New Delhi नई दिल्ली : मॉनसून सत्र शुरू होने से पहले महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) और तृणमूल कांग्रेस (TMC) में हुई टूट को लेकर महत्वपूर्ण फैसले लिए हैं। स्पीकर ने शिवसेना UBT के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे गुट वाली शिवसेना में विलय को मंजूरी दे दी है। वहीं, तृणमूल कांग्रेस से अलग होकर नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी इंडिया (NCPI) में विलय करने वाले 20 सांसदों को लोकसभा में अलग बैठने की अनुमति भी दे दी गई है। इसके साथ ही NCPI को लोकसभा में अलग समूह का दर्जा प्रदान किया गया है।
लोकसभा स्पीकर के इस फैसले को उद्धव ठाकरे और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। दोनों ही नेताओं की पार्टियों में पिछले कुछ समय से लगातार अंदरूनी कलह और टूट की स्थिति बनी हुई थी। अब संसद में भी अलग समूहों को मान्यता मिलने से उनकी राजनीतिक चुनौतियां और बढ़ सकती हैं।
शिवसेना UBT में यह दूसरी बड़ी टूट है। इससे पहले भी एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना में बड़ी बगावत हुई थी, जिसके बाद पार्टी के अधिकांश विधायक और सांसद शिंदे गुट के साथ चले गए थे। इसके बाद महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा बदलाव आया और शिंदे गुट ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई थी।
हाल ही में उद्धव ठाकरे के लिए एक और मुश्किल तब खड़ी हुई, जब उनकी पार्टी के छह लोकसभा सांसदों ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय करने का फैसला लिया। इन सांसदों की संख्या पार्टी के कुल लोकसभा सांसदों की दो-तिहाई संख्या बताई जा रही है। इसके बाद शिंदे गुट ने लोकसभा में अलग पहचान की मांग की थी।
दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी तृणमूल कांग्रेस के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया है। पार्टी के 20 लोकसभा सांसदों ने काकोली घोष के नेतृत्व में टीएमसी से अलग होकर NCPI में विलय करने का निर्णय लिया। इन सांसदों ने लोकसभा स्पीकर से संसद में अलग बैठने की अनुमति मांगी थी, जिसे अब मंजूरी मिल गई है।
सूत्रों के अनुसार, टीएमसी में भी लगातार नेताओं के पार्टी छोड़ने का सिलसिला जारी है। विधानसभा और लोकसभा स्तर पर कई नेताओं ने बागी रुख अपनाया है। इसके अलावा पार्टी के कुछ राज्यसभा सांसदों के इस्तीफे से भी ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ी हैं।
हालांकि, शिवसेना UBT और टीएमसी दोनों ने लोकसभा स्पीकर से इन दावों को स्वीकार नहीं करने की अपील की थी। शिवसेना UBT के लोकसभा नेता अरविंद सावंत ने स्पीकर को पत्र लिखकर कहा था कि पार्टी की आधिकारिक मंजूरी के बिना किसी सांसद समूह को अलग गुट या किसी अन्य दल में विलय की मान्यता नहीं दी जानी चाहिए।
अरविंद सावंत ने अपने पत्र में दल-बदल कानून और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा था कि केवल सांसदों की संख्या के आधार पर किसी गुट को मान्यता नहीं दी जा सकती। उन्होंने मांग की थी कि जब तक पार्टी की ओर से आधिकारिक अनुमति न हो, तब तक किसी भी विलय या अलग समूह के दावे पर विचार न किया जाए।
अब लोकसभा स्पीकर के फैसले के बाद संसद में शिवसेना शिंदे गुट और NCPI को अलग पहचान मिल गई है। मॉनसून सत्र से पहले हुए इस घटनाक्रम ने महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। आने वाले दिनों में इसका असर दोनों राज्यों की राजनीतिक रणनीति और विपक्षी दलों की एकजुटता पर देखने को मिल सकता है।