Delhi दिल्ली बाढ़ क्षेत्र निर्धारण पर NGT ने उठाई आपत्ति, गंगा किनारे इलाकों को लेकर जताई चिंता
नई दिल्ली राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने नदी क्षेत्रों के संरक्षण और बाढ़-मैदान (Floodplain) की पहचान को लेकर चिंता जताते हुए संबंधित एजेंसियों से जवाब मांगा है। बाढ़ क्षेत्र निर्धारण की प्रक्रिया में पारदर्शिता और वैज्ञानिक आधार को लेकर सवाल उठाए गए हैं। NGT ने कहा है कि नदियों के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र और बाढ़-मैदानों की सुरक्षा पर्यावरण संतुलन के लिए बेहद जरूरी है। NGT की चिंता मुख्य रूप से इस बात को लेकर है कि कई स्थानों पर बाढ़-मैदान क्षेत्रों की पहचान और सीमांकन ठीक तरीके से नहीं किया गया है। बाढ़ क्षेत्र में अनियंत्रित निर्माण, अतिक्रमण और अन्य गतिविधियां नदी के प्राकृतिक स्वरूप को प्रभावित कर सकती हैं। इससे बारिश के समय जलभराव और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।
अधिकरण ने संबंधित विभागों से यह स्पष्ट करने को कहा है कि बाढ़-मैदान क्षेत्रों का निर्धारण किन वैज्ञानिक मानकों के आधार पर किया गया है। साथ ही यह भी पूछा गया है कि नदी किनारे संवेदनशील क्षेत्रों में अवैध निर्माण रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि नदियों के किनारे मौजूद बाढ़-मैदान प्राकृतिक रूप से अतिरिक्त पानी को रोकने और भूजल स्तर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निर्माण किया जाता है तो नदी की जलधारण क्षमता प्रभावित हो सकती है।
दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में यमुना नदी के बाढ़ क्षेत्र को लेकर पहले भी कई बार विवाद सामने आ चुके हैं। मानसून के दौरान नदी का जलस्तर बढ़ने पर निचले इलाकों में जलभराव की स्थिति पैदा होती है। ऐसे में बाढ़ क्षेत्र की सही पहचान और संरक्षण को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। NGT ने कहा है कि नदी संरक्षण केवल कागजी योजनाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि जमीन पर प्रभावी कार्रवाई भी जरूरी है। बाढ़-मैदान क्षेत्रों में किसी भी तरह की गतिविधियों को अनुमति देने से पहले पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन किया जाना चाहिए।
अधिकरण के रुख के बाद संबंधित विभागों पर बाढ़ क्षेत्र निर्धारण प्रक्रिया की समीक्षा और रिपोर्ट प्रस्तुत करने का दबाव बढ़ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक तरीके से किए गए सीमांकन से न केवल पर्यावरण की रक्षा होगी, बल्कि भविष्य में आने वाली बाढ़ जैसी आपदाओं से भी नुकसान कम किया जा सकेगा। NGT की आपत्ति को नदी संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि संबंधित प्रशासन इस मामले में क्या जवाब देता है और बाढ़-मैदान क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए कौन से ठोस कदम उठाए जाते हैं।