नई दिल्ली। भारत की आर्थिक वृद्धि दर को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही यानी अप्रैल-जून 2026 में देश की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर **7.8 प्रतिशत** दर्ज की गई है। हालांकि पूर्व वित्त सचिव **सुभाष चंद्र गर्ग** ने इस आंकड़े पर सवाल उठाते हुए दावा किया कि अगर पिछले साल की जीडीपी के आंकड़े को 86 लाख करोड़ रुपये से घटाकर करीब 80 लाख करोड़ रुपये नहीं किया गया होता तो मौजूदा कीमतों पर वृद्धि सिर्फ **2.6 प्रतिशत** होती। केंद्र सरकार और सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा है कि ऐसी गणना में पुरानी और नई जीडीपी सीरीज के आंकड़ों को मिला दिया गया है, इसलिए इससे निकला निष्कर्ष सांख्यिकीय रूप से सही नहीं है।
सरकार ने स्पष्ट किया कि वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के आंकड़े **2022-23 आधार वर्ष वाली नई जीडीपी सीरीज** के आधार पर तैयार किए गए हैं। ऐसे में उनकी तुलना 2011-12 आधार वर्ष वाली पुरानी सीरीज के आंकड़ों से सीधे नहीं की जा सकती।
कैसे शुरू हुआ 2.6 प्रतिशत जीडीपी का विवाद?
विवाद की शुरुआत पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग की ओर से जीडीपी आंकड़ों पर सवाल उठाए जाने के बाद हुई।
गर्ग ने कहा कि अप्रैल-जून 2025 में मौजूदा कीमतों पर जीडीपी का आंकड़ा पहले करीब **86.05 लाख करोड़ रुपये** था। नई सीरीज में इसे करीब 80 लाख करोड़ रुपये दिखाया गया।
उनका तर्क था कि अगर पुराने 86.05 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े को आधार माना जाए और उसकी तुलना अप्रैल-जून 2026 के करीब 88.27 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े से की जाए तो वृद्धि लगभग **2.6 प्रतिशत** निकलती है।
इसके बाद विपक्षी कांग्रेस ने भी इस दावे को उठाया और सरकार पर जीडीपी आंकड़ों में बदलाव कर आर्थिक वृद्धि को ज्यादा दिखाने का आरोप लगाया।
सरकार ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है।
केंद्र ने कहा- दो अलग सीरीज की तुलना गलत
केंद्र सरकार की तरफ से कहा गया कि 2.6 प्रतिशत की गणना में सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसमें दो अलग-अलग जीडीपी सीरीज के आंकड़े इस्तेमाल किए गए हैं।
**86.05 लाख करोड़ रुपये** का आंकड़ा 2011-12 को आधार वर्ष मानने वाली पुरानी जीडीपी सीरीज का था।
वहीं अप्रैल-जून 2026 के लिए इस्तेमाल किया जा रहा आंकड़ा **2022-23 को आधार वर्ष मानने वाली नई सीरीज** का है।
सरकारी सूत्रों ने इसे सांख्यिकीय रूप से अर्थहीन बताते हुए कहा कि नई सीरीज के numerator यानी मौजूदा वर्ष के आंकड़े की तुलना पुरानी सीरीज के denominator यानी पिछले वर्ष के आंकड़े से नहीं की जा सकती।
सही तुलना के लिए दोनों वर्षों के आंकड़े एक ही पद्धति और एक ही सीरीज के होने चाहिए।
नई सीरीज में पिछले साल की GDP कितनी?
फरवरी 2026 में MoSPI ने भारत की जीडीपी गणना के लिए नई सीरीज जारी की थी। इसमें आधार वर्ष **2011-12 से बदलकर 2022-23** कर दिया गया।
नई सीरीज लागू होने के बाद अप्रैल-जून 2025 की मौजूदा कीमतों वाली जीडीपी को करीब **80.32 लाख करोड़ रुपये** आंका गया।
इसके बाद जून 2026 में उपलब्ध नए संकेतकों और आंकड़ों के आधार पर इसे संशोधित कर करीब **80.44 लाख करोड़ रुपये** किया गया।
सरकार का कहना है कि यह बदलाव मौजूदा वर्ष की वृद्धि दर ज्यादा दिखाने के उद्देश्य से नहीं किया गया, बल्कि नई जीडीपी सीरीज के तहत डेटा स्रोतों, कवरेज और गणना पद्धति में बदलाव के कारण हुआ।
7.8 प्रतिशत कैसे निकली वृद्धि दर?
