नई दिल्ली। आयुर्वेद में लंबे समय से इस्तेमाल की जा रही औषधीय वनस्पति अश्वगंधा को लेकर एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अध्ययन सामने आया है। अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल 'फ्रंटियर्स इन मेडिसिन' में प्रकाशित एक बड़े मल्टीसेंटर क्लिनिकल अध्ययन में पाया गया है कि 24 सप्ताह तक प्रतिदिन निर्धारित मात्रा में मानकीकृत अश्वगंधा की जड़ का अर्क लेने वाले स्वस्थ वयस्कों में इसकी सहनशीलता प्लेसबो समूह के समान रही। अध्ययन के दौरान अश्वगंधा के सेवन के कारण लिवर या किडनी को नुकसान पहुंचने का कोई प्रमाण नहीं मिला। हालांकि, शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि इसके सभी संभावित स्वास्थ्य लाभों की पुष्टि के लिए आगे और वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक हैं।
आयुष मंत्रालय के अनुसार, यह शोध 20 अगस्त 2026 को अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल 'फ्रंटियर्स इन मेडिसिन' में प्रकाशित हुआ था। अध्ययन का शीर्षक 'कोविशील्ड टीकाकरण के बाद 24 सप्ताह तक अश्वगंधा के लंबे समय तक निवारक उपयोग की सुरक्षा और सहनशीलता' था। यह एक मल्टीसेंटर, रैंडमाइज्ड, डबल-ब्लाइंड और प्लेसबो-कंट्रोल्ड क्लिनिकल ट्रायल था। इस प्रकार के अध्ययन में प्रतिभागियों को अलग-अलग समूहों में बांटकर किसी पदार्थ के प्रभाव और सुरक्षा का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाता है।
इस महत्वपूर्ण शोध में देश के नौ संस्थानों से जुड़े 45 शोधकर्ताओं ने हिस्सा लिया। इनमें केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS), अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान, राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान जयपुर, आयुष सेंटर ऑफ एक्सीलेंस, ट्रांसलेशनल हेल्थ साइंस एंड टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट और सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय से जुड़े शोध संस्थान शामिल थे। शोधकर्ताओं की टीम में आयुर्वेद, क्लिनिकल मेडिसिन, रूमेटोलॉजी और स्वास्थ्य विज्ञान के विशेषज्ञ शामिल रहे।
अध्ययन में 18 से 70 वर्ष की आयु के कुल 1,200 स्वस्थ वयस्कों को शामिल किया गया। इन सभी प्रतिभागियों को कोविशील्ड वैक्सीन की पहली, दूसरी या बूस्टर खुराक लग चुकी थी। शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों को दो समूहों में बांटा। एक समूह को प्रतिदिन 500 मिलीग्राम मानकीकृत अश्वगंधा की जड़ का जलीय अर्क दिया गया, जबकि दूसरे समूह को उसी के समान दिखने वाला प्लेसबो दिया गया।
अध्ययन में इस्तेमाल किया गया 500 मिलीग्राम अश्वगंधा अर्क लगभग चार ग्राम कच्ची जड़ के पाउडर के बराबर था। प्रतिभागियों को लगातार 24 सप्ताह तक निर्धारित पदार्थ दिया गया और 28वें सप्ताह तक उनके स्वास्थ्य की निगरानी की गई। इस दौरान नियमित अंतराल पर चिकित्सकीय परीक्षण, प्रयोगशाला जांच और प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़े परीक्षण किए गए।
अध्ययन में शामिल 1,200 प्रतिभागियों में से 1,032 लोगों ने परीक्षण पूरा किया। इस प्रकार अध्ययन पूरा करने वालों की संख्या लगभग 86 प्रतिशत रही। शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों के स्वास्थ्य, दवाओं की सहनशीलता, संभावित दुष्प्रभावों और प्रयोगशाला जांच के परिणामों का विश्लेषण किया।
शोध के परिणामों के अनुसार, अश्वगंधा लेने वाले प्रतिभागियों में सामने आए दुष्प्रभाव मुख्य रूप से हल्के और पाचन तंत्र से संबंधित थे। इन दुष्प्रभावों के कारण किसी प्रतिभागी को अध्ययन छोड़ना नहीं पड़ा। दोनों समूहों की तुलना में अश्वगंधा की सुरक्षा और सहनशीलता का स्तर लगभग समान पाया गया।
अध्ययन के दौरान कुल आठ गंभीर प्रतिकूल स्वास्थ्य घटनाएं दर्ज की गईं, लेकिन शोधकर्ताओं ने इनमें से किसी को भी अध्ययन में दिए गए अश्वगंधा या प्लेसबो उपचार से संबंधित नहीं माना। चिकित्सकीय जांच में लिवर और किडनी के कार्य से जुड़े प्रयोगशाला मानकों में भी अश्वगंधा के कारण नुकसान का कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला।
