नई दिल्ली: घर या फ्लैट खरीदने वालों के लिए इनकम टैक्स से जुड़ा एक अहम फैसला सामने आया है। इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) की सूरत बेंच ने स्पष्ट किया है कि किसी प्रॉपर्टी को लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) या शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन (STCG) के तहत रखने का फैसला करते समय केवल रजिस्ट्रेशन की तारीख को ही आधार नहीं बनाया जा सकता। कुछ परिस्थितियों में फ्लैट के अलॉटमेंट लेटर की तारीख से भी यह तय किया जा सकता है कि संपत्ति कितने समय तक करदाता के पास रही।
इस फैसले का महत्व उन लोगों के लिए अधिक है, जिन्होंने बिल्डर से फ्लैट बुक किया था, लेकिन निर्माण पूरा होने या अन्य औपचारिकताओं के कारण रजिस्ट्री बाद में कराई। ऐसे मामलों में अलॉटमेंट और रजिस्ट्रेशन के बीच लंबा अंतर हो सकता है। यदि होल्डिंग पीरियड की गणना केवल रजिस्ट्री की तारीख से की जाए, तो कुछ करदाताओं को प्रॉपर्टी बेचने पर शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन के नियमों का सामना करना पड़ सकता है। वहीं, लागू कानूनी शर्तें पूरी होने पर अलॉटमेंट की तारीख से अवधि गिनने पर संपत्ति लॉन्ग टर्म श्रेणी में आ सकती है।
क्या है ITAT का फैसला?
इनकम टैक्स कानून के तहत किसी संपत्ति को बेचने से होने वाले लाभ पर लगने वाला टैक्स इस बात पर निर्भर करता है कि संपत्ति कितने समय तक करदाता के पास रही। इस अवधि के आधार पर लाभ को लॉन्ग टर्म या शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन माना जा सकता है।
ITAT की सूरत बेंच के फैसले में इस बात पर जोर दिया गया है कि प्रॉपर्टी खरीदने की तारीख तय करने के लिए मामले की वास्तविक परिस्थितियों और उपलब्ध दस्तावेजों को देखना जरूरी है। यदि फ्लैट के अलॉटमेंट से करदाता के पक्ष में संपत्ति संबंधी अधिकार स्थापित हो गए थे, तो संबंधित मामले में अलॉटमेंट लेटर की तारीख महत्वपूर्ण हो सकती है।
इसका मतलब यह नहीं है कि हर प्रॉपर्टी के मामले में अलॉटमेंट लेटर की तारीख ही अंतिम मानी जाएगी। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अलॉटमेंट किस प्रकार हुआ, करदाता को किस समय अधिकार प्राप्त हुए और संबंधित दस्तावेज क्या दर्शाते हैं। इसलिए किसी भी मामले में फैसला लेने से पहले उसके तथ्यों और लागू कानून की जांच जरूरी है।
अलॉटमेंट और रजिस्ट्री की तारीख में क्या अंतर है?
जब कोई व्यक्ति बिल्डर से निर्माणाधीन फ्लैट खरीदता है, तो शुरुआती चरण में उसे अलॉटमेंट लेटर दिया जा सकता है। इस दस्तावेज में फ्लैट का विवरण, कीमत, भुगतान की शर्तें और खरीदार को आवंटित इकाई से जुड़ी जानकारी होती है। इसके बाद निर्माण, भुगतान, कब्जा देने और रजिस्ट्रेशन जैसी प्रक्रियाएं पूरी की जाती हैं।
कई बार फ्लैट का अलॉटमेंट वर्षों पहले हो जाता है, लेकिन रजिस्ट्री काफी बाद में होती है। यदि इन दोनों तारीखों के बीच पर्याप्त अंतर है, तो टैक्स की गणना में यह अंतर महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को 2021 में फ्लैट का अलॉटमेंट मिला और उसने 2025 में उसकी रजिस्ट्री कराई। यदि वह 2026 में फ्लैट बेचता है, तो केवल रजिस्ट्री की तारीख को आधार मानने और अलॉटमेंट की तारीख को स्वीकार करने से होल्डिंग पीरियड की गणना अलग-अलग हो सकती है। हालांकि, यह केवल समझाने के लिए दिया गया उदाहरण है। वास्तविक मामले में संपत्ति के अधिकार प्राप्त होने की तारीख और लागू कानूनी नियमों के आधार पर ही निर्णय होगा।
LTCG और STCG में क्या फर्क है?
