नई दिल्ली। देश की प्रतिष्ठित केंद्रीय यूनिवर्सिटी जामिया मिल्लिया इस्लामिया में करीब दो दशक से बंद छात्र संघ चुनावों की बहाली को लेकर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। कई दिनों से चल रहे विरोध प्रदर्शन और भूख हड़ताल के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्र संघ चुनाव कराने पर सहमति जताई है। सोमवार, 26 अक्टूबर 2026 को जारी आदेश में प्रशासन ने छात्रों की तीन प्रमुख मांगों पर सकारात्मक निर्णय लिया है। हालांकि, इस समझौते में एक ऐसी शर्त भी शामिल है, जिसने नया विवाद खड़ा कर दिया है। विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ आंदोलन के दौरान दिए गए कथित मानहानिकारक बयानों और सोशल मीडिया पोस्ट के लिए छात्रों से सार्वजनिक माफी मांगने को कहा गया है। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारी छात्रों ने चुनाव की निश्चित तारीख नहीं मिलने और माफी की शर्त पर आपत्ति जताते हुए आंदोलन जारी रखने की बात कही है।
2006 के बाद से नहीं हुए छात्र संघ चुनाव
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में आखिरी छात्र संघ चुनाव वर्ष 2005 में आयोजित हुए थे। इसके बाद 31 मार्च 2006 को विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्र संघ को भंग कर दिया था।उस समय परिसर में हिंसक घटनाओं और शैक्षणिक गतिविधियों में व्यवधान को छात्र संघ भंग करने के कारणों में बताया गया था।इसके बाद लगभग 20 वर्षों तक विश्वविद्यालय में केंद्रीय स्तर पर निर्वाचित छात्र संघ बहाल नहीं हो सका।इस दौरान कई बार छात्रों ने चुनाव कराने की मांग उठाई। छात्रों का तर्क रहा है कि विश्वविद्यालय में उनकी समस्याओं को प्रभावी ढंग से उठाने के लिए एक निर्वाचित प्रतिनिधि संस्था जरूरी है।12 अक्टूबर से शुरू हुआ था आंदोलन
छात्र संघ चुनाव की बहाली को लेकर 12 अक्टूबर 2026 से छात्रों ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल और धरना शुरू किया था।आंदोलनकारी छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से चुनाव की स्पष्ट समयसीमा घोषित करने की मांग की।इसके अलावा प्रदर्शन के दौरान छात्रों के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई वापस लेने और सुरक्षा कर्मचारियों के कथित व्यवहार की जांच कराने की मांग भी उठाई गई।प्रदर्शन बढ़ने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र प्रतिनिधियों के बीच कई दौर की बातचीत हुई। इसके बावजूद लंबे समय तक कोई अंतिम सहमति नहीं बन सकी।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने मानीं तीन प्रमुख मांगें
सोमवार को कुलसचिव प्रोफेसर महताब आलम रिजवी की ओर से जारी आदेश में छात्रों की तीन प्रमुख मांगों पर निर्णय लिया गया।पहला फैसला छात्र संघ चुनाव से जुड़ा है। प्रशासन ने कहा कि छात्र संघ के संविधान को मंजूरी मिलने के 15 दिनों के भीतर चुनाव कराए जाएंगे।दूसरा फैसला प्रदर्शन के दौरान छात्रों को जारी निलंबन आदेश और कारण बताओ नोटिस वापस लेने का है।तीसरे फैसले के तहत आंदोलन के दौरान सुरक्षा कर्मचारियों के आचरण की जांच के लिए एक समिति गठित करने की बात कही गई है।इन फैसलों को छात्र संघ की बहाली की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
चुनाव कब होंगे? तारीख को लेकर बना संशय
विश्वविद्यालय प्रशासन ने चुनाव कराने की सहमति तो दे दी है, लेकिन अभी मतदान की निश्चित तारीख घोषित नहीं की गई है।आदेश के अनुसार, छात्र संघ का संविधान मंजूर होने के 15 दिनों के भीतर चुनाव आयोजित होंगे।इसका मतलब है कि पहले छात्र संघ के संविधान को अंतिम स्वीकृति मिलनी जरूरी है। इसके बाद ही चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।विश्वविद्यालय ने संविधान को मंजूरी देने की अंतिम तारीख स्पष्ट नहीं की है। यही कारण है कि प्रदर्शनकारी छात्र प्रशासन के आदेश से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं।छात्रों का कहना है कि बिना निश्चित समयसीमा के चुनाव कराने का आश्वासन पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
