नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने अधिक मात्रा में चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट वाले पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर स्पष्ट चेतावनी लेबल लगाने में हो रही देरी को लेकर केंद्र सरकार और भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने सवाल किया कि क्या खाद्य नियामक कंपनियों के दबाव में चेतावनी लेबल लागू करने से हिचक रहा है। कोर्ट ने केंद्र और FSSAI को अपना अंतिम निर्णय रिकॉर्ड पर रखने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है।
गुरुवार को न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने फ्रंट-ऑफ-पैक वॉर्निंग लेबल से संबंधित जनहित याचिका पर सुनवाई की। पीठ ने कहा कि यह विषय देश के नागरिकों, विशेष रूप से बढ़ते बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़ा है। इसलिए इससे संबंधित नीतिगत निर्णय खाद्य कंपनियों के व्यावसायिक हितों से प्रभावित नहीं होने चाहिए। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि अधिकारी स्वयं जरूरी कदम नहीं उठाते हैं तो वह उचित निर्देश जारी करेगी। [लॉबीट](https://lawbeat.in/amp/top-stories/supreme-court-gives-fssai-last-chance-on-front-of-pack-warning-labels-for-high-sugar-salt-fat-foods-1621897) के मुताबिक केंद्र को इसे अंतिम अवसर देते हुए दो सप्ताह में निर्णय बताने को कहा गया है।
बैठक के फैसले पर उठे सवाल
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने 7 मार्च को आयोजित FSSAI की बैठक के विवरण का उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि बैठक में अपनाया गया रुख सुप्रीम कोर्ट के पहले के निर्देशों के अनुरूप नहीं है। आरोप लगाया गया कि खाद्य उद्योग की आपत्तियों को अधिक महत्व दिया गया, जबकि जनस्वास्थ्य विशेषज्ञों और नागरिक संगठनों की ओर से चेतावनी लेबल के समर्थन में प्रस्तुत साक्ष्यों की अनदेखी की गई।
FSSAI ने स्पष्ट चेतावनी की जगह पैकेट पर एक तालिका के माध्यम से अतिरिक्त चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट की मात्रा तथा दैनिक आवश्यकता की जानकारी देने का प्रस्ताव रखा है। अदालत ने पूछा कि उपभोक्ताओं को आसानी से समझ आने वाली चेतावनी देने में नियामक को आपत्ति क्यों है।
फ्रंट-ऑफ-पैक लेबल का उद्देश्य पैकेट के सामने स्पष्ट संकेत देना है, जिससे ग्राहक उत्पाद खरीदते समय तत्काल जान सके कि उसमें चीनी, नमक या वसा की मात्रा अधिक है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ग्राहक को उत्पाद खरीदने से रोका नहीं जा रहा है, लेकिन उसे यह जानने का अधिकार है कि वह क्या खा रहा है।
 पारंपरिक खाद्य पदार्थों का दिया तर्क
केंद्र और FSSAI की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बृजेंद्र चाहर ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मानकों को भारत में लागू करने से कई पारंपरिक खाद्य पदार्थों और नमकीन पर भी अधिक नमक या फैट की चेतावनी लग सकती है। इसका असर छोटे और मध्यम खाद्य कारोबारियों पर पड़ने की आशंका भी जताई गई।
अदालत इस दलील से संतुष्ट नहीं हुई। पीठ ने कहा कि उसका उद्देश्य किसी खास खाद्य पदार्थ या कंपनी को निशाना बनाना नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं को जागरूक बनाना है। विशेष रूप से बच्चों द्वारा अधिक मात्रा में खाए जाने वाले पैकेज्ड खाद्य उत्पादों को लेकर अदालत ने चिंता व्यक्त की।
कोर्ट ने यह भी कहा कि निर्माता चेतावनी लेबल का विरोध कर सकते हैं, क्योंकि इससे उनके कारोबार पर असर पड़ने की आशंका होगी। इसके बावजूद नागरिकों के स्वास्थ्य और जानकारी के अधिकार को व्यावसायिक हितों से कम महत्व नहीं दिया जा सकता। [बार एंड बेंच](https://www.barandbench.com/news/litigation/bowing-to-corporate-pressure-supreme-court-slams-fssais-reluctance-to-put-warning-labels-on-foods-high-in-sugar-salt-fat) के अनुसार अदालत ने स्पष्ट किया कि लेबल लगने के बाद भी उत्पाद खरीदने या नहीं खरीदने का अंतिम निर्णय ग्राहक का ही रहेगा।
 दो सप्ताह बाद फिर होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारत को नागरिकों और बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए प्रभावी खाद्य मानक अपनाने चाहिए। केंद्र और FSSAI को दो सप्ताह में अंतिम निर्णय पेश करने का निर्देश देते हुए पीठ ने चेतावनी दी कि संतोषजनक कार्रवाई नहीं होने पर अगली सुनवाई में अदालत आगे के निर्देश जारी करेगी।
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