नई दिल्ली। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने मंगलवार को भारत में हाथियों की आबादी को लेकर चिंता जताई। उन्होंने हालिया आकलन का हवाला देते हुए कहा कि हाथियों की संख्या में दर्ज गिरावट सरकार के लिए एक गंभीर चेतावनी है। चिदंबरम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस मुद्दे को उठाते हुए वन्यजीव और उनके प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा पर अधिक ध्यान देने की जरूरत बताई।चिदंबरम ने एक मीडिया रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए लिखा, **"'9 साल में 18% कम हाथी' सरकार के लिए एक चेतावनी है।"** उनका बयान देश में एशियाई हाथियों की आबादी के आकलन और संरक्षण नीति को लेकर जारी चर्चा के बीच आया है।
WII ने अपनाई नई वैज्ञानिक पद्धति
Wildlife Institute of India (WII) ने 2021-2025 के दौरान देश में पहली बार DNA आधारित तरीके से एशियाई हाथियों की अखिल भारतीय आबादी का आकलन किया। यह अध्ययन Project Elephant और केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत किया गया। इसमें नॉन-इनवेसिव जेनेटिक सैंपलिंग और Spatial Capture-Recapture मॉडलिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया।WII के मुताबिक नई पद्धति का उद्देश्य हाथियों की संख्या का अधिक वैज्ञानिक और मानकीकृत आकलन करना है, जिससे अलग-अलग हाथी परिदृश्यों में संरक्षण और प्रबंधन की बेहतर योजना बनाई जा सके।यही वजह है कि पुराने और नए आंकड़ों की सीधी तुलना करते समय गणना की पद्धति में हुए बदलाव को ध्यान में रखना जरूरी है।
2017 में थे करीब 30 हजार हाथी
केंद्र सरकार द्वारा संसद में दिए गए आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2017 की गणना में देश में **29,964 हाथी** दर्ज किए गए थे। इससे पहले 2012 में इनकी अनुमानित संख्या 29,391 से 30,711 के बीच और 2007 में 27,669 से 27,719 के बीच थी।चिदंबरम ने जिस रिपोर्ट का हवाला दिया है, उसमें नए आकलन और 2017 के आंकड़ों के बीच करीब 18 प्रतिशत की कमी का उल्लेख किया गया है। हालांकि नई गणना में DNA आधारित पद्धति अपनाई गई है, इसलिए आंकड़ों की तुलना में कार्यप्रणाली का अंतर भी महत्वपूर्ण है।
हाथियों के आवास पर बढ़ रहा दबाव
WII के अनुसार भारत में दुनिया के एशियाई हाथियों की आबादी का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा पाया जाता है। हाथियों की बड़ी आबादी देश के अलग-अलग एलिफेंट रिजर्व और प्राकृतिक परिदृश्यों में फैली हुई है।संस्थान का कहना है कि मानव बस्तियों और कृषि क्षेत्र के विस्तार ने कई इलाकों में हाथियों के प्राकृतिक आवास पर दबाव बढ़ाया है। जंगलों का विखंडन, भोजन की उपलब्धता में कमी और अलग-अलग आवासों के बीच संपर्क प्रभावित होना संरक्षण की बड़ी चुनौतियों में शामिल है।हाथियों को भोजन और पानी की तलाश में लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। उनके पारंपरिक रास्तों में सड़क, रेलवे, बस्तियां या दूसरी परियोजनाएं आने पर मानव-हाथी संघर्ष का खतरा भी बढ़ सकता है।
मानव-हाथी संघर्ष भी बड़ी चुनौती
WII ने अगस्त 2026 में मानव-हाथी संघर्ष को लेकर कई तकनीकी रिपोर्ट जारी की थीं। इनमें कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में लंबे समय के रुझानों का अध्ययन किया गया।रिपोर्ट के अनुसार मानव बस्तियों का विस्तार, कृषि, सड़क और रेलवे जैसी बुनियादी ढांचा परियोजनाएं तथा हाथियों के आवास का विखंडन कई क्षेत्रों में संघर्ष को बढ़ाने वाले प्रमुख कारक हैं।अध्ययन में यह भी पाया गया कि मानव-हाथी संघर्ष सभी क्षेत्रों में एक जैसा नहीं है। कुछ खास इलाकों में यह अधिक केंद्रित है। इसलिए ऐसे हॉटस्पॉट की पहचान कर स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार समाधान तैयार करने पर जोर दिया गया है।
