Delhi दिल्ली : दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि पुलिस थाने में सन्नाटा पसरा रहने को अवज्ञा नहीं समझा जा सकता। न ही किसी अभियुक्त के स्वीकारोक्ति से इनकार को बाधा पहुँचाने वाला बताया जा सकता है। अभियोजन पक्ष द्वारा जबरन वसूली के एक मामले में अभियुक्त पर "कपटपूर्ण" होने के आरोप पर तीखी फटकार लगाते हुए, न्यायमूर्ति अरुण मोंगा ने स्पष्ट किया कि आपराधिक न्याय प्रणाली सहयोग को आत्म-दोषी ठहराने तक सीमित नहीं रख सकती।
अग्रिम ज़मानत की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायाधीश ने कहा, "मेरा मानना ​​है कि सिर्फ़ इसलिए कि आवेदक ने जाँच अधिकारी के सवालों का ठीक से जवाब नहीं दिया है या उसने कोई स्वीकारोक्ति नहीं की है और न ही अपने ख़िलाफ़ कोई आपत्तिजनक बात कही है, इसे असहयोग नहीं कहा जा सकता।" यह मामला एक ठेकेदार की शिकायत से उत्पन्न हुआ था कि उसके घर के पुनर्निर्माण के दौरान, अभियुक्त और अन्य ने काम रोकने के उद्देश्य से शिकायत दर्ज कराकर 20 लाख रुपये की जबरन वसूली का प्रयास किया था। इसके बाद, आईपीसी की धारा 384, 385, 120बी और 34 के तहत एक प्राथमिकी दर्ज की गई। इससे पहले, एक निचली अदालत ने पिछले साल जुलाई में आरोपी की ज़मानत याचिका खारिज कर दी थी।
राहत देते हुए, न्यायमूर्ति मोंगा ने कहा कि शिकायतकर्ता द्वारा अग्रिम ज़मानत का लगातार विरोध "सिर्फ़ अपने अहंकार की संतुष्टि के लिए" प्रतीत होता है। अदालत ने ज़ोर देकर कहा कि लगाए गए आरोप सुनवाई के विषय हैं, ज़मानत सुरक्षा से इनकार करने का आधार नहीं। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि आरोपी ने वास्तव में सहयोग किया था, और उससे कुछ भी बरामद नहीं किया जा सका, इसलिए निवारक हिरासत अनुचित थी। उसे तत्काल सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश देते हुए, न्यायमूर्ति मोंगा ने आदेश दिया, "जांच अधिकारी उसे तुरंत रिहा करेगा, बशर्ते वह अपनी संतुष्टि के अनुसार समान राशि की ज़मानत के साथ निजी मुचलका भर दे..."
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