नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन का असर हिमालय पर तेजी से दिखाई दे रहा है। बढ़ते तापमान और तेजी से पिघलते ग्लेशियरों ने न केवल पहाड़ी राज्यों बल्कि पूरे भारत के लिए चिंता बढ़ा दी है। सितंबर 2026 में जारी ‘Prosperous and Resilient Himalayas’ रिपोर्ट के मुताबिक हिमालयी क्षेत्र भारत की 20 प्रतिशत से अधिक GDP को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सहारा देता है। ऐसे में ग्लेशियरों का तेजी से सिकुड़ना पानी, कृषि, बिजली उत्पादन, पर्यटन, बुनियादी ढांचे और करोड़ों लोगों की आजीविका के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
यहां एक बात स्पष्ट करना जरूरी है कि ‘ग्लेशियर पिघले तो भारत की 20% GDP बह जाएगी’ को शाब्दिक रूप से नहीं लेना चाहिए। रिपोर्ट यह नहीं कहती कि भारत की 20 प्रतिशत GDP सीधे नष्ट हो जाएगी। उसका निष्कर्ष है कि हिमालय भारत की 20 प्रतिशत से अधिक GDP को सहारा देने वाली प्राकृतिक और आर्थिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इस क्षेत्र की जलवायु अस्थिरता उस आर्थिक मूल्य को जोखिम में डाल सकती है। एक अन्य रिपोर्ट में यह योगदान करीब 21.5 प्रतिशत यानी लगभग 64.8 लाख करोड़ रुपये बताया गया है।
तेजी से बदल रहे हिमालयी ग्लेशियर
हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियरों में बर्फ कम होने की रफ्तार चिंता का विषय बनी हुई है। मार्च 2026 में ICIMOD ने बताया था कि इस क्षेत्र में ग्लेशियरों की बर्फ खोने की दर वर्ष 2000 के बाद लगभग दोगुनी हो गई है। करीब दो अरब लोगों की जल सुरक्षा किसी न किसी स्तर पर इस विशाल पर्वतीय जल प्रणाली से जुड़ी हुई है। भारत सरकार भी हिमालयी ग्लेशियरों में अलग-अलग दर से तेजी से हो रहे मास लॉस की पुष्टि कर चुकी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार हिंदू कुश हिमालय के ग्लेशियरों की औसत पीछे हटने की दर 14.9 मीटर प्रतिवर्ष आंकी गई है। गंगा बेसिन में यह औसतन 15.5 मीटर और ब्रह्मपुत्र बेसिन में करीब 20.2 मीटर प्रतिवर्ष दर्ज की गई है। हालांकि सभी ग्लेशियर एक समान गति से नहीं पिघल रहे हैं और कराकोरम क्षेत्र में स्थिति अलग है।
‘पीक वाटर’ बन सकता है अगला बड़ा संकट
वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी चिंताओं में ‘पीक वाटर’ शामिल है। शुरुआत में बढ़ता तापमान ग्लेशियरों को तेजी से पिघलाता है, जिससे कुछ नदियों में अतिरिक्त पानी पहुंच सकता है। लेकिन ग्लेशियर लगातार छोटे होते गए तो एक समय ऐसा आएगा जब उनसे मिलने वाला पानी अधिकतम स्तर पर पहुंचने के बाद घटने लगेगा। सितंबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक हिमालयी क्षेत्र मध्य शताब्दी तक ऐसी स्थिति की ओर बढ़ सकता है। इसका मतलब यह है कि समस्या केवल ज्यादा पानी या अचानक आने वाली बाढ़ तक सीमित नहीं है। लंबे समय में पानी की उपलब्धता घटने और मौसम के अनुसार नदी प्रवाह में बदलाव का खतरा भी है। वैज्ञानिक अध्ययनों में अनुमान लगाया गया है कि ग्लेशियरों के सिकुड़ने के बाद नदी प्रणालियां बारिश पर अधिक निर्भर हो सकती हैं, जिससे सूखे और बाढ़ दोनों के प्रभाव बढ़ सकते हैं।
गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों पर असर
हिमालय भारत की कई प्रमुख नदियों के लिए महत्वपूर्ण जल स्रोत है। गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी नदी प्रणालियों के जल प्रवाह में बर्फ, ग्लेशियर और वर्षा की महत्वपूर्ण भूमिका है। हिमालयी ग्लेशियरों में बदलाव का प्रभाव स्थानीय पहाड़ी आबादी से बहुत आगे मैदानी इलाकों तक पहुंच सकता है। भारत के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने भी कहा है कि ग्लेशियरों का पिघलना लंबे समय में पानी की उपलब्धता और जलविद्युत उत्पादन को प्रभावित कर सकता है। यही कारण है कि हिमालय का संकट केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं रह जाता। सिंचाई के लिए पानी कम होने या नदी प्रवाह में अनिश्चितता बढ़ने से कृषि प्रभावित हो सकती है। जलविद्युत परियोजनाओं पर असर पड़ सकता है। पेयजल की उपलब्धता और उद्योगों के लिए जरूरी पानी पर दबाव बढ़ सकता है। इन सभी क्षेत्रों का सीधा संबंध अर्थव्यवस्था और रोजगार से है।