हाथियों के कॉरिडोर बचाना जरूरी
हाथियों के संरक्षण में कॉरिडोर की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ये वे प्राकृतिक रास्ते हैं जिनसे हाथियों के झुंड एक जंगल से दूसरे जंगल या एक आवास से दूसरे आवास तक पहुंचते हैं।WII के अनुसार 2023 तक देश में हाथियों के आवागमन से जुड़े करीब **150 कॉरिडोर** दर्ज किए गए थे। संस्थान के मुताबिक हाथियों की आबादी विभिन्न रिजर्व और 11 प्रमुख एलिफेंट लैंडस्केप में फैली हुई है।अगर इन रास्तों में निर्माण, सड़क, रेल लाइन या बस्तियों का दबाव बढ़ता है तो हाथियों का प्राकृतिक आवागमन प्रभावित हो सकता है। इससे वे आबादी वाले क्षेत्रों में प्रवेश कर सकते हैं और मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ने का खतरा रहता है।
प्रोजेक्ट एलिफेंट के तहत चल रहा संरक्षण
केंद्र सरकार ने हाथियों और उनके प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा के लिए 1991-92 में **Project Elephant** शुरू किया था। इसके तहत हाथी पाए जाने वाले राज्यों को वित्तीय और तकनीकी सहायता दी जाती है।इस परियोजना का उद्देश्य हाथियों, उनके आवास और कॉरिडोर की सुरक्षा के साथ मानव-हाथी संघर्ष को कम करना और कैद में मौजूद हाथियों के कल्याण पर काम करना है।WII में स्थापित Elephant Cell भी Project Elephant को तकनीकी सहयोग देता है। यह हाथियों की आबादी और आवास पर शोध, डेटा संग्रह, प्रशिक्षण और वैज्ञानिक निगरानी से जुड़े कार्य करता है।
संरक्षण के साथ लोगों की सुरक्षा भी चुनौती
हाथियों के संरक्षण में एक बड़ी चुनौती जंगल के आसपास रहने वाले लोगों की सुरक्षा और आजीविका को सुरक्षित रखना भी है। कई क्षेत्रों में हाथी खेतों में प्रवेश कर फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं, जबकि कुछ मामलों में मानव और हाथी दोनों की जान जाती है।WII की 2026 की क्षेत्रीय कार्ययोजना में ऐसे संघर्ष वाले क्षेत्रों की पहचान, बेहतर शुरुआती चेतावनी प्रणाली, त्वरित प्रतिक्रिया व्यवस्था और सड़क-रेल जैसे बुनियादी ढांचे को वन्यजीवों के लिए सुरक्षित बनाने पर जोर दिया गया है।विशेषज्ञ संरक्षण रणनीतियों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण मानते हैं, क्योंकि हाथियों के कई आवास मानव आबादी वाले क्षेत्रों के आसपास मौजूद हैं।
चिदंबरम के बयान से राजनीतिक बहस
चिदंबरम ने हाथियों की आबादी में कथित 18 प्रतिशत गिरावट को सरकार के लिए 'वेक-अप कॉल' बताते हुए इसे राजनीतिक और पर्यावरणीय चर्चा का विषय बनाया है। यह कांग्रेस नेता की सरकार पर की गई टिप्पणी है।दूसरी ओर आधिकारिक वैज्ञानिक दस्तावेज यह स्पष्ट करते हैं कि नवीनतम अखिल भारतीय आकलन में पहली बार DNA आधारित पद्धति और आधुनिक सांख्यिकीय मॉडल का इस्तेमाल किया गया है। इसलिए 2017 के पुराने आकलन और नए अनुमान के बीच अंतर की व्याख्या करते समय गणना पद्धति को भी ध्यान में रखना जरूरी है।भारत एशियाई हाथियों की वैश्विक आबादी का एक बड़ा हिस्सा समेटे हुए है। ऐसे में हाथियों की संख्या के साथ उनके आवास, कॉरिडोर और मानव-हाथी संघर्ष की स्थिति पर लगातार वैज्ञानिक निगरानी संरक्षण नीति के लिए महत्वपूर्ण बनी हुई है।