नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े सैन्य तनाव का असर अब वैश्विक हवाई यात्रा पर साफ दिखाई देने लगा है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और इसके कारण बदले गए हवाई मार्गों ने भारतीय विमानन कंपनियों को भी प्रभावित किया है। एअर इंडिया ग्रुप की अंतरराष्ट्रीय यात्री संख्या में करीब 35 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है, जबकि इंडिगो की अंतरराष्ट्रीय यात्री संख्या भी लगभग 15.4 फीसदी कम हुई है।

रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण कई अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को अपने तय रास्तों में बदलाव करना पड़ा। पश्चिम एशिया का हवाई क्षेत्र कई एयरलाइंस के लिए चुनौतीपूर्ण बन गया, जिसके चलते यात्रियों ने भी अपनी यात्रा योजनाओं को टालना शुरू कर दिया। इसका सीधा असर उन भारतीय एयरलाइंस पर पड़ा, जिनकी बड़ी संख्या में उड़ानें यूरोप, अमेरिका और खाड़ी देशों के रूट पर संचालित होती हैं।
एअर इंडिया ग्रुप को इस संकट का सबसे ज्यादा असर झेलना पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय मार्गों पर यात्रियों की संख्या में 35 फीसदी की कमी आने से कंपनी की क्षमता उपयोग और राजस्व पर दबाव बढ़ा है। वहीं, देश की सबसे बड़ी एयरलाइन कंपनियों में शामिल इंडिगो भी इस भू-राजनीतिक तनाव से अछूती नहीं रही और उसके अंतरराष्ट्रीय यात्री आंकड़ों में 15.4 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई।
विमानन विशेषज्ञों के मुताबिक, युद्ध जैसे हालात में यात्रियों की पहली प्राथमिकता सुरक्षा होती है। ऐसे में लोग उन मार्गों से यात्रा करने से बचते हैं जहां संघर्ष या हवाई क्षेत्र बंद होने का खतरा रहता है। इसके अलावा उड़ानों के लंबे रूट, ईंधन खर्च में बढ़ोतरी और संचालन संबंधी परेशानियां भी एयरलाइंस के लिए अतिरिक्त चुनौती बन जाती हैं।
पश्चिम एशिया क्षेत्र भारतीय विमानन के लिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय यात्री खाड़ी देशों, यूरोप और अमेरिका की यात्रा के लिए इन रूटों का इस्तेमाल करते हैं। संघर्ष बढ़ने की स्थिति में उड़ानों की संख्या घटाना, वैकल्पिक रास्तों का इस्तेमाल करना और समय में बदलाव करना एयरलाइंस की मजबूरी बन जाती है।
एअर इंडिया पहले भी पश्चिम एशिया में तनाव के दौरान यात्रियों की सुविधा के लिए अतिरिक्त उड़ानों का संचालन कर चुकी है। कंपनी ने प्रभावित यात्रियों के लिए वैकल्पिक यात्रा व्यवस्था और अतिरिक्त सेवाएं उपलब्ध कराने की पहल की थी। इंडिगो के लिए भी अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क पर दबाव बढ़ा है। कंपनी की बड़ी हिस्सेदारी अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में विस्तार पर आधारित है, ऐसे में लंबे समय तक जारी रहने वाला भू-राजनीतिक संकट उसकी योजनाओं को प्रभावित कर सकता है।
इसके अलावा, युद्ध की वजह से विमान ईंधन की कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है। ईंधन विमानन कंपनियों के सबसे बड़े खर्चों में शामिल है और कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर टिकट किराए और संचालन लागत पर पड़ता है। हालांकि विमानन कंपनियां स्थिति सामान्य होने की उम्मीद कर रही हैं। एयरलाइंस लगातार सुरक्षा मानकों की समीक्षा कर रही हैं और यात्रियों की सुविधा के लिए वैकल्पिक मार्गों का इस्तेमाल कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव जल्द कम होता है तो अंतरराष्ट्रीय हवाई यातायात धीरे-धीरे सामान्य हो सकता है।
फिलहाल अमेरिका-ईरान संघर्ष ने भारतीय विमानन क्षेत्र के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। यात्रियों की संख्या में गिरावट, बढ़ती लागत और मार्गों में बदलाव के कारण एयरलाइंस को अपनी रणनीति में लगातार बदलाव करना पड़ रहा है।
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