ग्लेशियल झीलें बढ़ा रही नया खतरा
ग्लेशियरों के पीछे हटने से कई जगह नई झीलें बन रही हैं या पुरानी ग्लेशियल झीलों का आकार बढ़ रहा है। ऐसी झीलों की प्राकृतिक दीवार टूटने पर अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की घाटियों की तरफ आ सकता है। इसे Glacial Lake Outburst Flood यानी GLOF कहा जाता है। नई रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब 200 ग्लेशियल झीलों की पहचान हाई रिस्क के रूप में की गई है और इनमें 56 को ‘वेरी हाई रिस्क’ श्रेणी में रखा गया है। इससे नीचे बसे लाखों लोगों, सड़कों, पुलों, बिजली परियोजनाओं और दूसरी महत्वपूर्ण परिसंपत्तियों के लिए जोखिम बढ़ जाता है। भारत सरकार ने भी माना है कि ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से नई झीलों का निर्माण और मौजूदा झीलों का विस्तार हो सकता है, जिससे GLOF और फ्लैश फ्लड का खतरा बढ़ सकता है।
हिमालय में आपदाओं का बोझ ज्यादा
हिमालयी क्षेत्र भारत के कुल भूभाग का करीब 18 प्रतिशत हिस्सा है, लेकिन नई रिपोर्ट के अनुसार देश की लगभग 35 प्रतिशत प्राकृतिक आपदाएं इसी क्षेत्र से जुड़ी रही हैं। पहाड़ी ढलान, भूस्खलन, अत्यधिक बारिश, अचानक बाढ़ और ग्लेशियल झीलों से जुड़ी घटनाएं यहां बुनियादी ढांचे को ज्यादा संवेदनशील बनाती हैं। बढ़ती जलवायु अनिश्चितता के बीच अनियोजित निर्माण और संवेदनशील इलाकों में बढ़ती मानवीय गतिविधियां नुकसान को और गंभीर बना सकती हैं। इसलिए वैज्ञानिक निगरानी के साथ विकास परियोजनाओं की जलवायु जोखिम के आधार पर योजना बनाना भी जरूरी होगा।
निगरानी की कमी बड़ी चुनौती
इतने बड़े खतरे के बावजूद ग्लेशियरों की जमीनी निगरानी सीमित है। नई रिपोर्ट के अनुसार हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में अनुमानित करीब 40 हजार ग्लेशियर हैं, लेकिन उनमें से सिर्फ 21 की नियमित जमीनी निगरानी होने की बात कही गई है। इतने विशाल क्षेत्र में सीमित मॉनिटरिंग भविष्य के जोखिम का सटीक आकलन करने में चुनौती पैदा करती है। विशेषज्ञ बेहतर सैटेलाइट मॉनिटरिंग, ग्लेशियरों की नियमित जमीनी निगरानी, ग्लेशियल झीलों के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम और संवेदनशील क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं। विकास योजनाओं में भी जलवायु जोखिम को प्राथमिकता देने की जरूरत बताई जा रही है।
भारत के लिए चेतावनी का समय
हिमालय को अक्सर भारत का ‘वाटर टावर’ कहा जाता है, लेकिन इसकी अहमियत पानी तक सीमित नहीं है। खेती, ऊर्जा, पर्यटन, उद्योग, शहरों की जल आपूर्ति और करोड़ों लोगों की आजीविका इससे जुड़ी हुई है। इसलिए हिमालयी पारिस्थितिकी में बड़े बदलाव का आर्थिक असर पूरे देश तक पहुंच सकता है।
सितंबर 2026 की रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि हिमालय की सुरक्षा को केवल पर्यावरण संरक्षण के नजरिए से नहीं बल्कि भारत की आर्थिक सुरक्षा के हिस्से के रूप में भी देखना होगा। ग्लेशियरों का नुकसान जारी रहा तो पहले बाढ़ और ग्लेशियल झीलों का जोखिम बढ़ सकता है और लंबे समय में जल उपलब्धता पर दबाव पैदा हो सकता है। भारत की 20 प्रतिशत से अधिक GDP को सहारा देने वाले हिमालयी तंत्र को सुरक्षित रखने के लिए उत्सर्जन में कमी के साथ वैज्ञानिक निगरानी, जल प्रबंधन, सुरक्षित बुनियादी ढांचा और आपदा पूर्व चेतावनी व्यवस्था पर तेजी से काम करना जरूरी होगा।
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