यह निष्कर्ष इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि लंबे समय तक किसी औषधीय उत्पाद का सेवन करने पर उसके संभावित दुष्प्रभावों का मूल्यांकन आवश्यक होता है। विशेष रूप से लिवर और किडनी शरीर में विभिन्न पदार्थों के प्रसंस्करण और उत्सर्जन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में लंबे समय तक उपयोग किए जाने वाले उत्पादों की सुरक्षा से जुड़ा वैज्ञानिक प्रमाण महत्वपूर्ण माना जाता है।
इस शोध का एक अन्य उद्देश्य यह जानना भी था कि कोविशील्ड टीकाकरण के बाद अश्वगंधा के सेवन से शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया में कोई अतिरिक्त लाभ मिलता है या नहीं। इसके लिए शोधकर्ताओं ने एंटीबॉडी और कोरोना संक्रमण से जुड़े विभिन्न संकेतकों का अध्ययन किया।
परिणामों में पहली वैक्सीन खुराक के बाद अश्वगंधा समूह में कुछ एंटीबॉडी स्तर अधिक पाए गए, लेकिन यह अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं था। शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि अश्वगंधा से अतिरिक्त प्रतिरक्षा लाभ मिलने का ठोस प्रमाण इस अध्ययन में स्थापित नहीं हो सका।
अध्ययन के दौरान प्रतिभागियों में टीकाकरण के बाद कोरोना संक्रमण की कुल दर लगभग 3.9 प्रतिशत दर्ज की गई। अश्वगंधा और प्लेसबो समूहों के बीच संक्रमण दर में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं पाया गया। इस कारण शोधकर्ताओं ने अश्वगंधा को कोरोना संक्रमण रोकने या वैक्सीन की प्रभावशीलता बढ़ाने वाला सिद्ध नहीं माना।
शोधकर्ताओं ने अध्ययन की कुछ सीमाओं का भी उल्लेख किया है। यह परीक्षण मुख्य रूप से अपेक्षाकृत स्वस्थ वयस्कों पर किया गया था। इसलिए इसके निष्कर्षों को गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों, कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले व्यक्तियों या अन्य विशेष स्वास्थ्य स्थितियों वाले मरीजों पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता।
इसके अलावा अध्ययन में अश्वगंधा की जड़ से तैयार एक विशेष मानकीकृत अर्क का इस्तेमाल किया गया था। बाजार में उपलब्ध सभी अश्वगंधा उत्पादों की संरचना, गुणवत्ता और मात्रा समान नहीं होती। इसलिए इस अध्ययन के परिणामों को प्रत्येक अश्वगंधा सप्लीमेंट की सुरक्षा का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।
आयुर्वेद में अश्वगंधा का उपयोग पारंपरिक रूप से विभिन्न स्वास्थ्य संबंधी उद्देश्यों के लिए किया जाता रहा है। हालांकि, किसी औषधीय वनस्पति के पारंपरिक उपयोग और उसके प्रभावों की वैज्ञानिक पुष्टि अलग-अलग विषय हैं। आधुनिक चिकित्सा अनुसंधान में किसी उत्पाद की सुरक्षा, उचित मात्रा और प्रभावशीलता को अलग-अलग जांचना आवश्यक होता है।
इस अध्ययन के निष्कर्ष अश्वगंधा के निर्धारित मात्रा में सीमित अवधि तक उपयोग की सुरक्षा संबंधी जानकारी में योगदान देते हैं। लेकिन शोधकर्ताओं ने यह भी कहा है कि प्रतिरक्षा प्रणाली पर इसके संभावित अतिरिक्त लाभों का मूल्यांकन करने के लिए और नियंत्रित क्लिनिकल अध्ययन आवश्यक होंगे।
विशेषज्ञों के लिए यह अध्ययन महत्वपूर्ण वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराता है, लेकिन इसे बिना चिकित्सकीय सलाह लंबे समय तक अश्वगंधा सेवन करने की सिफारिश नहीं माना जाना चाहिए। विशेष रूप से पहले से लिवर या किडनी की बीमारी वाले व्यक्तियों, गर्भवती महिलाओं और नियमित दवाएं लेने वाले लोगों को किसी भी हर्बल उत्पाद के सेवन से पहले चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।
कुल मिलाकर, 1,200 प्रतिभागियों पर किए गए इस अध्ययन ने निर्धारित मानकीकृत अश्वगंधा अर्क की 24 सप्ताह तक सुरक्षा और सहनशीलता के संबंध में सकारात्मक नतीजे प्रस्तुत किए हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट हुआ है कि अश्वगंधा से टीकाकरण के बाद अतिरिक्त प्रतिरक्षा लाभ मिलने की पुष्टि अभी नहीं हुई है। भविष्य के अध्ययन इसके संभावित लाभ और विभिन्न आबादी में सुरक्षा को और स्पष्ट कर सकेंगे।