नई दिल्ली: केंद्र सरकार आगामी 1 जुलाई से देश की ग्रामीण रोजगार व्यवस्था में एक ऐतिहासिक और व्यापक बदलाव करने की तैयारी में है। दशकों पुराने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA/मनरेगा) के स्थान पर अब एक नई महत्वाकांक्षी योजना ‘विकसित भारत ग्रामीण रोजगार और आजीविका मिशन गारंटी’ यानी VB-G RAM G लागू की जा रही है। इस नई योजना का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में न केवल पारंपरिक रोजगार देना है, बल्कि आजीविका के नए और कौशल-आधारित अवसर तैयार करना है। हालांकि, आधिकारिक शुरुआत से ठीक पहले इसके फंडिंग मॉडल (वित्तीय ढांचे) को लेकर बिहार, मध्य प्रदेश और झारखंड जैसे बड़े राज्यों ने गंभीर आपत्तियां दर्ज कराते हुए पेंच फंसा दिया है।

क्या है नया 60:40 का फंडिंग मॉडल और राज्यों की चिंता?

'VB-G RAM G' योजना के तहत केंद्र सरकार ने वित्तीय भार को साझा करने के लिए एक नया अनुपात तय किया है। इसके तहत योजना पर होने वाले कुल खर्च का 60 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार वहन करेगी, जबकि शेष 40 प्रतिशत हिस्सेदारी संबंधित राज्य सरकार को अपने बजटीय कोष से देनी होगी। यही 40 फीसदी का नियम राज्यों के लिए बड़ी चिंता का विषय बन गया है। राज्यों का तर्क है कि इस नए मॉडल के कारण उनके ऊपर अचानक भारी-भरकम वित्तीय बोझ बढ़ जाएगा। चिंता जताने वाले मुख्य राज्यों में बिहार और मध्य प्रदेश (जहां भाजपा नीत सरकारें हैं) तथा झारखंड (जहां विपक्षी दल की सरकार है) शामिल हैं। इन तीनों राज्यों ने केंद्र सरकार से इस वित्तीय पैटर्न पर तुरंत पुनर्विचार करने का आग्रह किया है।

राज्यों पर पड़ेगा अरबों रुपये का अतिरिक्त बजटीय बोझ

विभिन्न आंकड़ों के अनुसार, यदि नई योजना के तहत ग्रामीणों को साल में 125 दिनों का गारंटीकृत रोजगार देना है, तो राज्यों को अपनी जेब से बहुत बड़ी राशि खर्च करनी होगी:

बिहार: राज्य पर लगभग ₹4,477 करोड़ रुपये का अनुमानित वित्तीय बोझ पड़ेगा, जिसे राज्य सरकार ने नाकाफी बताया है।

मध्य प्रदेश: करीब ₹4,168 करोड़ रुपये की 40% हिस्सेदारी देनी होगी, जिससे राज्य का मानना है कि सीमित दिनों तक ही रोजगार देना संभव हो पाएगा।

झारखंड: राज्य को अपने सीमित संसाधनों से लगभग ₹1,804 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बजट आवंटित करना होगा।

नरेगा संघर्ष मोर्चा जैसे सामाजिक संगठनों का भी दावा है कि जमीनी हकीकत को देखते हुए यदि वास्तव में 125 दिन का काम सुनिश्चित करना है, तो राज्यों को इस अनुमानित आंकड़े से कई गुना अधिक धन की आवश्यकता होगी, जो फिलहाल संभव नहीं दिखता।

अन्य राज्यों ने भी उठाई विशेष दर्जे की मांग

केवल यही तीन राज्य नहीं, बल्कि पहाड़ी और पूर्वोत्तर राज्यों ने भी अपनी भौगोलिक स्थिति का हवाला देते हुए आपत्तियां दर्ज कराई हैं। उत्तराखंड सरकार ने मांग की है कि कठिन पहाड़ी क्षेत्रों को देखते हुए या तो इसका पूरा खर्च केंद्र खुद उठाए या फिर विशेष वित्तीय पैकेज दे। वहीं, सिक्किम ने पूर्व की तरह विशेष श्रेणी वाले राज्यों के लिए 90:10 (90% केंद्र और 10% राज्य) का फंडिंग मॉडल बरकरार रखने की वकालत की है। इसके अतिरिक्त, अधिकांश राज्यों ने मांग की है कि नई व्यवस्था में मजदूरों की मजदूरी और निर्माण सामग्री (Material) का भुगतान बिना किसी देरी के सीधे और पारदर्शी तरीके से किया जाए।

ग्रामीण रोजगार और मजदूरों पर क्या होगा असर?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि केंद्र और राज्यों के बीच फंडिंग को लेकर समय रहते सहमति नहीं बनी, तो ग्रामीण मजदूरों को इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है। वित्तीय तंगी के कारण रोजगार के दिनों में कटौती की जा सकती है, ग्रामीण बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के विकास की गति धीमी हो सकती है और मजदूरी भुगतान में देरी की पुरानी समस्या फिर सिर उठा सकती है। हालांकि, यदि केंद्र सरकार राज्यों की मांगों पर विचार करके नियमों में लचीलापन लाती है, तो इस योजना से ग्रामीण भारत का कायाकल्प हो सकता है। इससे गांवों में रोजगार के साथ-साथ कौशल विकास (Skill Development) को भी बढ़ावा मिलेगा। अब सभी की नजरें केंद्र सरकार के आगामी अंतिम दिशा-निर्देशों पर टिकी हैं।

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