कैपिटल गेन का मतलब किसी पूंजीगत संपत्ति को बेचने से होने वाला लाभ है। प्रॉपर्टी बेचने पर यह लाभ लॉन्ग टर्म या शॉर्ट टर्म श्रेणी में आ सकता है। दोनों के लिए लागू टैक्स नियम अलग हो सकते हैं।
सामान्य तौर पर, 23 जुलाई 2024 या उसके बाद किए गए हस्तांतरण के लिए अचल संपत्ति को लॉन्ग टर्म कैपिटल एसेट मानने की अवधि 24 महीने है। यदि संपत्ति निर्धारित अवधि से अधिक समय तक रखी गई है, तो अन्य शर्तें पूरी होने पर उससे होने वाला लाभ LTCG माना जा सकता है। अवधि पूरी नहीं होने पर लाभ STCG की श्रेणी में आ सकता है।
लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन के मामलों में टैक्स की गणना और लागू दरें संपत्ति खरीदने तथा बेचने की तारीख, करदाता की स्थिति और संबंधित प्रावधानों पर निर्भर करती हैं। इसलिए केवल LTCG का दर्जा मिल जाने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि किसी भी व्यक्ति को एक समान टैक्स दर या छूट मिलेगी।
फ्लैट बेचने वालों को क्या फायदा हो सकता है?
इस फैसले से उन संपत्ति मालिकों को मदद मिल सकती है, जिनके पास अलॉटमेंट लेटर मौजूद है और जिनके फ्लैट की रजिस्ट्री बाद में हुई थी। यदि उनके मामले में अलॉटमेंट की तारीख से होल्डिंग पीरियड की गणना स्वीकार की जाती है, तो संपत्ति को लॉन्ग टर्म श्रेणी में रखने का आधार बन सकता है।
हालांकि, करदाता को यह साबित करने के लिए दस्तावेज सुरक्षित रखने चाहिए कि अलॉटमेंट कब हुआ था और उस समय कौन-से अधिकार प्राप्त हुए थे। अलॉटमेंट लेटर, भुगतान की रसीदें, बिल्डर के साथ हुआ समझौता, कब्जे से संबंधित दस्तावेज और रजिस्ट्री के कागजात इस प्रक्रिया में उपयोगी हो सकते हैं।
प्रॉपर्टी मालिक क्या करें?
यदि आपने फ्लैट खरीदने के कई साल बाद उसकी रजिस्ट्री कराई है और अब उसे बेचने की योजना बना रहे हैं, तो टैक्स की गणना करने से पहले सभी तारीखों और दस्तावेजों की समीक्षा कराएं। केवल रजिस्ट्री की तारीख देखकर यह मान लेना सही नहीं होगा कि संपत्ति शॉर्ट टर्म या लॉन्ग टर्म श्रेणी में आती है।
ध्यान रखें कि ITAT का फैसला संबंधित मामले के तथ्यों और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर समझा जाना चाहिए। हर खरीदार को इसका स्वतः लाभ मिलेगा, ऐसा मानना उचित नहीं है। अपनी स्थिति के अनुसार चार्टर्ड अकाउंटेंट या टैक्स विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर रहेगा।
कुल मिलाकर, यह फैसला प्रॉपर्टी खरीदने और बेचने वालों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि पूंजीगत लाभ की अवधि तय करने में केवल रजिस्ट्री ही नहीं, बल्कि अलॉटमेंट और संपत्ति से जुड़े अधिकारों की प्रकृति भी अहम हो सकती है।
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