सरकार के मुताबिक अप्रैल-जून 2026 में वास्तविक यानी महंगाई के प्रभाव को हटाकर जीडीपी करीब **81.36 लाख करोड़ रुपये** रही।
पिछले वर्ष की समान अवधि में नई सीरीज के तहत वास्तविक जीडीपी करीब **75.46 लाख करोड़ रुपये** थी।
इन दोनों तुलनीय आंकड़ों के आधार पर वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर **7.8 प्रतिशत** निकलती है।
इसी तरह मौजूदा कीमतों यानी नॉमिनल जीडीपी की तुलना भी नई सीरीज के भीतर ही की जानी चाहिए।
नई सीरीज में नॉमिनल जीडीपी करीब 80 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर **88.27 लाख करोड़ रुपये** हुई है। इस आधार पर नॉमिनल वृद्धि करीब **10.3 प्रतिशत** है।
यही कारण है कि केंद्र का कहना है कि 2.6 प्रतिशत का आंकड़ा निकालने के लिए अपनाई गई तुलना उचित नहीं है।
MoSPI ने जारी किया विस्तृत जवाब
विवाद बढ़ने के बाद सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने 2 सितंबर को जीडीपी अनुमानों से जुड़े सवालों पर अतिरिक्त जानकारी जारी की।
मंत्रालय ने बताया कि 31 अगस्त 2026 को **2022-23 आधार वर्ष वाली अपडेटेड जीडीपी सीरीज** के वार्षिक और तिमाही अनुमान जारी किए गए थे।
इसमें नए **आउटपुट प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (PPI)**, बैंकिंग सर्विसेज प्राइस इंडेक्स और विभिन्न प्रशासनिक स्रोतों से प्राप्त अपडेटेड डेटा को शामिल किया गया है।
मंत्रालय ने डबल डिफ्लेशन, नॉमिनल और रियल जीडीपी के अंतर, GDP डिफ्लेटर और पुराने तथा नए आंकड़ों की तुलना जैसे सवालों पर भी स्पष्टीकरण दिया।
क्यों बदला गया आधार वर्ष?
जीडीपी के आधार वर्ष को समय-समय पर बदलना सामान्य सांख्यिकीय प्रक्रिया है।
अर्थव्यवस्था की संरचना वर्षों में बदलती रहती है। नए उद्योग विकसित होते हैं, उत्पादन के तरीके बदलते हैं, डिजिटल सेवाओं का विस्तार होता है और कंपनियों तथा परिवारों की आर्थिक गतिविधियों में बदलाव आता है।
इन्हीं परिवर्तनों को बेहतर तरीके से आंकड़ों में शामिल करने के लिए आधार वर्ष बदला जाता है।
फरवरी 2026 में सरकार ने पुरानी **2011-12 आधार वर्ष वाली सीरीज** की जगह 2022-23 को आधार वर्ष बनाते हुए नई जीडीपी सीरीज जारी की थी।
नई सीरीज में डेटा स्रोतों, कवरेज, क्षेत्रीय भार और अनुमान लगाने की पद्धतियों में भी बदलाव किए गए हैं।
इसी कारण पुरानी और नई सीरीज में किसी एक अवधि के कुल जीडीपी आंकड़े अलग हो सकते हैं।
सरकार ने समझाया बेंचमार्क-इंडिकेटर तरीका
MoSPI के मुताबिक तिमाही जीडीपी अनुमान तैयार करने के लिए **बेंचमार्क-इंडिकेटर पद्धति** का इस्तेमाल किया जाता है।
इसके तहत अर्थव्यवस्था के अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े बड़ी संख्या में हाई-फ्रीक्वेंसी संकेतकों को देखा जाता है।
इनमें फसल उत्पादन, सीमेंट उत्पादन, तैयार स्टील की खपत और कमर्शियल वाहनों की बिक्री जैसे कई संकेतक शामिल हैं। मंत्रालय ने कहा कि तिमाही अनुमानों में सौ से अधिक वॉल्यूम या वैल्यू इंडिकेटर्स इस्तेमाल किए जाते हैं।
इसलिए पिछले वर्ष के बेंचमार्क में बदलाव होने का अर्थ यह नहीं है कि मौजूदा वर्ष की वास्तविक आर्थिक गतिविधि अपने आप बढ़ जाती है।
PPI को लेकर भी उठे सवाल
नई जीडीपी सीरीज की चर्चा के बीच **Producer Price Index यानी PPI** के इस्तेमाल पर भी सवाल उठे हैं।
MoSPI के मुताबिक PPI घरेलू उत्पादकों को उनके उत्पादन के लिए मिलने वाली कीमतों में बदलाव को मापता है और इसलिए उत्पादक स्तर की आर्थिक गतिविधियों के मूल्य परिवर्तन को मापने के लिए यह अधिक उपयुक्त है।
पहले PPI उपलब्ध नहीं होने के कारण Wholesale Price Index यानी WPI को प्रॉक्सी के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। जून 2026 में नई PPI सीरीज उपलब्ध होने के बाद इसे संबंधित क्षेत्रों की जीडीपी गणना में शामिल किया गया।
मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि इसका अर्थ यह नहीं है कि पुराने जीडीपी आंकड़े गलत थे। उस समय उपलब्ध सर्वोत्तम डेटा और सूचकांकों के आधार पर अनुमान लगाए गए थे।
नए और बेहतर आंकड़े उपलब्ध होने के बाद अनुमानों को अपडेट करना राष्ट्रीय लेखा प्रणाली की सामान्य प्रक्रिया है।
विपक्ष ने उठाया आंकड़ों में हेरफेर का सवाल
सुभाष चंद्र गर्ग के दावे के बाद कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि पिछले वर्ष के आंकड़ों को कम करके मौजूदा वृद्धि दर ज्यादा दिखाई गई है।
सरकारी सूत्रों ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि **2.6 प्रतिशत को वास्तविक वृद्धि दर कहना गलत अंकगणित है**, क्योंकि इसमें अलग-अलग सीरीज के आंकड़े मिला दिए गए हैं।
सरकार का कहना है कि नई सीरीज में पिछले और मौजूदा दोनों वर्षों के आंकड़ों को समान पद्धति से देखने पर 7.8 प्रतिशत की वास्तविक वृद्धि दर सामने आती है।
पीयूष गोयल भी उतरे बचाव में
जीडीपी आंकड़ों पर जारी विवाद के बीच केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री **पीयूष गोयल** ने भी 7.8 प्रतिशत वृद्धि दर का बचाव किया।
उन्होंने कहा कि मंत्रियों द्वारा जीडीपी डेटा तैयार नहीं किया जाता और आंकड़े सांख्यिकीय प्रक्रिया से सामने आते हैं।
गोयल ने आलोचकों पर पुराने और नए डेटा की तुलना करने का आरोप लगाते हुए कहा कि तुलना करते समय **'सेब की तुलना सेब से'** होनी चाहिए।
उन्होंने रोजगार और जीडीपी आंकड़ों पर सवाल उठाने वाले कुछ आलोचकों पर तीखा हमला भी किया।
हालांकि सरकार के जवाब से अलग अर्थशास्त्रियों के बीच जीडीपी की गणना, डिफ्लेटर और रोजगार से आर्थिक वृद्धि के संबंध को लेकर बहस जारी है।
रघुराम राजन ने भी उठाए सवाल
पूर्व आरबीआई गवर्नर **रघुराम राजन** ने भी भारत के आर्थिक वृद्धि आंकड़ों पर सवाल उठाए हैं।
उन्होंने पूछा कि अगर अर्थव्यवस्था इतनी तेजी से बढ़ रही है तो पर्याप्त संख्या में बेहतर नौकरियां क्यों नहीं बन रही हैं और निजी निवेश अपेक्षित स्तर पर क्यों नहीं दिखाई दे रहा।
राजन के सवाल 2.6 प्रतिशत वाली विशिष्ट गणना से अलग व्यापक आर्थिक बहस से जुड़े हैं। इसलिए सरकार द्वारा गर्ग की गणना को खारिज किए जाने को अर्थव्यवस्था से जुड़े सभी सवालों का जवाब नहीं माना जा सकता।
रोजगार, निजी निवेश, उपभोग और आय में वृद्धि जैसे संकेतक अर्थव्यवस्था की स्थिति समझने के लिए अलग-अलग महत्वपूर्ण पैमाने हैं।
आखिर विवाद का निष्कर्ष क्या है?
पूरे विवाद को आसान भाषा में समझें तो **2.6 प्रतिशत का दावा पुराने और नए डेटा को मिलाकर की गई तुलना पर आधारित है**, जबकि सरकार का कहना है कि एक ही जीडीपी सीरीज के आंकड़ों की तुलना की जानी चाहिए।
पुरानी सीरीज में अप्रैल-जून 2025 की नॉमिनल जीडीपी करीब 86.05 लाख करोड़ रुपये थी। नई सीरीज में उसी अवधि का आंकड़ा करीब 80 लाख करोड़ रुपये है। वहीं अप्रैल-जून 2026 का आंकड़ा नई सीरीज से निकाला गया है।
इसलिए नई सीरीज के मौजूदा वर्ष के आंकड़े को पुरानी सीरीज के पिछले वर्ष के आंकड़े से जोड़कर वृद्धि दर निकालना सांख्यिकीय रूप से तुलनीय गणना नहीं है।
फिलहाल सरकार अपने **7.8 प्रतिशत वास्तविक जीडीपी वृद्धि** के आंकड़े पर कायम है। साथ ही उसने कहा है कि पिछले वर्ष के आंकड़े में बदलाव मौजूदा वृद्धि को कृत्रिम रूप से बढ़ाने के लिए नहीं बल्कि आधार वर्ष बदलने, नए डेटा स्रोत जोड़ने और गणना की पद्धति अपडेट करने के कारण हुआ है।
जीडीपी डेटा को लेकर राजनीतिक और आर्थिक बहस आगे भी जारी रह सकती है, लेकिन सरकार का केंद्रीय तर्क स्पष्ट है—**पुरानी और नई सीरीज के आंकड़ों को मिलाकर 2.6 प्रतिशत की वृद्धि दर निकालना सही तुलना नहीं है।**
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