रजिस्ट्री व्यवस्था पूरी आबादी को कवर नहीं कर पाती। सीमित डेटा के कारण कई बार बीमारी के फैलाव, जोखिम वाले क्षेत्रों और इलाज की जरूरतों का सही अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है।
दिल्ली जैसे बड़े शहर में जहां बड़ी संख्या में मरीज सरकारी और निजी अस्पतालों में इलाज कराते हैं, वहां अनिवार्य रिपोर्टिंग व्यवस्था लागू होने से कैंसर नियंत्रण की रणनीति को मजबूती मिल सकती है। इससे शुरुआती पहचान, स्क्रीनिंग कार्यक्रम और स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार में मदद मिलने की उम्मीद है। अब नजर इस बात पर है कि केंद्र और राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट की पहल के बाद कैंसर रिपोर्टिंग व्यवस्था को लेकर क्या कदम उठाती हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि कैंसर के खिलाफ प्रभावी लड़ाई के लिए सटीक आंकड़े और मजबूत निगरानी व्यवस्था बेहद जरूरी है।
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