नई दिल्ली: देश की राजधानी दिल्ली में आग की कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिनकी याद आज भी पीड़ित परिवारों को झकझोर देती है। कहीं फिल्म देखने गए लोग घर नहीं लौटे, कहीं रोजी कमाने आए मजदूर नींद में दम तोड़ गए। अस्पताल में भर्ती नवजात भी आग और धुएं से सुरक्षित नहीं रह सके। होटल, सिनेमाघर, औद्योगिक इकाइयों और झुग्गियों में हुए इन हादसों ने अलग-अलग समय पर अग्नि सुरक्षा तथा आपातकालीन निकासी की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए। दिल्ली के दस प्रमुख अग्निकांड राजधानी के इसी दर्दनाक इतिहास को सामने लाते हैं।
23 जनवरी 1986 को वसंत विहार स्थित सिद्धार्थ कॉन्टिनेंटल होटल में लगी आग राजधानी की बड़ी त्रासदियों में शामिल है। होटल में मौजूद मेहमान और कर्मचारी आग तथा धुएं की चपेट में आ गए। लोकसभा में दिए गए सरकारी जवाब के अनुसार, इस हादसे में 37 लोगों की मौत हुई थी। घटना के बाद जांच आयोग गठित किया गया और होटल प्रबंधन के खिलाफ आपराधिक मामला अदालत में दाखिल हुआ। इस अग्निकांड ने बड़े होटलों में भी सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर किया। 
13 जून 1997 को ग्रीन पार्क स्थित उपहार सिनेमा में फिल्म ‘बॉर्डर’ का प्रदर्शन चल रहा था। इसी दौरान लगी आग और भीतर फैले धुएं ने दर्शकों को अपनी चपेट में ले लिया। हादसे में 59 लोगों की जान गई और सौ से अधिक घायल हुए। सुरक्षित निकासी की व्यवस्था में कमियां इस त्रासदी का महत्वपूर्ण पहलू रहीं। मनोरंजन के लिए सिनेमाघर पहुंचे परिवारों की जिंदगी कुछ ही देर में बदल गई। उपहार अग्निकांड सार्वजनिक इमारतों में सुरक्षा की अनदेखी का सबसे दर्दनाक उदाहरणों में गिना जाता है। 
31 मई 1999 को पुरानी दिल्ली के लाल कुआं इलाके में एक ट्रांसपोर्ट कंपनी के गोदाम में भीषण आग लगी। वहां रखे रसायनों के कारण घटना बेहद विनाशकारी साबित हुई। मामले से संबंधित दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले में 57 लोगों की मौत और 27 लोगों के झुलसने का उल्लेख है। घनी आबादी के बीच खतरनाक सामग्री के भंडारण ने आसपास रहने वालों को भी जोखिम में डाल दिया। इस हादसे ने रिहायशी क्षेत्रों में गोदामों और ज्वलनशील पदार्थों की निगरानी का सवाल उठाया।
20 नवंबर 2011 को पूर्वी दिल्ली के नंद नगरी में एक सामुदायिक आयोजन के दौरान पंडाल में आग लग गई। इस घटना में 14 लोगों की मौत हुई और 30 से अधिक घायल हुए। कार्यक्रम में जुटे लोगों के बीच आग फैलने से अफरातफरी मच गई। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान के प्रकाशन में भी इस त्रासदी का उल्लेख है। इसने अस्थायी पंडालों में आयोजन के समय सुरक्षित निकास और आग से बचाव की तैयारी का महत्व सामने रखा।
20 जनवरी 2018 को बवाना औद्योगिक क्षेत्र की एक अवैध पटाखा भंडारण एवं पैकिंग इकाई में आग लगी। हादसे में 17 मजदूरों की जान चली गई। भीतर काम कर रहे लोगों के लिए आग और जहरीला धुआं घातक साबित हुआ। दमकल अधिकारियों के मुताबिक, परिसर में बड़े पैकेटों से पटाखे निकालकर छोटे पैकेटों में रखे जाते थे। इस घटना ने औद्योगिक परिसरों में गतिविधियों की निगरानी और श्रमिकों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए। 12 फरवरी 2019 की सुबह करोल बाग के अर्पित पैलेस होटल में लगी आग ने 17 लोगों की जिंदगी छीन ली। अधिकांश मेहमान उस समय सो रहे थे। अस्पताल के चिकित्सकों के अनुसार, कई मौतों में कार्बन मोनोऑक्साइड के कारण दम घुटना प्रमुख वजह था। घटना ने दिखाया कि इमारत के भीतर फैलता धुआं कितना जानलेवा हो सकता है। होटल में ठहरे यात्रियों की सुरक्षित निकासी और भवन संबंधी नियमों के पालन को लेकर भी सवाल उठे। 
8 दिसंबर 2019 को अनाज मंडी इलाके की एक इमारत में आग लगने से 43 लोगों की मौत हुई। परिसर में छोटी उत्पादन इकाइयां चल रही थीं और कई मजदूर वहीं सोते थे। तंग गलियों और इमारत के भीतर फैले धुएं ने स्थिति भयावह बना दी। मृतकों में दूसरे राज्यों से रोजगार की तलाश में आए श्रमिक शामिल थे। हादसे के बाद परिजन अपनों की तलाश में अस्पतालों के चक्कर लगाते रहे। 
मार्च 2022 में गोकुलपुरी की झुग्गियों में लगी आग ने सात लोगों की जान ले ली। मृतकों में तीन नाबालिग और एक गर्भवती महिला शामिल थीं। 11 और 12 मार्च की दरमियानी रात आग ने तेजी से कई झुग्गियों को घेर लिया। लोगों को नींद से उठकर संभलने का पर्याप्त समय नहीं मिला। दमकल की 13 गाड़ियों को आग नियंत्रित करने में चार घंटे से अधिक लगे। अनेक परिवारों का घरेलू सामान और आशियाना भी जल गया। 13 मई 2022 को मुंडका की एक व्यावसायिक इमारत में भीषण आग लगी। इस अग्निकांड में 27 लोगों की मौत हुई। इमारत में मौजूद लोगों के फंसने और सुरक्षित बाहर निकलने की कठिनाइयों ने बचाव कार्य चुनौतीपूर्ण बना दिया। घटना के बाद व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में अग्नि सुरक्षा नियमों के पालन और निकासी व्यवस्था की कमियों पर फिर बहस शुरू हुई। 
25 मई 2024 की रात विवेक विहार के बेबी केयर न्यू बॉर्न अस्पताल में लगी आग ने नवजातों के परिवारों को असहनीय दुख दिया। शुरुआती स्पष्टीकरण में आग से छह बच्चों की मौत बताई गई थी; एक अन्य बच्चा घटना से पहले दम तोड़ चुका था। बाद में बचाई गई एक बच्ची की भी मृत्यु हुई, जिससे आग से जुड़े मृतकों की संख्या सात हो गई। दमकल विभाग के अनुसार, अस्पताल में अग्निशमन अनापत्ति प्रमाणपत्र और पर्याप्त अग्नि सुरक्षा इंतजाम नहीं थे। यह हादसा उपचार केंद्रों में सुरक्षा की अनिवार्यता की दर्दनाक याद बन गया।
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