नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों के लिए निर्धारित ऐतिहासिक जंतर-मंतर स्थल को अधिसूचित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाए जाने को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। आम आदमी पार्टी (AAP) के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने गुरुवार को इस फैसले पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप करने की अपील की। उन्होंने आरोप लगाया कि विरोध-प्रदर्शनों को लेकर पहले से जारी विवाद के बीच केंद्र सरकार ने रातों-रात जंतर-मंतर का दर्जा समाप्त कर दिया।भारद्वाज ने कहा कि यह मामला लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा हुआ है और इसकी गंभीरता को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय को जल्द से जल्द निर्णय लेना चाहिए।
सौरभ भारद्वाज ने केंद्र सरकार पर उठाए सवाल
गुरुवार को मीडिया से बातचीत करते हुए सौरभ भारद्वाज ने कहा कि जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन आयोजित करने को लेकर पहले से ही विवाद चल रहा था। इसी दौरान प्रदर्शन स्थल की अधिसूचना रद्द कर दी गई।उन्होंने कहा, "जंतर-मंतर पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों को लेकर पहले से ही काफी विवाद चल रहा था। इसी बीच, केंद्र सरकार ने रातों-रात जंतर-मंतर स्थित विरोध स्थल को डी-नोटिफाई कर दिया।"भारद्वाज ने आगे कहा कि स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट को मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए और जल्द फैसला सुनाना चाहिए।
12 अक्टूबर को हटाया गया जंतर-मंतर का दर्जा
दिल्ली पुलिस ने 12 अक्टूबर 2026 को जंतर-मंतर को अधिसूचित विरोध-प्रदर्शन स्थल की सूची से हटा दिया था। इसके स्थान पर दिल्ली में तीन अन्य स्थानों को विरोध-प्रदर्शनों के लिए निर्धारित किया गया।इनमें रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और पूर्वी दिल्ली का सीबीडी ग्राउंड शामिल हैं।दिल्ली पुलिस ने हाई कोर्ट में बताया कि सुप्रीम कोर्ट की 9 अक्टूबर की टिप्पणी के बाद वैकल्पिक प्रदर्शन स्थलों की पहचान की गई थी। हालांकि, बाद में केंद्र की ओर से सुप्रीम कोर्ट में कहा गया कि जंतर-मंतर का दर्जा हटाने का निर्णय अदालत की पिछली टिप्पणी के आधार पर नहीं लिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और दिल्ली पुलिस से मांगा जवाब
जंतर-मंतर को विरोध स्थल की सूची से हटाने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है।15 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर जवाब मांगा।मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि अदालत इस बात की जांच करेगी कि जंतर-मंतर का दर्जा समाप्त करने से पहले संबंधित अधिकारियों ने सभी आवश्यक पहलुओं पर उचित विचार किया था या नहीं।अदालत ने यह भी स्पष्ट करने को कहा कि क्या प्रदर्शन स्थल बदलने का निर्णय प्रशासनिक मूल्यांकन के आधार पर लिया गया था।
विरोध करने के अधिकार पर छिड़ी बहस
जंतर-मंतर लंबे समय से राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और नागरिक समूहों के विरोध-प्रदर्शनों का प्रमुख स्थान रहा है।इस स्थल की अधिसूचना रद्द किए जाने के बाद शांतिपूर्ण विरोध करने के संवैधानिक अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी पर बहस शुरू हो गई है।भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने का अधिकार देता है। हालांकि, सार्वजनिक व्यवस्था सहित निर्धारित आधारों पर इन अधिकारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।वर्तमान विवाद में यही सवाल महत्वपूर्ण बन गया है कि क्या प्रदर्शन स्थल बदलने का प्रशासनिक निर्णय संवैधानिक अधिकारों और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच उचित संतुलन बनाता है।
AAP ने जल्द निर्णय लेने की मांग की
सौरभ भारद्वाज ने कहा कि जंतर-मंतर का मामला केवल किसी एक राजनीतिक दल से संबंधित नहीं है, बल्कि विरोध करने के लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़ा हैउन्होंने सुप्रीम कोर्ट से जल्द सुनवाई और निर्णय की मांग करते हुए कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक है।वहीं, केंद्र और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी होने के बाद यह मामला न्यायिक विचाराधीन है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर का पुराना दर्जा बहाल करने का अंतिम आदेश नहीं दिया है।अब केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस के जवाब तथा अगली सुनवाई पर नजर बनी हुई है।
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