छात्रों को सार्वजनिक माफी मांगने की शर्त
समझौते का सबसे चर्चित पहलू सार्वजनिक माफी से जुड़ा है।विश्वविद्यालय प्रशासन के आदेश में कहा गया है कि आंदोलन के दौरान प्रशासन के खिलाफ दिए गए कथित मानहानिकारक बयानों, गतिविधियों और सोशल मीडिया पोस्ट के लिए प्रदर्शनकारी छात्र प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से सार्वजनिक माफी मांगेंगे।इसके अलावा संबंधित सोशल मीडिया पोस्ट हटाने की बात भी आदेश में दर्ज है।प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन शर्तों के पालन की निगरानी की जाएगी।हालांकि, कुछ प्रदर्शनकारी छात्रों ने माफी की शर्त का विरोध किया है। उनका कहना है कि वे अपने लोकतांत्रिक अधिकारों और छात्र प्रतिनिधित्व की मांग कर रहे हैं।
आदेश के बावजूद आंदोलन खत्म करने से इनकार
विश्वविद्यालय प्रशासन ने आदेश जारी होने के बाद छात्रों से आंदोलन समाप्त करने को कहा है।लेकिन प्रदर्शनकारी छात्रों के एक वर्ग ने साफ किया है कि उनकी सभी मांगें पूरी नहीं हुई हैं।छात्रों ने विशेष रूप से चुनाव की निश्चित समयसीमा और मुख्य प्रॉक्टर को हटाने की मांग का मुद्दा उठाया है।उनका कहना है कि प्रशासन के आदेश में छात्र संघ की बहाली की प्रक्रिया स्पष्ट नहीं है। इसलिए आंदोलन समाप्त करने से पहले ठोस आश्वासन जरूरी है।इससे साफ है कि प्रशासन और छात्रों के बीच बातचीत के बावजूद गतिरोध पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
संविधान तैयार करने के लिए बनाई गई समिति
विश्वविद्यालय प्रशासन ने 21 अक्टूबर को छात्र संघ का संविधान तैयार करने के लिए एक समिति गठित की थी।समिति को छात्र संघ भंग किए जाने की परिस्थितियों, संबंधित न्यायिक आदेशों और छात्र संघ चुनावों से जुड़ी लिंगदोह समिति की सिफारिशों का अध्ययन करने की जिम्मेदारी दी गई है।समिति को छात्रों सहित संबंधित पक्षों से चर्चा करके संविधान का मसौदा तैयार करना है।पहले जारी अधिसूचना के अनुसार, मसौदा प्रस्तुत करने की समयसीमा 20 दिसंबर निर्धारित की गई थी।हालांकि, मसौदा तैयार होना और संविधान को अंतिम मंजूरी मिलना अलग-अलग चरण हैं। इसलिए फिलहाल चुनाव की सटीक तारीख बताना संभव नहीं है।
प्रदर्शन के कारण ऑनलाइन हुई थीं कक्षाएं
छात्र संघ चुनाव को लेकर चल रहे आंदोलन का असर विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गतिविधियों पर भी पड़ा।परिसर में बढ़ते तनाव और सुरक्षा संबंधी परिस्थितियों को देखते हुए प्रशासन ने 24 अक्टूबर को अगले आदेश तक कक्षाएं ऑनलाइन संचालित करने का फैसला किया था।विश्वविद्यालय की कुछ पुस्तकालय सुविधाओं को भी अस्थायी रूप से बंद करने की घोषणा की गई थी।प्रशासन का कहना था कि छात्रों की सुरक्षा और पढ़ाई जारी रखने के उद्देश्य से यह कदम उठाया गया है।
छात्र संघ चुनाव क्यों हैं महत्वपूर्ण?
छात्र संघ विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की समस्याओं और मांगों को प्रशासन तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम होता है।इसके जरिए छात्र हॉस्टल, फीस, पुस्तकालय, परीक्षा व्यवस्था और अन्य शैक्षणिक सुविधाओं से जुड़े मुद्दे उठा सकते हैं।निर्वाचित छात्र संघ छात्रों को लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में भाग लेने और नेतृत्व विकसित करने का अवसर भी देता है।जामिया के छात्रों का मानना है कि विश्वविद्यालय स्तर पर निर्वाचित प्रतिनिधित्व बहाल होने से उनकी आवाज को अधिक मजबूती मिलेगी।
अब आगे क्या होगा?
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में करीब 20 वर्षों बाद छात्र संघ चुनाव की संभावनाएं मजबूत हुई हैं। लेकिन चुनाव की वास्तविक तारीख अभी छात्र संघ के संविधान की मंजूरी पर निर्भर है।विश्वविद्यालय प्रशासन ने निलंबन और कारण बताओ नोटिस वापस लेने तथा सुरक्षा कर्मचारियों के आचरण की जांच का आश्वासन दिया है। इसके बावजूद सार्वजनिक माफी की शर्त और चुनाव की समयसीमा को लेकर छात्रों की नाराजगी बनी हुई है।